रविवार, मई 20, 2018

FIB की नई पहल:पंजाब में नशे के जहर को रोकने की तैयारी

एक एक चेहरा किया जायेगा बेनकाब 
लुधियाना:19 मई 2018: (इर्द गिर्द टीम)::  
F.I.B. Media Inteligence Service  फिर तैयार है।  इस बार एक  नै जंग का ऐलान। पंजाब को नशे के ज़हर से अब हर तरह मुक्त किया जायेगा। इस मकसद के लिए इस संगठन ने अपनी कमर कस ली है। संगठन के प्रमुख डाक्टर भारत ने बताया कि हम किसी दबाव में आने वाले भी नहीं और न ही किसी लालच के जाल में। हमें अपने नेटवर्क से जो भी सूचना मिलेगी हम उस का पता लगाएंगे। हम न तो अदालत है और न ही पुलिस लेकिन नशे का ज़हर फ़ैलाने वाले हर चेहरे को हम बेनकाब अवश्य करेंगे। हमारे संगठन से हमदर्दी रखने वाले लोग उस मामले को मीडिया तक भी ले जायेंगे, अदालत तक भी और पुलिस तक भी। हम अपना काम करेंगे और हमारे सहयोगी अपना काम करेंगे। 
डाक्टर भारत ने कहा कि जबतक समाज के अग्रणीय व सामाजिक संगठन खुलकर पुलिस प्रशासन का सहयोग नहीं करते रब तक समाज में फ़ैल चुके नशे रूपी कुष्ट रोग के इस कैंसर को नहीं ख़त्म किया जा सकता।  यह जंग अकेले पुलिस के बस की बात नहीं जो समाज में फैली इन बुराइयों को ख़त्म  कर सके।इसके साथ बहुत सी अन्य बुराईयां भी जुडी हुई हैं।
      इस मीटिंग में डाक्टर भारत ने कहा कि वही देश समाज तरक्की कर आगे बढ़ कर शक्तिशाली हो सकता है जिस देश के नागरिक अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए  असामाजिक तत्वों और बुराइयों के खिलाफ दृढ़ता से खड़े होकर मुकाबला कर जड़ से उखाड फेकने में सक्षम हों।  यह जाहिर  हो चूका है की कुछ तथाकथित राजनीतिक और कुछ भ्र्ष्ट नौकरशाहियों की वजह से हर तरह के अपराध जहाँ बढ़ते जा रहे हैं वहीँ कैंसर कोढ़ रूपी नशीले वस्तुवें  चिट्टा , ब्राउनशुगर , सिन्थेटिक , हैरोइन जैसी घातक ड्रग्स ने समाज को विकृति और खोखला कर दिया है। 
       इन्ही सब बातों को लेकर  राष्ट्र हित में काम करने वाला यह जानामाना गुप्तचर मीडिया संगठन  अब पूरी तरह सक्रिय है। (F.I.B. फर्स्ट इन्वेस्टीगेशन ब्यूरो) के मुख्य कार्यालय, जो लुधियाना के सिविल लाइन्स क्षेत्र में है के कार्यालय में  पंजाब मार्केटिंग मुलाजिम जत्थेबंदी के अकाउंटेंट सुपरिंटेंडेंट सुरजीत सिंह जोहल ( जालंधर ) पंजाब एलेक्ट्रसिटी बोर्ड़ रोपड़ से जूनियर इंजीनियर दर्शन सिंह , पंजाब  सरकार सेवा  के पूर्व अधिकारी  हरजीत सिंह मरिंडा रोपड़ ,   आनंदपुर साहिब से पंजाब बिजली बोर्ड के रि. अधिकारी दर्शन सिंह  व बलजिंदर सिंह संधू  ने ब्यूरो के डायरेक्टर = अध्यक्ष  डॉ.  भारत से विशेष मुलाक़ात  कर  जहाँ देश समाज में ब्याप्त बुराइयों को रोकने और संगठन द्वारा राष्ट्र हित में किये जा रहे कार्यों को सहयोग करने का बचनबद्ध हुए।  अलग अलग इलाकों के लोगों से अलग अलग बैठकों का यह सिलसिला अभी जारी है। 

शनिवार, मार्च 24, 2018

खुदकुशियों के मौसम में भी ज़िंदगी के गीत गुंजा रहे है PAU के किसान मेले

आंवला कैंडी से ले कर सोलर कूकर तक सफलता की गौरवगाथा 
लुधियाना: 24 मार्च 2018: (कार्तिका सिंह//इर्द गिर्द)::
हालात कुछ भी हो सकते हैं।  अच्छे भी बुरे भी। हम सभी की ज़िंदगी हमें बहुत से कड़वे अनुभव भी करवाती है जो हमें हर बार कोई न कोई नई सीख दे कर जाते हैं। यह कडुवाहट उस कड़वी दवा की तरह होती है जो हमारी बीमारी को ठीक कर के एक नयी ज़िंदगी देती है। संघर्ष की इस बेचैनी के बाद जो  स्कून मिलता है उसके आनंद की बराबरी जल्दी किये सम्भव ही नहीं होती। 
गुरवंत सिंह ने भी ऐसे दिन देखे। राजनीतिक सोच वामपंथी रही।  सीपीआई से जुड़े हुए भी हैं। इस सब के बावजूद विचारों में कभी कटड़ता नहीं आने दी। अन्ना हज़ारे के ग्रुप से संदेश आये तो उन को भी सहयोग दिया और अगर मेधा पाटेकर के साथियों ने कुछ कहा तो उनका भी साथ दिया। मकसद था बदलाव-किसी भी बहाने--किसी भी तरह। 
बदलाव का यह प्रयास केवल सियासत के मामले में नहीं था। उन्होंने व्यक्तिगत ज़िंदगी में भी हर पल स्वस्थ बदलाव के लिए निरंतर साधना की। खुद फैक्ट्री का मालिक होते हुए भी ज़रूरत पड़ने पर मज़दूरों की तरह काम किया। खेती विरासत मिशन की तरफ झुकाव हुआ तो उनका भी सक्रिय हो कर साथ दिया। 
समाज सेवा की तरफ लगातार बढ़ते रहे इस झुकाव ने काम-काज चौपट कर दिया। भाई की मौत ने उन्हें बहुत गहरा सदमा दिया। निराशा के इस गहन अँधेरे में एक बार फिर हिम्मत का हाथ पकड़ा।  हिम्मत ने रास्ता दिखाया। इस मामले में एक बार फिर पत्नी से भी साथ मिला और बेटियों से भी। पीएयू की ट्रेनिंग ने नया उत्साह और नई ऊर्जा दी। 
सोलर ऊर्जा की तरफ भी प्रयास किये जो कामयाब रहे। ज़िंदगी जो जो रंग दिखाती रही--गुरवंत सिंह उन्हें ध्यान से देखते भी रहे स्वीकार भी करते रहे। फिर धीरे धीरे उभरने लगा एक नया रंग। रात्रि के गहन अँधेरे के बाद उषा की लालिमा दस्तक देने लगी। 
गुरवंत सिंह की ज़िंदगी में एक नई ज़िंदगी की सुबह आने लगी। धोखे-फरेब और की विश्वासघात  की चोटों के बाद मिली संघर्ष से मिली सफलता की चमत्कारी मरहम। इस मरहम ने अपनों से मिली चोटों से लगे ज़ख्मों का दर्द दूर किया। एक नई राहत दी। नया हौंसला दिया। जिंदगी ने एक बार फिर सफलता की रफ्तार पकड़ ली। आज फिर गुरवंत सिंह सफलता की नई शिखरें छूने के लिए तैयार हैं। किसान मेले में उनसे और उनके परिवार से हुई भेंट यादगारी रही। उनके स्टाल पर आंवला कैंडी से ले कर आंवला शर्बत और सोलर कुकर तक बहुत कुछ था जो किसान मेले में आये लोगों को आकर्षित कर रहा था। गर्मी की धुप और किसान मेले के रास्तों से उड़ती धूल ने सारे परिवार के चेहरों का रंग कुछ सांवला कर दिया था लेकिन इस के बावजूद संघर्ष से मिली सफलता की चमक अपना रंग दिखा रही थी। जिम्मेदारियों का बोझ वरिष्ठता की गंभीरता भी दिखा रहा था। अपने पांवों की मजबूत होती स्वतन्त्रता की ख़ुशी भी सभी के चेहरों पर नजर आ रही थी। उनसे हुई बातचीत आप देख सकते इस पोस्ट के साथ दी गई वीडियो में। उन्हें देख कर याद आ रही हैं स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की पंक्तियाँ:
कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। 
किसान मेले लगते रहें। खुदकुशियों के मौसम में भी ज़िंदगी के गीत गूंजते रहें। निराशा के गहरे अंधेरों में भी संघर्ष का सूर्य चमकता रहे। ऐसी बहुत सी उमीदें हैं जो गुरवंत सिंह जैसे परिवारों को देख कर पूरी होने का विश्वास होने लगता है। सपनों को साकार करने का यह काफिला बढ़ता रहे। इसी कामना के साथ। 
                                                                                             -कार्तिका सिंह

शनिवार, जनवरी 07, 2017

प्रवासी भारतीयों ने एक लंबा सफर तय किया है

Posted On: 07th January 2017 at 5:35 PM by PIB
Special Service and Features                                      * प्रियदर्शी दत्ता 
कर्नाटक के बैंगलुरू में 7 से 9 जनवरी 2017 तक  विशेष आयोजन 
प्रियदर्शी दत्ता 
प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन के 15 वें संस्करण का कर्नाटक के बैंगलुरू में 7 से 9 जनवरी 2017 तक  विशेष आयोजन किया जाएगा। प्रथम वार्षिक सम्मेलन का आयोजन 9 से 11 जनवरी 2003 को किया गया था और अगस्‍त 2000 में गठित एक उच्‍च स्‍तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर इसे 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस अथवा ओवरसीज इंडियन के रूप में अपनाया गया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अत्‍यंत उत्‍सुकता के साथ प्रवासी भारतीयों के मुद्दे में दिलचस्पी रखते थे। पोखरण द्वितीय के बाद जब भारत प्रतिबंधों से जूझ रहा था ऐसे में 1998 में उभरते हुए भारत के प्रति अपने संबंधों में मजबूत विश्वास दिखाया। उदारीकरण के वातावरण के बाद भारतीय मूल के समुदाय अपने देश के साथ जुड़ने को तैयार थे। भारत के एक सूचना प्रौद्योगिकी क्षमता केन्‍द्र तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और परमाणु शक्ति के रूप में उभरने से प्रवासी भारतीयों में अत्‍यधिक आत्‍मविश्‍वास जगा दिया था। यह खेल के मैदान से व्यापार सम्मेलनों और अंतरराष्ट्रीय बैठकों जैसे विभिन्‍न स्‍थलों पर दिखाई भी दिया।  
प्रवासी भारतीयों की चिंताएं भारतीय नेतृत्व के मस्‍तिष्‍क में लंबे समय से थीं। ब्रिटेन  में हाऊस ऑफ कॉमन्‍स पर 1841 की शुरूआत में जितना शीघ्र हो सके मॉरीशस में भारतीय अनुबंधित श्रमिकों की दयनीय हालत की जांच के लिए दबाब डाला गया था। यह ब्रिटिश साम्राज्य में गुलामी उन्मूलन (1833) के बाद अनुबंधित व्‍यवस्‍था की शुरुआत के कुछ वर्ष के भीतर हुआ था। इसी तरह से 1894 में कांग्रेस के मद्रास सत्र में दक्षिण अफ्रीकी उपनिवेशों में भारतीयों के मताधिकार से वंचित करने के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया गया था। कांग्रेस  ने पूना (1895) कोलकाता (1896) मद्रास (1898) लाहौर (1900) कोलकाता (1901) और अहमदाबाद (1902) सत्रों में भी इसी तरह के प्रस्तावों को अपनाया। उन दिनों में प्रवासी भारतीयों से अभिप्राय अधिकांश दक्षिण और पूर्वी अफ्रीका में भारतीयों से संबंधित था। इन्‍होंने स्थानीय ब्रिटिश सरकार द्वारा उनके अधिकारों के अतिक्रमण के खिलाफ कई संघर्ष आरंभ किए थे। गांधी-स्मट्स समझौता 1914 उनके लिए एक बड़ी जीत का द्योतक है।

दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे बर्मा, सिंगापुर, मलेशिया, थाइलैंड इत्यादि में प्रवासी भारतीय काफी संख्या में थे। इनमें से कइ 1940 के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आजाद हिंद फौज में स्वयंसेवक रहे और साथ ही फंडिंग का भी इंतजाम किया। मलेशिया में जन्मी तमिल मूल की युवा लड़कियों की कहानियां भी है जिन्होंने बंदूक उठाकर कंधे से कंधा मिलाते हुए उस भारत की आजादी की लड़ाई करने का फैसला किया जिसे उन्होंने कभी देखा भी नहीं था।
प्रवासी भारतीय दिवस से महात्मा गांधी के 9 जनवरी 2015 को भारत आगमन की यादें भी ताजा होती हैं। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए 21 साल तक लड़ाइयां लड़ी। उनके अहिंसक प्रतिरोध का रूप, जिसे उन्होंने सत्याग्रह नाम दिया, उसे लागू तो भारत में किया लेकिन उसका विकास दक्षिण अफ्रीका में हुआ था। गांधी के समय के औपनिवेशिक विश्व में प्रवासी भारतीयों की स्थिति आज की स्थिति से बेहद अलग थी। वो ऐसे दिन थे जब विदेश जाना ये विदेश में बसने को प्रतिष्ठित नहीं माना जाता था। विदेश जाने वाले ज्यादातर भारतीय फैक्ट्रियों में मजदूरी और खेती से जुड़े कार्यों में मजदूर के लिए पट्टे पर (अफ्रीका, वेस्टइंडीज, फिजी, श्रीलंका, बर्मा इत्यादि देशों में) ले जाए जाते थे। लेकिन हिंदू समाज में समुद्री यात्रा निशेध जैसे मध्यकालीन मान्यताओं को बदलने का श्रेय उन्हीं लोगो को जाता है।

औपनिवेशिक काल में नस्लभेद को औपनिवेशिक सरकारों ने राज्य की नीति की तरह स्थापित किया था। लेकिन औपनिवेशिक काल के खात्मे के बाद भी कई दूसरी तरह की समस्याएं पैदा हुई। गांधी के जीवनकाल के दौरान ही सिलॉन (श्रीलंका) और बर्मा (म्यांमार) में भारतीयों और वहां के स्थानीय लोगों के बीच तकरार होने लगी और सिलॉन और बर्मा के लोग भारतीयों से दूरी चाहने लगे।
डीएस सेनानायके की सरकार द्वारा पारित शुरुआती 2 प्रस्ताव में ही आजाद सिलॉन के करीब 10 लाख भारतीय मूल के नागरिकों को वहां की नागरिकता से महरूम कर दिया। हालांकि मॉरिसस में भारतीयों ने सत्ता पर पकड़ मजबूत कर ली लेकिन म्यांमार में अल्पसंख्यक बना दिए गए। इस तरह के देशों में भारतीयों को एक नए तरह के नस्लवाद का शिकार होना पड़ा।

औपनिवेशिक काल समुद्री प्रभुत्व का काल भी था। 1950 के आखिर तक पानी के जहाज ही महाद्वीपों के बीच आने जाने का सबसे भरोसेमंद साधन थे। 1960 की शुरुआत में हवाई जहाज ने लंबी दूरी के लिए पसंदीदा आवागमन के साधन के रूप में पानी के जहाज की जगह ले ली। भारत से प्रवास के स्वरूप को देखें तो मानव संसाधन की दक्षता और भारत से आवागमन पर इसकी छाप स्पष्ट देखी जा सकती है। संयोग से करीब उसी समय अमेरिका में पारित हुए अप्रवास और राष्ट्रीयता कानून, 1965 ने कौशल संपन्न पेशेवरों और छात्रों के प्रवास की राह आसान कर दी। इस ऐतिहासिक कानून ने भारतीय प्रवासी समुदाय की संख्या और साख को बदलकर रख दिया। 1960 में जहां 12000 भारतीय अमेरिका में रहते थे वही आज उनकी संख्या 25 लाख हो चुकी है। ये पढ़े लिखे और सफल प्रवासी भारतीय दुनिया भर में फैले भारतीय मूल के लोगों को भी राह दिखा रहे हैं।

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। समाजवाद के दौर में जब भारत कमजोर विकास दर से जकड़ा हुआ था उस समय यहां के नागरिक विदेशों में अपनी भारतीय पहचान को उजागर होने देना नहीं चाहते थे। भारत में भी अप्रवासी भारतीयों को भगोड़े की तरह देखा जाता था। लेकिन उदारीकरण के बाद विकास दर में तेजी, आईटी पॉवर हब के रूप में भारत का उदय और वाजपेयी सरकार की विकास नीतियों ने मिलकर प्रवासी भारतीयों का हौसला बढ़ाया। सैटेलाइट टीवी, इंटरनेट के आगमन और उसके बाद 1990 के दशक में घर-घर में टीवी की पहुंच के बाद विदेशों में बसे भारतीयों को लगातार अपने देश से संपर्क का साधन मिल गया। अब प्रवासी भारतीयों के लिए भी अपनी जन्मभूमि के हित के बारे में सोचना संभव हो गया। भारतीय और अप्रवासी भारतीय मिलकर देश को दुनिया में ऊंचा स्थान दिलाने के बारे में सोच सकते हैं। इससे नए ‘वैश्विक भारतीय’ की अवधारणा को बल मिला और इसी नाम के साथ कंचन बनर्जी ने 2008 में बोस्टन में एक मैगजीन भी शुरू की।

लेकिन अभी भी दुनिया के कई हिस्सों में भारतीय समुदाय को नस्लवाद, धार्मिक कट्टरता और कानूनी भेदभाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कई मोर्चों पर अभी सफलता मिलनी बाकी है। ऐसे में महात्मा गांधी के 1890 में दक्षिण अफ्रीका में शुरू किए गए संघर्ष की लौ बुझने नहीं देनी है।
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मंगलवार, सितंबर 02, 2014

प्रधानमंत्री मोदी ने की नेता जी के सबसे पुराने साथी के साथ मुलाक़ात

02-सितम्बर-2014 19:43 IST
भारतीय समुदाय के समारोह में प्रधानमंत्री का संबोधन यादगारी रहा 
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी 02 सितंबर, 2014 को जापान के तोक्यो में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सबसे पुराने साथी रहे 99 वर्षीय साइशिरो मिसुमी से मुलाकात करने पहुंचे। (पसूका-हिंदी इकाई)
The Prime Minister, Shri Narendra Modi reaches out to 99 year old Saichiro Misumi, Netaji's oldest living associate in Japan, in Tokyo, Japan on September 02, 2014
प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने आज जापान के तोक्‍यो में एक स्‍वागत समारोह के दौरान भारतीय समुदाय को संबोधित किया। उन्‍होंने जापान की यात्रा को सफल बताया और जापान द्वारा की गई 3.5 ट्रिलियन येन के निवेश की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। उन्‍होंने छह भारतीय कम्‍पनियों पर लगाई गई पाबंदी को हटाने का भी जिक्र किया और कहा कि ऐसा इसलिए संभव हो पाया क्योंकि दोनों देशों के आपसी रिश्‍ते विश्वास के मजबूत धागे पर आधारित हैं। प्रधानमंत्री ने वाराणसी-क्योतो साझेदारी नगर सहमति पत्र पर हस्‍ताक्षर किए जाने पर भी संतोष जताया और उम्‍मीद जताई कि वाराणसी भी क्‍योतो जैसे एक आधुनिक धरोहर नगर के रूप में उभरेगा।

प्रधानमंत्री ने जिक्र किया कि उन्‍होंने जापान के सम्राट अकिहितो और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे दोनों को ही बतौर भेंट भगवत गीता दी है।

महात्‍मा गांधी की 150वीं जयंती यानी 2019 तक स्‍वच्‍छ भारत के अपने विजन का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने जापान में भारतीय समुदाय के हर परिवार से आग्रह किया कि वे जापान से प्रत्‍येक वर्ष पांच जापानी परिवारों को भारत की यात्रा करने के लिए प्रेरित करें। उन्‍होंने जापान में भारतीय समुदाय से गवर्नेंस पर हाल ही लांच की गई ‘माईगव. इन’ वेबसाइट पर सुझाव देने की भी अपील की।

प्रधानमंत्री ने कहा कि 21वीं सदी निश्चित रूप से एशिया की सदी होगी लेकिन यह क्‍या आकार लेता है, यह इस पर निर्भर करेगा कि भारत और जापान के बीच रिश्‍ते किस प्रकार पनपते हैं, यह किन मूल्‍यों को बढ़ावा देता है और यह विश्‍व को किस दिशा में ले जाता है। उन्‍होंने जापान में भारतीय समुदाय से इस परिपेक्ष्‍य में इनकी अहमियत की सराहना करने का आग्रह किया।
वि. कासोटिया/एएम/आरआरएस/एसएसके-3471

गुरुवार, जनवरी 02, 2014

कौन सा मार्ग शेष रह गया//पंडित सिद्धार्थ शर्मा

Thu, Jan 2, 2014 at 12:36 PM
अब तो कमजोर और पाखण्ड का ये देश है 
अब ना भगत ना सुखदेव ना राज गुरु शेष हैं 

हे भारत भू हे सखी तू 
लौट जा उस काल में तू 
जब तेरे बालक के बाजू में था दम
जब था वो यमुना का जल सरस पावन
जब स्वम माधव ने भरी सभा चीर को बढाया 
जब एक धागे की कसम ने रक्षा बन्धन का सम्मान पाया 
जब भीम ने दुर्योधन के घमण्ड को जन्घा से हटाया
जब दुर्गा ने धरा पर माता का सम्मान पाया 
अब तो कमजोर और पाखण्ड का ये देश हैं 
अब ना भगत ना सुखदेव ना राज गुरु शेष हैं 
पैसा कमाना कैसे सब ये पढाते
जीवन जीना कैसे ये सब भूल जाते
आदर्श के नाम पे घोटाला लिखा हैं 
गैर ने नही ये खून तेरा अपनो ने पिया हैं 
हे भवानी ! क्यू राजपूतो का खून अब ना डोले
देख कर ये हशर कोई उद्धम सिंह क्यू ना बोले 
बस मंदिरो में सब ने तुझ को कैद कर दिया हैं 
केवल विनाश  का रास्ता ही शेष रह गया हैं 

--पंडित सिद्धार्थ शर्मा  (सत्र 2004-08)

मंगलवार, दिसंबर 31, 2013

बाबा रामदेव: 1 मार्च से घर-घर जाकर वोट फार मोदी कैंपेन चलाएंगे

Tue, Dec 31, 2013 at 1:58 PM
कहा-लोगों को पानी मुफ्त देना सरकार का दायित्व
केजरीवाल ने नया क्या किया
अमृतसर: 31 दिसंबर 2013 : (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन//इर्द गिर्द): 
देश में भ्रष्टाचार समाप्त करने और विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने के मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार से टक्कर लेने वाले योग गुरु बाबा रामदेव ने स्पष्ट किया है, कि इस समय देश को नरिंदर मोदी जैसे दिग्गज नेता की जरूरत है, जो लोगों को भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन देने में समर्थ हैं। वह आज अमृतसर पहुंचे थे। पत्रकार वार्ता के दौरान उन्होंने कहा, कि 2014 में देवत्व की स्थापना के साथ-साथ अन्य मुद्दों पर भी उनका आंदोलन जारी रहेगा। अपने आंदोलन के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा, कि एक मार्च से वह और उनके कार्यकर्ता पूरे देश में घर-घर जाकर वोट फार मोदी और भ्रष्टाचार समेत अन्य मुद्दों के खिलाफ वोट करने के लिए लोगों से अपील करेंगे। इसके अलावा 23 मार्च को शहीदी दिवस के उपलक्ष्य में वह दिल्ली में एक बहुत बड़ा योग कैंप लगा रहे हैं, जिसमें एकसाथ पूरे देश में करीब दस करोड़ लोग एकसाथ योगाभ्यास करेंगे।
   नरिंदर मोदी के प्रचारक के रूप में बाबा रामदेव के आगे आने के बारे में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा, कि वह नरिंदर मोदी के प्रचारक नहीं है। बल्कि वह इसलिए उनका साथ दे रहे हैं, क्योंकि नरिंदर मोदी और उनके मुद्दे एकसमान है। इसलिए वह नरिंदर मोदी का प्रचार करने में जुटे हुए हैं। आम आदमी पार्टी की ओर से सत्ता में आते ही लोगों को मुफ्त पानी जैसी सुविधा दिए जाने के बारे में बाबा रामदेव ने कहा, कि इसमें केजरीवाल ने नया क्या किया। उन्होंने कहा, कि पहले आम आदमी पार्टी को अपनी विचार धारा स्पष्ट करनी होगी कि उनकी विचारधारा वामपंथी है या कुछ और। दिल्ली में नरिंदर मोदी के जादू के फेल होने के बारे में बाबा रामदेव ने कहा, यदि वहां मोदी फैक्टर नहीं चला होता, तो भाजपा की हालत कांग्रेस से भी बदत्तर होती।

गुरुवार, नवंबर 14, 2013

Each image of Kashmiri Hindu House is stark,

Plain-spoken, without embellishment
14-06-2009 को अपलोड किया गया
My Lost Home
Video Produced by: Deepak Ganju
Images: Veer Munshi & Deepak Ganju
Song: Arti Tiku Kaul
See at shehjar Magazine at:http://www.shehjar.com/list/94/840/1....

Each image of Kashmiri Hindu House
is stark, plain-spoken, without embellishment.
There is no annotati ve manipulati on of these
images, no theatricality, no vein of melodrama,
no overtly elegiac air, no demand for sympathy.
There they stand, in our line of sight: ruins,
monuments, memorials.
This is testimony to the unforgiving march of
history, which takes no prisoners.
'Ranjit Hoskote'  (Courtesy: YouTube)