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रविवार, दिसंबर 19, 2021

जब देवी कृपा करती है तब हर दुःख को वह हरती है

 बहुत ही समृद्धि वाला होगा इस नन्हीं परी का आना


लुधियाना
: 18 दिसंबर 2021: (रेक्टर कथूरिया//इर्दगिर्द डेस्क)

नन्ही परी सीरत कौर 
कोई ज़माना था जब हम जोश, सम्मान और स्नेह में गाया करते थे-- 

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा!

हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलिस्तां हमारा!

इस गीत को मैंने अपने रेडियो प्रोग्रामों में भी इस्तेमाल किया। इसके गायन से सबंधित जितने अंदाज़ थे तकरीबन सभी बहुत अच्छे गाए हुए हैं। फिर तकनीकी विकास शुरू हुआ तो इस भावना में तब्दीली जैसी रफ्तार भी तेज़ थी। पहले पहल कुछ अटपटा भी लगा फिर एक अहसास ज़ोर पकड़ने लगा की सारी दुनिया ही अपनी है। पूरा संसार अपने किसी गांव जैसा ही तो है।कभी कभार तो ऐसा भी लगता कि लोकल बात करनी मुश्किल है लेकिन विदेश में बात करनी आसान है। इस तरह दूरियां नज़दीकियों में बदलती रहीं। 

फेसबुक, व्टसप और वीडियो कालिंग ने तो इस अहसास को तेज़ी से बढ़ावा दिया। जो बच्चे विदेशों में गए हुए हैं रोज़ी रोटी के लिए उनसे बात करनी बेहद आसान हो गई है अब। उनसे आमने सामने जैसी बात का अहसास होता है। वहां के गलियां बाजार अपने अपने से लगते हैं। इसके बावजूद भी अगर हमें उनकी दूरी बार बार खलती तो उनको भी इस दूरी का अहसास शिद्दत से होता ही है। लेकिन तकनीक उस तकलीफ को कम कर देती। किसी ने इस तकलीफ को देखना हो तो उस ग़ज़ल से देख भी सकता है, सुन भी सकता है और समझ भी सकता है--चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है। इस गीत में इस दर्द का अहसास शिद्दत से होता है। इस गीत को फिल्म "नाम" के लिए लिखा था आनंद बक्शी साहिब ने और संगीत तैयार किया लक्ष्मी कान्त प्यारे लाल जी ने। आवाज़ दी थी पंकज उधास साहिब ने। इसकी आगे की पंक्तियाँ हैं:-

-चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है। 

बड़े दिनों के बाद, हम बेवतनों को याद -२

वतन की मिट्टी आई है, चिट्ठी आई है ...


ऊपर मेरा नाम लिखा हैं, अंदर ये पैगाम लिखा हैं -२

ओ परदेस को जाने वाले, लौट के फिर ना आने वाले

सात समुंदर पार गया तू, हमको ज़िंदा मार गया तू

खून के रिश्ते तोड़ गया तू, आँख में आँसू छोड़ गया तू

कम खाते हैं कम सोते हैं, बहुत ज़्यादा हम रोते हैं, चिट्ठी ...


सूनी हो गईं शहर की गलियाँ, कांटे बन गईं बाग की कलियाँ -२

कहते हैं सावन के झूले, भूल गया तू हम नहीं भूले

तेरे बिन जब आई दीवाली, दीप नहीं दिल जले हैं खाली

तेरे बिन जब आई होली, पिचकारी से छूटी गोली

पीपल सूना पनघट सूना घर शमशान का बना नमूना -२

फ़सल कटी आई बैसाखी, तेरा आना रह गया बाकी, चिट्ठी ...


पहले जब तू ख़त लिखता था कागज़ में चेहरा दिखता था -२

बंद हुआ ये मेल भी अब तो, खतम हुआ ये खेल भी अब तो

डोली में जब बैठी बहना, रस्ता देख रहे थे नैना -२

मैं तो बाप हूँ मेरा क्या है, तेरी माँ का हाल बुरा है

तेरी बीवी करती है सेवा, सूरत से लगती हैं बेवा

तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुड़ाया

पंछी पिंजरा तोड़ के आजा, देश पराया छोड़ के आजा

आजा उमर बहुत है छोटी, अपने घर में भी हैं रोटी, चिट्ठी ...

हमारे लीडर विकास के ढिंढोरे पीटते रहे लेकिन असलियत में हमारे बच्चे विदेशों में जा बसे। उनकी कमाई से कर्ज़े उतरने लगे जो शायद वैसे सम्भव ही नहीं थे। उनकी कमाई से घरों में आधुनिक साज़ो सामान आने लगा। मुझे याद है बहुत से जानकार लोग जिनके घरों में पहला टीवी सैट उनके बच्चों की इस कमाई से ही आ पाया। सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां फिर भी मन में बना रहा लेकिन एक दर्द भरी चाहत भी जागने लगी कब होगा हमारा देश इतना समृद्ध कि किसी बच्चे को रोज़ी रोटी और कर्ज़ों को उतारने के लिए विदेश न जाना पड़े। इस भावना को भी दशकों गुज़र गए। टीवी सैट ब्लैक ऐंड व्हाईट से कलर्ड हो गए। लेकिन आर्थिक कमज़ोरियाँ बनी रहीं। अब भी याद आतीं हैं सुरजीत पात्तर साहिब की पंक्तियां:

जो बदेसां च रुल्दे ने रोटी लई, ओह जदों देस परतणगे अपने कदी;

जां तां सेकणगे मां दी सिवे दी अगन; ते जां कबरां दे रुख हेठ जा बैहणगे!  

प्रदीप जी का बेटा अनुराग शर्मा
अपनी बेटी सीरत कौर के साथ 
समाज के इस तरह के दुःखों और दर्दों को लेकर बहुत पुराने वामपंथी सांस्कृतिक संगठन इप्टा से जुड़े प्रदीप शर्मा ने भी काफी कुछ किया। कई नाटक लिखे और उनके मंचन में भी सहयोग दिया। सख्त मेहनत करके भी इतना वक्त न बचता कि कला के लिए कुछ विशेष कर सकें। जो मन में है वो कर सकें। कोई नाटक, कहानी, नावल या कुछ और नया देख या पढ़ सकें।   

तंगियां, तुर्शियां और चिंता-फ़िक्र ज़िंदगी का एक अंग बने रहे। इन्होने कभी पीछा न छोड़ा। एक परछाईं की तरह यह सब साथ रहते। फिरइनकी आदत ही पक गई। ख़ुशी  आ भी जाती तो चिंता होने लगती कि शायद धोखे  आ गई होगी। या फिर अपने साथ छुपा कर कोई गम लाई होगी। वरना ख़ुशी और हमारे पास  कैसे? यहाँ याद आ रही है जनाब कतील शिफ़ाई साहिब की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल की कुछ पंक्तियां:

वफ़ा के शीशमहल में सजा लिया मैनें,

वो एक दिल जिसे पत्थर बना लिया मैनें,

ये सोच कर कि न हो ताक में ख़ुशी कोई,

गमों की ओट में खुद को छुपा लिया मैनें,

कभी न ख़त्म किया मैंने रोशनी का मुहाज़,

अगर चिराग बुझा तो दिल जला लिया मैनें,

कमाल ये है कि जो दुश्मन पे चलाना था,

वो तीर अपने ही कलेजे पे खा लिया मैनें।

घुटन, तंगदस्ती और इन्हीं चिंताओं में शर्मा जी सरकारी नौकरी से रिटायर हो गए। ख़ुशी भी थी परिवार के साथ रहने की लेकिन गम था संगी साथी छूट जाने का। आगे गुज़ारा कैसे होगा इसकी चिंता भी थी। उस रिटायरमेंट के वक्त कुछ लाख रुपयों की रकम मिली जो शर्मा जी को भारी भरकम भी लगी। लेकिन यह भी एक खाम ख्याली जैसी ही बात थी। उसका नशा भी ज़्यादा देर तक रहने वाला नहीं था।  

मध्यवर्गीय परिवारों में पैसे आते बाद में हैं उनके खर्च होने की लिस्ट झट से बनी होती है। घर का राशन, बच्चों की स्कूल फीसें, कर्ज़े उतारने के लिए बनी हुई किस्तें, खुशियों गर्मियों में आना जाना-यह सब पहले से ही तैयार होता है। कभी कभार पीज़ा या गोलगप्पे बाजार में निकल कर खा लिए जाएं यही बहुत बड़ी पार्टी ह जाती है। बहुत बड़ी सेलिब्रेशन। बाकी चाहतें, बाकी इच्छाएं तो उम्र भर दबी ही रह जाती हैं। खुद की भी परिवार की भी। बस यही है ज़िंदगी का सच। 

इस परिवार के सदस्यों की भी कुछ अपनी अपनी इच्छाएं थे। सबसे छोटा बेटा अनुराग विदेश जाने की चाहत लिए बैठा था। उसके मन में यह बहुत देर से ही थी। उसे लगता था कोई बड़ा कदम उठा क्र ही घर की हालत बदल सकती है। छोटे बच्चे अक्सर ज़्यादा जोशीले होते हैं और ज़्यादा हिम्मती भी। वे रिस्क उठाने में बहुत तेज़ होते हैं। आर्थिक कमज़ोरी के हालात में बच्चे अपनी छोटी छोटी इच्छाएं भी बहुत बार सोच सोच कर बताते हैं कि कहीं घर का बजट न बिगड़ जाए। विदेश जाना तो बहुत बड़ी बात थी। लेकिन अनुराग ने हिम्मत की। अपनी इच्छा सभी को ज़ाहिर कर दी। कहा आप बेशक इन्वेस्टमेंट समझ कर कर दो। आप मेरे लिए कुछ खतरा उठा लो। परिवार के सभी लोगों ने भी ज़ोर देते हुए बेटे का ही साथ दिया। इस तरह वह रकम उसे विदेश भेजने में खर्च हो गई।  

इस तरह गुज़ारा फिर से तंग होने लगा। थोड़े बहुते तकरार भी होने लगे। जब जेब खाली हो तो गुस्सा भी खुद पर या अपनों पर ही आता है। जानेमाने लेखक और ज्योतिषी डा. ज्ञान सिंह मान कहा करते थे-बलशाली सब को खाता है-बलहीन खुद को खता है-ऐसी हालत में अपने ही लोग बुरे लगते हैं और फिर वही दिलासा भी देते हैं। काम भी आते हैं। उसे विदेश भेज दिया गया। फिर उसी बेटे ने वहां एक लड़की पसंद कर ली। लड़की पंजाब की ही थी मनप्रीत कौर। दोनों ने कहा कि हम माता पिता का आशीर्वाद लिए बिना शादी न करेंगे। दोनों पंजाब आए। धार्मिक रस्मों के बाद शानदार पार्टी भी हुई। फिर बात आई गई हो गई। कोरोना के कहर ने सब कुछ भुला दिया। आर्थिक तरक्की में इस बेटे ने भी बहुत योगदान दिया। शर्मा जी की एक आवाज़ और मिनटों में ही पैसे इनके खाते में पहुंच जाते हैं। 

पत्रकारिता में सक्रिय प्रदीप शर्मा 
खुशियां फिर से लौटने लगीं। चेहरे के साथ साथ आंखों की चमक भी बढ़ने लगी। माहौल फिर से खुशगवार हो गया। प्रदीप शर्मा जी स्टेज के साथ साथ पत्रकारिता में भी रूचि दिखाने लगे। ऑनलाइन मुशायरों में भी दिलचस्पी बढ़ने लगी। लेकिन खुशियां थोड़े समय की ही रहीं। हम जैसे आर्थिक कमज़ोरी के मारे लोगों की किस्मत में ख़ुशी की झलक भी आ जाए तो भी गनीमत है। 
कुछ देर बीमार रहने के बाद पत्नी बाला शर्मा का देहांत गया। सी एम सी अस्पताल में जो भरी भरकम खर्चा हुआ वह अलग हुआ। खर्चा कर के भी उसे बचाया न जा सका यह सदमा अलग लगा। मन ज़िंदगी से उचाट सा हो गया। लोग तो अर्धांगिनी की बात धार्मिक नुक्ते से करते हैं लेकिन कामरेडों के नज़दीक रहे शर्मा जी के लिए यह ज़िंदगी की हकीकत रही जैसे कि संवेदनशील लोगों के साथ होता ही है।  धर्म कर्म को बेहद आस्था से मानने वाले इसे भगवान की मर्ज़ी समझ लेते हैं और आम तौर पर दूसरी शादी भी कर लेते हैं लेकिन शर्मा जी ने ऐसा कभी न सोचा। जानेमाने प्रगतिशील लेखक जनाब सूर्यकांत त्रिपाठी जी की तरह वह ऐसा सोच भी न पाए। 
उन्हें बार बार लगता उनकी शख्सियत का आधा हिस्सा बाला शर्मा ही थी उसे तो मौत ने निगल लिया।शर्मा जी की बातें सुन कर लगता धर्म में बिलकुल सच कहा गया है कि पत्नी अर्धांगनी ही होती है। 
हर सुख दुःख साथ साथ बांटने वाली जादू की कोई परी जो हमारा हर दुःख हर लेती है। बदकिस्मती के हर वार को खुद पर ले लेती है लेकिन हमें गमों की आंच नहीं लगने देती। सचमुच देवी ही होती है पत्नी। जो पत्नी को देवी नहीं समझते उन्हें देवी पूजा का कोई अधिकार भी नहीं होना चाहिए। इस तरह के लोग कन्या को भी देवी नहीं समझ सकते। 

आज सुबह शर्मा जी का फोन आया। कहने लगे परी आ गई। कुछ हैरानी भी हुई क्यूंकि झट से बात समझ ही नहीं आई थी। । पूछा कुछ डिटेल में बताओ तो? कहने लगे मेरे घर पोती ने जन्म लिया है न्यूज़ीलैंड की धरती पर। बहु को पांच दिन पहले ही अस्पताल में दाखिल कर लिया गया था। अलग प्राइवेट कमरा। कमरे में बहु बेटे के शिव कोई नहीं जा सकता। वहां पर आई परी। कोई साईजेरियन ऑपरेशन का ड्रामा नहीं। सब कुछ बहुत ही सहज ढंग से हुआ। पूरी तरह प्राकृतिक। नाम रखा है सीरत कौर। गौरतलब है कि मां का नाम मनप्रीत कौर है। अनुराग और मनप्रीत की बेटी सीरत कौर।  प्रदीप शर्मा जी की पोती सीरत कौर। न्यूज़ीलैंड की नागरिकता  तो उसे जन्म के साथ ही मिल गई। लेकिन यह बेटी एक पुल बनेगी भारत और न्यूज़ीलैंड के दरम्यान। दरसल कहा जाए कि यह बिटिया उन लोगों का दूत है जो मेहनत में यकीन रखते हैं और मेहनती बन कर ही परिवार की गरीबी को समाप्त करते हैं। 

उनका फोन सुनते हुए मैंने पूछा अब कैसा महसूस हो रहा है? 

जवाब में गीत गाने लगे-

मेरे घर आई एक नन्ही परी ..चांदनी के हसीन रथ पे सवार--मेरे घर आई एक नन्हीं परी। साथ ही एक छोटी सी वीडियो भी भेजी जो उनके बेटे ने वहीँ न्यूज़ीलैंड  करके भेजी। देखिए आप भी एक झलक। 


इस गीत को लिखा था साहिर लुधियानवी साहिब ने, आवाज़ दी थी लता मंगेशकर जी ने संगीत से संवारा था ख्याम साहिब ने। फिल्म थी कभी कभी। बहुत हिट हुई थी यह फिल्म। गमों के रेगिस्तान में तपती रेत पर चलते हुए कभी कभी गुलिस्तान इसी तरह खिला करते हैं। जैसे सीरत कौर आई है। आप भी सभी इस नन्हीं परी को सुस्वागतम कहिए। --रेक्टर कथूरिया 

रविवार, मई 03, 2020

इस बार कैसे दें मज़दूर दिवस की बधाई-पूछा है अनीता शर्मा ने

Sunday: 3rd May 2020 at 2:31 PM  
मज़दूर तो कोरोना महामारी के कारण घरों में भूखे बैठे है-अनीता शर्मा 
लुधियाना: 1 मई 2020: (कार्तिका सिंह//इर्द गिर्द डेस्क):: 
कामरेड कुलदीप बिन्द्र ने इस तस्वीर को सीपीआई के
वाटसप ग्रुप में मज़दूर दिवस के मौके पर पोस्ट किया
अनीता शर्मा फाईल फोटो 
मज़दूर की मेहनत और उसके बनते हक पर बहुत पहले जनाब फ़ैज़ अहमद फैज़ साहिब ने एक गीत लिखा था जो उसकी लूट की चर्चा भी करता था और उसके मज़बूत इरादों को भी दर्शाता था। गीत के शुरूआती बोल हैं:
हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे;
इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे!
मज़दूरों ने अपने अपने झंडे तले इस गीत को बार बार गाया और दोहराया। हर वर्ष पहली मई को मज़दूर दिवस के मौके पर लगने वाली स्टेजों पर इस गीत का गायन बहुत ही जोशो खरोश से हुआ करता। सन 1983 में जब "मज़दूर" फिल्म आई तो इस गीत को उसमें भी शामिल किया गया। दलीप कुमार, राज बब्बर और अन्य कलाकारों पर इस गीत के बोलों को बहुत ही खूबसूरती से पिक्चराईज़ किया गया। गीत के बोलों और कलाकारों के इशारों का समन्वय बेहद अर्थपूर्ण रहा। उस फिल्म से यह गीत उन तक भी  पहुंचा जिन्होंने इसे पेहे न कभी सुना था न ही कभी पढ़ा था। इस तरह यह गीत समाजवाद की फिलासफी ले कर घर घर तक पहुंचा। लेकिन पूंजीवाद अपनी चाल चलता रहा। बड़ी बड़ी मशीनें बनी, मोटर कारें बनी, कम्प्यूटर बने और कामकाज बेहद आसान भी हो गया। इसके बावजूद मज़दूर को इसका फायदा न हुआ। फायदा सिर्फ मालिकों को ही पहुंचा। अमीर और ज़्यादा अमीर होता चला गया और गरीब और ज़्यादा गरीब होता गया।  मशीनीकरण के बावजूद मज़दूर के काम के घंटे आठ से कम न हुए। बहुत जगहों पर तो उससे आठ से भी कहीं ज़्यादा काम लिया जाता रहा। ट्रेड यूनियनों ने जो जो कुछ किया उसकी झलक भी कई बार फिल्मों में नज़र आती रही। एक सवाल बहुत लोकप्रिय हुआ कि गरीबों के लिए उनकी लड़ाई लड़ने वाले खुद कैसे अमीर हो जाते हैं और गरीब रास्ते की धुल बन कर कहां खो जाते हैं? रास्ते की धुल बन कर खो गए मज़दूर की बात की है बेलन ब्रिगेड की राष्ट्रिय प्रमुख अनीता शर्मा ने। 
उन्होंने याद दिलाया है इस बार 2020 का मज़दूर दिवस उस वक्त आया है जब सारी दुनिया में कोरोना का आतंक और शोर है। कारोबार बंद हैं। फ़ैक्ट्रियन बंद हैं। बहुत बड़ी संख्या में रेलें और बसें भी बंद हैं। मज़दूर कोरोना महामारी के कारण घरों में बैठे हैं। करीब 40 दिन हो गए हैं उन्हें घर बैठे हुए। उनके सामने यही रास्ता बचा कि या तो भूख से तेदेपा तेदेपा कर दम तोड़ दें और या फिर पैदल ही अपने अपने गांव की तरफ चल पड़ें। मज़दूरों ने पैदल चलने को पहल दी। सैंकड़ों किलोमीटर की दूरी पर स्थित अपने गांवों में उन्हें अपना भविष्य सुरक्षित नज़र आया। बरखा दत्त, आरिफा खानुम और बहुत ऐसे अन्य पत्रकारों ने उनके इंटरव्यू सड़कों पर खुद हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करके लिए हैं। मुख्य धरा का मीडिया जिन हकीकतों को छुपा रहा था इन जांबाज़ पत्रकारों ने उन हकीकतों को जनता के सामने रखा। आने वाले वक़्त में इन छोटी छोटी वीडियो खबरों को बहुत बड़ी अहमियत मिलेगी। किसी डॉक्यूमेंट्री से कम नहीं हैं यह कवरेज। 
बेलन ब्रिगेड की राष्ट्रीय अध्यक्ष आर्किटेक्ट अनीता शर्मा ने बताया कि कोरोना वायरस के कारण हर गली- मोहल्ले और शहर में इस कड़वी हकीकत को देखा जा सकता है। देश भर के इलाकों में जो मज़दूर लोग  फैक्ट्रियों में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन में दिन रात काम करके अपना और अपने परिवार का पेट पालते थे आज घरों में बैठने को मजबूर हो गए हैं। जो मज़दूरहर रोज़  400-500 रुपये की मज़दूरी  करता था आज लंगर की लाईन में लगने को मजबूर है। ऐसे मज़दूरों के हालात हमारे देश में बहुत दयनीय हो चुके हैं।  
मज़दूरों की हालत बताते हुए मैडम अनीता शर्मा ने कहा कि इन मज़दूरों के पास बीमार होने पर दूध दवाई के लिए पैसे तो क्या घर में खाने के लिए राशन तक नहीं है। बहुत सारे मज़दूरों के पास  नीले पीले राशन कार्ड  नहीं है। कोई बैंक अकाउंट भी नहीं है। लेबर डिपार्टमेंट में उनकी कोई रजिस्ट्रेशन भी नहीं है और सरकार की तरफ से गरीब लोगो के लिए जो राशन आ रहा है वह भी इन तक नहीं पहुंचता। उस राशन को सरकारी अफसर, इलाके के नेता पार्षद विधायक मजदूरों व गरीबो में बांटने की जगह अपने अपने चहेतो सपोर्टरो में ही बांट रहे हैं।  
अनीता शर्मा ने आगे कहा कि जो लोग कॉरपोरेट फैक्ट्रियों के मालिक हैं और जिन मज़दूरों की बदौलत आज वे आलिशान कोठियों में बैठे है उन मज़दूरों को कम से कम पेट भरने के लिए राशन तो उनके घरो तक पहुंचाने का बंदोवस्त करें ताकि कोरोना महामारी के बाद जब ये लोग काम पर लौटेगे तो आपकी इस मदद का दोगुना ज्यादा लाभ देंगे।  आज लेबर डे पर इंसानियत के नाते हर  नागरिक का फर्ज बनता है कि इस कोरोना महामारी के हालात में अपने आस पड़ोस में रहने वाले गरीब मजदूरों को दो वक्त की रोटी खिला कर उनकी मदद करे। मज़दूरों के बेहतर भविष्य के लिए एक विशेष स्थायी फंड भी कायम किया जाना चाहिए। 

शुक्रवार, अप्रैल 10, 2020

जो परिवार चटनी के साथ चावल मिलाकर खाता है

अब सोचिये वो सेनिटाइजर कहाँ से खरीदेगा !
लॉक डाउन आवश्यक था। लॉक डाउन आवश्यक है। इसी से लड़ा जा सकेगा कोरोना के साथ। इस लड़ाई में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। इसके साथ ही आवश्यक है उन सवालों की चर्चा जिनकी चिंता न किसी राजनीतिक दल ने की और न ही किसी समाजिक संगठन ने। इन सवालों को उठाया है डा. अनुराग आर्य ने। आप भी देखिये ज़रा एक नज़र:
सोशल मीडिया//फेसबुक: शुक्रवार:10 अप्रैल 2020: 10:45 AM:: (इर्द गिर्द डेस्क की प्रस्तुति)
जो परिवार चटनी के साथ चावल मिलाकर इसलिए खाता है क्योंकि इस समय मसालों के लिये उसके पास पैसे नही है। अब सोचिये वो सेनिटाइजर कहाँ से खरीदेगा।
सेनिटाइजर उसके लिए लक्ज़री है। एक बड़ी आबादी के पास पीने और इस्तेमाल करने के लिये साफ पानी नही है उनसे हम कैसे कहेगे के साबुन से हाथ 20 सेकंड तक धोते रहिये। दूर गांव कस्बो के दिहाड़ी मजदूरो के आंकड़े देखने की जरूरत नही है।
अपनी कालोनी के बाहर बैठे चौकीदार को देखिए ,फल सब्जी बेचते लोगो को देखिए इस पेंडेमिक ने इनके जीवन पर कितना असर डाला होगा । रिक्शा ,ऑटोरिक्शा ना जाने कितने लोग।
ऑस्ट्रेलिया से मेरा दोस्त जब पेंडेमिक में वहां की टेस्टिंग की गाइडलाइन की बात करता है ,मैं कालोनी की गली में टहलते टहलते मुंह पर मास्क बंधे चौकीदार को देखता हूँ उससे कहता हूं यहां दूसरी बड़ी चुनोतियाँ है जिसका भारत जैसे और कई देशों को सामना करना है।
असंगठित क्षेत्रो में दिहाड़ी मजदूर की संख्या आप इमेजिन नही कर सकते ,ऐसे समय मे जब निजी उद्योग वाला भी लगातार दूसरे महीने अपने उधोग और कर्मचारियों की तनख्वाह को लेकर थोड़ा चिंतित हुआ हैं। मजदूरो की क्या हालत होगी आप सोचिये।

हम कहते है ये बीमारी सिर्फ बुजुर्गो को ज्यादा नुकसान पहुंचाती है क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता कम है ।हमारे यहां के कुपोषित बच्चों और टी बी ग्रस्त आबादी के बारे में सोचिये ,एक कमरे में बसर करते 6 लोगो के बारे में के उन्हें कैसे बतायेगे सोशल डिस्टेंसिंग क्या है ?
तो क्या केवल पैसे वाले लोग सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट की लड़ाई देर तक लड़ेंगे गर पेंडेमिक उसी इंफेक्टिविटी से इस देश मे आया तो ।
लेखक:डा. अनुराग आर्य 
मैं आंकड़ो और ग्राफ से बहुत सी डिटेल आपके सामने बात को अधिक प्रभावी बनाने के लिए रख देता पर वो महत्वपूर्ण नही है ,महत्वपूर्ण था ये बात आपको बताना।
P.S -ब्रिटेन की 32 साल की एक डॉक्टर कहती है उसने रेड कलर के शूज़ अपने आप को" चीयर" करने के लिये पहने है क्योंकी उस पर हस्पताल ने ये जिम्मेदारी दी है के वो लोगो को बताये के कहाँ म्रत्यु का सामना करना पसंद करेंगे घर पर या अस्पताल में। वो बाथरूम में जाकर रो रो कर थक गई है।

मेरे पास मरीज़ों की, डॉक्टर की कई नई कहानियां है पर मैं उन्हें आज दोहराना नही चाहता इसलिए कुछ उम्मीदों की तस्वीरें लगा रहा हूँ। कुछ के नीचे उनकी डिटेल है। 
डा. अनुराग आर्य की फेसबुक Wall से साभार 
(लॉक डाउन की तस्वीर पत्रकार संतोष पाठक ने 10 अप्रैल 2020 को बाद दोपहर खींची)

शनिवार, जनवरी 04, 2020

नहीं रहे भगीरथ नाथ चोपड़ा

शोकाकुल परिवार के पास पहुंचे परवीन बांसल और अन्य 
लुधियाना: 4 जनवरी 2020: (रेक्टर कथूरिया और इर्द गिर्द डेस्क)::
ज़िंदगी इतनी भागदौड़ करवाती है कि सांस तक ले पाना कठिन सा लगने लगता है। इतने झमेलों में से एक छोटी सी उम्र को चुरा पाना भी कभी कभी नामुमकिन सा लगने लगता है। ऐसे में अगर कोई अच्छा दोस्त मिल जाये तो नामुमकिन भी मुमकिन जैसा लगने लगता है। कुछ इसी तरह मिले थे मित्र प्रदीप चोपड़ा जी। टीवी चैनल की नौकरी। हमारे रात्रि शिफ्ट वाले ग्रुप को खबरों के बुलेटिन तैयार करते करते आधी रात हो जाती। टीवी चैनल से घर लौटना आधी रात के समय बहुत मुश्किल सा था। हालांकि चैनल की अपनी वैन भी थी जो मुझे घर छोड़ कर आती थी लेकिन कभी कभी उसका ड्राइवर रात की रोटी खाने चला जाता तो उसकी इंतज़ार के बिना कोई चारा न होता। एक रात इसी तरह ड्राईवर की इंतज़ार में चाय की चुस्कियां ले रहा था कि अचानक प्रदीप चोपड़ा जी सामने से आते नज़र आए। शायद उनके हाथ कोई देर शाम या रात को कोई बड़ी खबर लग गई थी। आते ही बोले मैं ज़रा फुटेज जमा करवा लून फिर मेरे साथ ही घर चलना। हम दोनों का घर एक दुसरे के काफी नज़दीक है इसका पता मुझे उसी दिन चला। ऊन बाज़ार जिसे पहले पहल मोच पुरा कहा जाता था और आजकल उसे ट्रंकों का बाजार भी कहा जाता है। उस बाजार के एक तरफ चोपड़ा जी का घर और एक तरफ हमारा घर। रास्ते की गलियों में अब छोटे छोटे बाजार खुल गए थे। उन्हीं दुकानों  में आती थी प्रदीप चोपड़ा जी के भाई की दुकान। हौज़री का काम था। प्रदीप जी के पिता जी भी अक्सर उसी दूकान पर बैठते।  कभी दुकान पर और कभी घर पर उनसे मिलना होता। बहुत ही प्यार और अपनत्व से सब का हालचाल पूछते। आशीर्वाद देते। साथ ही उनके चेहरे पर मुस्कराहट और चमक बढ़ जाती। बहुत मुश्किल था उनके सामने कोई झूठ बोल पाना। प्रदीप जी को कहीं ले जाना होता तो कोई न कोई बहाना सोचना पड़ता था। इस तरह उनके साथ एक स्नेह भी था और बड़ों की शख्सियत वाला डर भी था। उनके पास बैठ कर ज़िंदगी की चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत आती। अब वह नहीं रहे ,हिम्मत कौन देगा यह सवाल गंभीर बन कर खड़ा हो गया है।
मुझे याद है प्रदीप जी बताया करते थे। जब सभी भाईयों को उनका हिस्सा मिल गया तो बाकी बचे प्रदीप जी। अब इतनी दुकानें भी कहाँ से आतीं? परदीप जी ने पिता से पूछना मेरा क्या बनेगा? जवाब मिलता सबसे अच्छा। एक दिन प्रदीप जी ने पूछ लिया वह कैसे? मेरे हिस्से में तो दुकान ही नहीं बची। पिता जी बोले मैं तुझे एक नहीं कई दुकानें दूंगा। वास्तव में उन्होंने प्रदीप जी को अकाऊंट्स का काम सिखा दिया। बोले जहां जा कर भी काम करेगा समझना वह तेरी दुकान ही है। उसे बेगाना न समझना। अपना समझ कर ही काम करना।  सारा  इसी हिसाब किताब पर निर्भर होता है। आज प्रदीप चोपड़ा जी के पास बहुत सी फर्में अर्थात बहुत सी दुकानें हैं। उनके पिता मान्यवर भगीरथ नाथ चोपड़ा की की क्रिया बाजवा नगर के वेद मंदिर में थी। गरुड़ पुराण के पाठ का भोग और रस्म पगड़ी भी थी। मंदिर के हाल में आज कितने लोग आये--कितनी भीड़ थी--कैसे पूरा हाल भरा हुआ था--काश वह देख पाते। लग भी रहा था जैसे अभी कहीं से आ जायेंगे और उसी मनमोहक  मुस्कान से हम सब को हौंसला देंगें।  
प्रदीप चोपड़ा जी और परिवार के अन्य सदस्यों का दुःख बांटने के लिए हम सभी लोग भी पहुंचे। मेरे साथ डाक्टर भारत (एफ आई बी मीडिया), पत्रकार-सतपाल सोनी, पत्रकार एम एस भाटिया और कुछ अन्य लोग भी थे। हाल में बहुत से समाजिक और राजनीतिक लोग भी पहुंचे हुए थे। राजनीतिक और समाजिक चेतना को जगाने में अतिसक्रिय राजीव मल्होत्रा भी विशेष तौर पर पहुंचे हुए थे। टीवी चैनलों में कैमरामैन की ज़िम्मेदारी निभाने वाले मुकेश डोगरा भी आए। मानवता के दर्द को महसूस करने वाले पत्रकार जय कुमार भी अपनी टीम के साथ आये हुए थे। -रेक्टर कथूरिया 

गुरुवार, अप्रैल 25, 2019

नाटक विवाद को लेकर बजरंग दल क़ानूनी लड़ाई को भी तैयार

वकीलों ने कहा-हम आरोपियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दिलवाएंगे 
लुधियाना: 25 अप्रैल 2019: (इर्द गिर्द डेस्क):: 
कुछ दिन पहले यहाँ के सतीश चंद्र धवन कालेज  की एलुमनी मीट के दौरान करवाए गए एक नाटक का विवाद और गहराता जा रहा है। उल्लेखनीय है कि मराठी लेखिका रसिका अगाशे के इस लोक प्रिय नाटक "म्यूज़ियम" में कुछ ऐसे नाटक हैं जिन पर हिन्दू संगठन बजरंग दल ने ऐतराज़ उठाया है। बजरंग दल का कहना है कि हम अपने देवी -देवताओं के अपमान को सहन नहीं करेंगे। इसी मुद्दे को लेकर ये लोग पुलिस के पास गए थे। थाना डिवीजन नंबर 8 ने 295A ए के तहत प्रिंसिपल धर्म सिंह संधू, प्रोफेसर  संधू, नीलम भारद्वाज और 12 स्टूडेंट पर मामला दर्ज किया गया। बजरंग दाल के स्थानीय प्रमुख चेतन मल्होत्रा के मुताबिक इस मामले का ऍफ़ आई आर नंबर 0118 है। बजरंफ दल के मुताबिक आज गुरुवार को नीलम द्धारा सैशन कोर्ट में बेल की अर्जी दी गयी। बजरंग दल का कहना है कि यह अर्ज़ी झूठ के आधार पर थी इस लिए अर्ज़ी देने वालों की पराजय भी निश्चित थी। इस मुद्दे में संगठन की ओर से  एडवोकेट मुनीश मित्तल, एडवोकेट राहुल रल्हन, एडवोकेट गौतम कमल मित्तल की तरफ से मामले की पैरवी की गयी। बजरंग  दल का कहना है कि हमारे दवाब को देखते ही आरोपी के वकील ने बेल की अर्जी वापिस ली।
इसी बीच डवोकेट मुनीश मित्तल और एडवोकेट राहुल रल्हन ने कहा कि हम आरोपियो को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाएंगे। अब देखना है कानून क्या रास्ता अख्तियार करता है। 

रविवार, मई 20, 2018

FIB की नई पहल:पंजाब में नशे के जहर को रोकने की तैयारी

एक एक चेहरा किया जायेगा बेनकाब 
लुधियाना:19 मई 2018: (इर्द गिर्द टीम)::  
F.I.B. Media Inteligence Service  फिर तैयार है।  इस बार एक  नै जंग का ऐलान। पंजाब को नशे के ज़हर से अब हर तरह मुक्त किया जायेगा। इस मकसद के लिए इस संगठन ने अपनी कमर कस ली है। संगठन के प्रमुख डाक्टर भारत ने बताया कि हम किसी दबाव में आने वाले भी नहीं और न ही किसी लालच के जाल में। हमें अपने नेटवर्क से जो भी सूचना मिलेगी हम उस का पता लगाएंगे। हम न तो अदालत है और न ही पुलिस लेकिन नशे का ज़हर फ़ैलाने वाले हर चेहरे को हम बेनकाब अवश्य करेंगे। हमारे संगठन से हमदर्दी रखने वाले लोग उस मामले को मीडिया तक भी ले जायेंगे, अदालत तक भी और पुलिस तक भी। हम अपना काम करेंगे और हमारे सहयोगी अपना काम करेंगे। 
डाक्टर भारत ने कहा कि जबतक समाज के अग्रणीय व सामाजिक संगठन खुलकर पुलिस प्रशासन का सहयोग नहीं करते रब तक समाज में फ़ैल चुके नशे रूपी कुष्ट रोग के इस कैंसर को नहीं ख़त्म किया जा सकता।  यह जंग अकेले पुलिस के बस की बात नहीं जो समाज में फैली इन बुराइयों को ख़त्म  कर सके।इसके साथ बहुत सी अन्य बुराईयां भी जुडी हुई हैं।
      इस मीटिंग में डाक्टर भारत ने कहा कि वही देश समाज तरक्की कर आगे बढ़ कर शक्तिशाली हो सकता है जिस देश के नागरिक अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए  असामाजिक तत्वों और बुराइयों के खिलाफ दृढ़ता से खड़े होकर मुकाबला कर जड़ से उखाड फेकने में सक्षम हों।  यह जाहिर  हो चूका है की कुछ तथाकथित राजनीतिक और कुछ भ्र्ष्ट नौकरशाहियों की वजह से हर तरह के अपराध जहाँ बढ़ते जा रहे हैं वहीँ कैंसर कोढ़ रूपी नशीले वस्तुवें  चिट्टा , ब्राउनशुगर , सिन्थेटिक , हैरोइन जैसी घातक ड्रग्स ने समाज को विकृति और खोखला कर दिया है। 
       इन्ही सब बातों को लेकर  राष्ट्र हित में काम करने वाला यह जानामाना गुप्तचर मीडिया संगठन  अब पूरी तरह सक्रिय है। (F.I.B. फर्स्ट इन्वेस्टीगेशन ब्यूरो) के मुख्य कार्यालय, जो लुधियाना के सिविल लाइन्स क्षेत्र में है के कार्यालय में  पंजाब मार्केटिंग मुलाजिम जत्थेबंदी के अकाउंटेंट सुपरिंटेंडेंट सुरजीत सिंह जोहल ( जालंधर ) पंजाब एलेक्ट्रसिटी बोर्ड़ रोपड़ से जूनियर इंजीनियर दर्शन सिंह , पंजाब  सरकार सेवा  के पूर्व अधिकारी  हरजीत सिंह मरिंडा रोपड़ ,   आनंदपुर साहिब से पंजाब बिजली बोर्ड के रि. अधिकारी दर्शन सिंह  व बलजिंदर सिंह संधू  ने ब्यूरो के डायरेक्टर = अध्यक्ष  डॉ.  भारत से विशेष मुलाक़ात  कर  जहाँ देश समाज में ब्याप्त बुराइयों को रोकने और संगठन द्वारा राष्ट्र हित में किये जा रहे कार्यों को सहयोग करने का बचनबद्ध हुए।  अलग अलग इलाकों के लोगों से अलग अलग बैठकों का यह सिलसिला अभी जारी है। 

शनिवार, मार्च 24, 2018

खुदकुशियों के मौसम में भी ज़िंदगी के गीत गुंजा रहे है PAU के किसान मेले

आंवला कैंडी से ले कर सोलर कूकर तक सफलता की गौरवगाथा 
लुधियाना: 24 मार्च 2018: (कार्तिका सिंह//इर्द गिर्द)::
हालात कुछ भी हो सकते हैं।  अच्छे भी बुरे भी। हम सभी की ज़िंदगी हमें बहुत से कड़वे अनुभव भी करवाती है जो हमें हर बार कोई न कोई नई सीख दे कर जाते हैं। यह कडुवाहट उस कड़वी दवा की तरह होती है जो हमारी बीमारी को ठीक कर के एक नयी ज़िंदगी देती है। संघर्ष की इस बेचैनी के बाद जो  स्कून मिलता है उसके आनंद की बराबरी जल्दी किये सम्भव ही नहीं होती। 
गुरवंत सिंह ने भी ऐसे दिन देखे। राजनीतिक सोच वामपंथी रही।  सीपीआई से जुड़े हुए भी हैं। इस सब के बावजूद विचारों में कभी कटड़ता नहीं आने दी। अन्ना हज़ारे के ग्रुप से संदेश आये तो उन को भी सहयोग दिया और अगर मेधा पाटेकर के साथियों ने कुछ कहा तो उनका भी साथ दिया। मकसद था बदलाव-किसी भी बहाने--किसी भी तरह। 
बदलाव का यह प्रयास केवल सियासत के मामले में नहीं था। उन्होंने व्यक्तिगत ज़िंदगी में भी हर पल स्वस्थ बदलाव के लिए निरंतर साधना की। खुद फैक्ट्री का मालिक होते हुए भी ज़रूरत पड़ने पर मज़दूरों की तरह काम किया। खेती विरासत मिशन की तरफ झुकाव हुआ तो उनका भी सक्रिय हो कर साथ दिया। 
समाज सेवा की तरफ लगातार बढ़ते रहे इस झुकाव ने काम-काज चौपट कर दिया। भाई की मौत ने उन्हें बहुत गहरा सदमा दिया। निराशा के इस गहन अँधेरे में एक बार फिर हिम्मत का हाथ पकड़ा।  हिम्मत ने रास्ता दिखाया। इस मामले में एक बार फिर पत्नी से भी साथ मिला और बेटियों से भी। पीएयू की ट्रेनिंग ने नया उत्साह और नई ऊर्जा दी। 
सोलर ऊर्जा की तरफ भी प्रयास किये जो कामयाब रहे। ज़िंदगी जो जो रंग दिखाती रही--गुरवंत सिंह उन्हें ध्यान से देखते भी रहे स्वीकार भी करते रहे। फिर धीरे धीरे उभरने लगा एक नया रंग। रात्रि के गहन अँधेरे के बाद उषा की लालिमा दस्तक देने लगी। 
गुरवंत सिंह की ज़िंदगी में एक नई ज़िंदगी की सुबह आने लगी। धोखे-फरेब और की विश्वासघात  की चोटों के बाद मिली संघर्ष से मिली सफलता की चमत्कारी मरहम। इस मरहम ने अपनों से मिली चोटों से लगे ज़ख्मों का दर्द दूर किया। एक नई राहत दी। नया हौंसला दिया। जिंदगी ने एक बार फिर सफलता की रफ्तार पकड़ ली। आज फिर गुरवंत सिंह सफलता की नई शिखरें छूने के लिए तैयार हैं। किसान मेले में उनसे और उनके परिवार से हुई भेंट यादगारी रही। उनके स्टाल पर आंवला कैंडी से ले कर आंवला शर्बत और सोलर कुकर तक बहुत कुछ था जो किसान मेले में आये लोगों को आकर्षित कर रहा था। गर्मी की धुप और किसान मेले के रास्तों से उड़ती धूल ने सारे परिवार के चेहरों का रंग कुछ सांवला कर दिया था लेकिन इस के बावजूद संघर्ष से मिली सफलता की चमक अपना रंग दिखा रही थी। जिम्मेदारियों का बोझ वरिष्ठता की गंभीरता भी दिखा रहा था। अपने पांवों की मजबूत होती स्वतन्त्रता की ख़ुशी भी सभी के चेहरों पर नजर आ रही थी। उनसे हुई बातचीत आप देख सकते इस पोस्ट के साथ दी गई वीडियो में। उन्हें देख कर याद आ रही हैं स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की पंक्तियाँ:
कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। 
किसान मेले लगते रहें। खुदकुशियों के मौसम में भी ज़िंदगी के गीत गूंजते रहें। निराशा के गहरे अंधेरों में भी संघर्ष का सूर्य चमकता रहे। ऐसी बहुत सी उमीदें हैं जो गुरवंत सिंह जैसे परिवारों को देख कर पूरी होने का विश्वास होने लगता है। सपनों को साकार करने का यह काफिला बढ़ता रहे। इसी कामना के साथ। 
                                                                                             -कार्तिका सिंह

सोमवार, अक्टूबर 07, 2013

सड़कों पर पहुंचा लुधियाना का मजदूर आंदोलन

Mon, Oct 7, 2013 at 5:30 PM
श्रम विभाग पर रोषपूर्ण प्रदर्शन:चौथे दिन भी नहीं हुआ कोई फैसला 
लुधियाना:07 अक्टूबर 2013: (*विश्वनाथ//पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):ऊपर खुला आसमान, नीचे जमीन, कड़कती धुप में एक बार बुलंद हो रहा था वही पुराना नारा---
हर जोर ज़ुल्म की टक्कर में हडताल हमारा नारा है    
आज हड़ताली टेक्सटाइल मजदरों ने श्रम विभाग कार्यालय पर रोषपूर्ण प्रदर्शन किया। वास्तव में उनके पास कोई और रास्ता शायद बचा ही नहीं था। श्रम विभाग ने मजदूरों और मालिकों को आज की तारीख पर श्रम कार्यालय बुलाया था। लेकिन वहाँ न मालिक मिले न श्रम अधिकारी। टेक्सटाइल-हौजरी कामगार यूनियन के अध्यक्ष राजविन्दर ने बताया कि मालिकों के साथ साथ श्रम अधिकारियों द्वारा अपनाए जा रहे यह मजदूर विरोधी रवैया मजदूरों को कतई झुका नहीं पाएगा बल्कि इससे मजदूरों में रोष को और भी बढ़ गया है। मजदूर अपने अधिकार हासिल करके ही काम पर लौंटेंगे भले ही उन्हें कितनी भी लम्बी हड़ताल क्यों न लडऩी पड़े। जैसे साहिर साहिब के शब्दों में कह  रहे हों---
तुम समझौते की आस रखो हम आगे बढ़ते जायेंगे 
इस समय 36 कारखानों के मजदूर टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन के नेतृत्व में हड़ताल पर हैं। 40 कारखानों में पहले ही 15 प्रतिशत वेतन/पीस रेट वृद्धि और 8.33 प्रतिशत सालाना बोनस की माँग पर समझौता हो चुका है। लेकिन 36 कारखानों के मालिक मजदूरों को उनके कानूनी अधिकार देने को तैयार नहीं हैं। 
श्रम विभाग कार्यालय पर हुए प्रदर्शन में कई अन्य संगठनों के नेताओं ने समर्थन जाहिर किया। प्रर्दशन को टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन के अध्यक्ष राजविन्दर, कारखाना मजदूर यूनियन के संयोजक लखविन्दर, मोल्डर एण्ड स्टील वर्कज यूनियन के हरजिन्दर सिंह, इंटक के उपाअध्यक्ष सबरजीत सिंह सरहाली व टेक्सटाइल-हौजरी कामगार यूनियन के समिति सदस्यों विश्वनाथ, प्रेमनाथ, गोपाल आदि ने सम्बोधित किया। सभी मजदूरों ने जोशीले नारों के साथ यह ऐलान किया कि उनकी लड़ाई हक हासिल होने तक जारी रहेगी।

*विश्वनाथ टेक्सटाइल-हौजरी कामगार यूनियन, पंजाब (रजि.) के सचिव हैं   

गुरुवार, अगस्त 22, 2013

बीएसएनएल इंप्लाइज यूनियन तीन दिवसीय हडताल पर

बुधवार से बजाया हडताल का बिगुल
लुधियाना:21 अगस्त 2013:(रेक्टर कथूरिया//इर्द गिर्द ब्यूरो): अपनी मांगों पर जोर देने के लिए भारत संचार निगम लिमिटेड के कर्मचारी एक बार फिर संघर्ष की राह पर हैं। बीएसएनएल इंप्लाइज यूनियन एंड नेशनल फेडरेशन के सदस्यों ने बुधवार को अपनी मांगों को लेकर बड़े हो जोशो खरोश से तीन दिवसीय हड़ताल की शुरुआत की। इस दौरान इन मुलाज़िमों ने अपनी मांगों को लेकर मैनेजमेंट के खिलाफ जमकर नारेबाजी भी की और इस मुद्दे पर अपनी एकजुटता का सबूत दिया।
 इस बार भी इन संघर्षशील मुलाज़िमों को न तो कड़कती धुप की कोई चिंता थी और न ही बार बार घिर  कर बरसात करते बादलों की। ये मुलाजिम अपनी ही धुन में मग्न थे और याद दिल रहे थे अपने इरादों की-जैसे कह रहे हों-हर जोर-ज़ुल्म की टक्कर में हडताल हमारा नारा है !  यूनियन के डिस्ट्रिक्ट सेक्रेट्री बलविंदर सिंह ने कहा कि मैनेजमेंट द्वारा उन्हें दी जाने वाली एटीसी व मेडिकल सुविधा में उनकी मांग के अनुसार मसौदा तैयार नहीं किया गया इस लिए वे मजबूर होकर हडताल की राह पर उतरे हैं। 
उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा बंद किया पांचवा मेडिकल शुरू हो, पीएलआइ बोनस दिया जाए, 1-1-2007 के बाद भर्ती किए गए कर्मचारियों की वेतन बढ़ाया जाए, कर्मचारियों को ईएसआइ और आइकार्ड की सुविधा दी जाए, कर्मचारियों में किसी तरह की कोई छंटनी न की जाए, आदि उनकी मांगें हैं। मुलाजिम नेता बलविंदर सिंह ने कहा कि जबतक मैनेजमेंट उनकी मांगे नहीं मानेगी, तब तक धरना-प्रदर्शन जारी रहेगा। हम अपनी मांगें मनवाए बिना चैन से नहीं बैठेंगे। 
इस मौके पर बुध सिंह, परमीत सिंह, अवतार सिंह जंडे, अमरजीत चंदर, जसवंत सिंह, गुरचरण सिंह, सुरिंदर सिंह, सुरजीत सिंह, तजिंदर सिंह, प्रेम सिंह, सुदेश जोशी, अमरीक सिंह, सुरजीत सिंह, भगवंत सिंह, आरपी जाहू, विजय वर्मा, मोहिंदर सिंह, मलकीत चंद व यूनियन के बहुत से अन्य नेता व सक्रिय सदस्य भी मौजूद थे। अब देखते हैं कि सरकार के दरबार में इनकी सुनवाई कब होती है और कब होता है इनकी जीत का जश्न ?
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