शुक्रवार, अप्रैल 29, 2022

हम ऐसे इंसान बनेंगे कब किस दिन?

क्या रहस्य है हिमांशु कुमार जी के चेहरे की शांति और चमक का 


लुधियाना: 29 अप्रैल 2022: (रेक्टर कथूरिया//इर्दगिर्द डेस्क)::

कुछ बरस पूर्व हिमांशु कुमार जी लुधियाना में थे। किसी पत्रकार सम्मेलन के संबंध में आए थे। पत्रकारों के हर सवाल का जवाब उन्होंने बहुत ही शांति से दिया था। हर पहलू को अपने नज़रिए से बहुत ही बारीकी से रखा था।यह मेरी खुशकिस्मती थी कि उनके पास बैठने और उनसे बातें करने के कुछ पल मुझे अन्य लोगों से ज़्यादा मिल गए थे क्यूंकि मैं निश्चित समय से कुछ पहले ही वहां पहुँच गया था। उनके पास बैठ कर एक स्कून का अहसास होता। उनका चेहरा उनकी बातों से ज़्यादा बोलता था। मौन रह कर भी वे मुस्कराते हुए बहुत कुछ ऐसा कह जाते जिन्हें शब्दों में बताना मुश्किल सा है। उनके पास बैठ कर प्रकृति के पास बैठने जयसा अहसास होता। उनके सामीप्य में एक निडरता और निर्भयता का अहसास होता। एक गहन शांति सी मिलती। उनके चेहरे पर भी एक खास चमक थी और आँखों में भी। आज उनकी एक पोस्ट देखी तो कुछ कुछ समझ में आया कि यह शांति और चमक कहां से आ रही थी। --रेक्टर कथूरिया 


हिमांशु कुमार जी अपने लाईफ स्टाईल की जानकारी देते हुए बताते हैं:

जब हम आदिवासियों के पक्ष में आवाज़ उठाते हैं, तो बहुत से खाते पीते मौज की ज़िन्दगी जीने वाले सवर्ण हमसे कहते हैं कि तुम लोग विदेशी एजेंट हो, डालर से चंदा लेते हो, हवाई जहाज से घूमते हो सरकार के बारे में झूठा प्रचार करते हो, और आदिवासियों का विकास रोकते हो, तुम लोग विकास विरोधी हो आदि आदि। 

तो कुछ बातें साफ़ साफ़ बता दूं, मेरा कोई एनजीओ नहीं है, मैं किसी भी संगठन का सदस्य नहीं हूँ, मैं डालर, पाऊंड, रूबल या रूपये में किसी से चंदा नहीं लेता,मैं अनुवाद का काम करता हूँ, तथा लेख लिखता हूँ और अपना परिवार का काम चलाता हूँ। 

पहले छत्तीसगढ़ में संस्था के आश्रम में रहता था। वहाँ से निकलने के बाद दिल्ली में रहा लेकिन दिल्ली में ज्यादा खर्च होता था इसलिए अब हिमाचल के एक गांव में रहता हूँ. ताकि कम खर्च में गुज़ारा हो जाए। 

मेरी दो बेटियाँ हैं दोनों घर पर पढ़ती हैं उनका स्कूल कालेज का कोई खर्चा नहीं है। हम सभी शाकाहारी हैं सस्ता गांव का चावल और सब्जियां खाते हैं, एसी कूलर की ज़रूरत नहीं है। 

मेरे नाम से पूरी दुनिया में कोई ज़मीन नहीं है, मेरा कोई मकान नहीं है, ना ही मैंने किसी दुसरे के नाम से कोई ज़मीन मकान कभी खरीदा है क्योंकि कभी मेरे पास इतना पैसा रहा ही नहीं। मैं हमेशा किराए के मकान में रहा हूँ।

मैं किसी का अनुयायी नहीं हूँ ना गांधी का ना मार्क्स का ना अम्बेडकर या किसी और का,मैं इन सभी के अच्छे विचारों से प्रेरणा ज़रूर लेता हूँ। मैं एक मुक्त इंसान हूँ, मेरे दोस्त न्याय की लड़ाई लड़ने वाले दलित आदिवासी, अल्पसंख्यक हैं। 

मैं अपने जन्म से मिली जाति धर्म सम्प्रदाय और राष्ट्र के नकली गर्व को छोड़ चूका हूँ, मैं अपने खुद के धर्म की तलाश में हूँ अभी तक मुझे यही समझ में आया है कि मैं सत्ता के दमन का विरोध और पीड़ित की मदद करूं यही मेरे लिए सबसे अच्छा धर्म है।  

सभी सरकारें मुझे नापसंद करती रही हैं कांग्रेस की भी और भाजपा की भी। मेरे लिखने और पीड़ितों की मदद करने के कारण मुझे कभी भी जेल में डाला जा सकता है या मेरी हत्या करी जा सकती है। 

मुझे अब तक के जीवन पर पूरा संतोष है। मैं सदैव उत्साह और खुशी से भरा रहता हूँ मेरे मन पर कोई बोझ नहीं है। मुझे शान्ति प्राप्त करने के लिए किसी गुरु या ईश्वर की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती। 

मेरे लिए ये दुनिया बहुत आश्चर्यजनक जगह है मैं रोज़ इसमें एक उत्सुक बच्चे की तरह जागता हूँ और दिन भर उत्साह से भरा रहता हूँ। मेरे ज्यादातर दोस्त मेरी ही तरह के लोग हैं मैं उनकी संगत में बहुत आनन्द से जी रहा हूँ। 

बुधवार, फ़रवरी 16, 2022

बहुत दम है इन जांबाज़ लेकिन वफादार कुत्तों में

अमेरिकी सेना: कदम से कदम मिला कर चलते चार पैरों वाले फाईटर


इंटरनेट वर्ल्ड
: 16 फरवरी 2022: (इर्दगिर्द के लिए कार्तिका सिंह की खोज)::

बहुत सी हिंदी फिल्मों में जानवरों और इंसानों का प्रेम और हमदर्दी शिद्द्त से दिखाया गया है। किसी में हाथी से दोस्ती,  किसी में बंदर से, किसी में कुत्ते से और कहीं कहीं और मिसालें भी हैं। ऐसी बहुत सी फ़िल्में हैं जिनमें जानवर अपनी सीमाओं से विकास करते करते बल्कि उनसे भी कहीं पार जा कर इंसान की सहायता करते हैं। उनके लिए बाकायदा ज़िंदगी  के संघर्ष में भाग लेते हैं। इस तरह की मिसालें केवल भारत में ही नहीं विदेशों में भी हैं। आम लोगों के साथ साथ सेना में भी कुत्तों पर विशेष ध्यान दिया जाता है और उन्हें बाकायदा महंगी ट्रेनिंग दी जाती है। 

अमेरिकी सेना में जो ट्रेनिंग प्रोग्राम चलते हैं उनमें इस तरह एकमात्र नस्ल बेल्जियम मालिनोइस भी है जिसे उनकी उच्च ऊर्जा, मजबूत खोजी, प्रशिक्षण क्षमता, चपलता, गति, ड्राइव, कार्य नैतिकता, वफादारी और जब आवश्यक हो, उग्रवादियों के कारण सेना के लिए उसके दुश्मनों के साथ सख्त से सख्त जंग भी लड़नी। इसे इस दिशा में आदर्श माना जाता है। वे जर्मन शेफर्ड से मिलते जुलते हैं, लेकिन वास्तव में उनसे भी कहीं अधिक कॉम्पैक्ट हैं।

सूंघना, पहचान लेना, भाग कर पकड़ लेना जैसी इनकी बहुत सी खूबियां हैं। आग हो या पानी बस इसे आदेश की इंतज़ार रहती है। सड़क का सफर हो जा ट्रेन का या हवाज़ी जहाज़ का इसे कभी डर नहीं लगता। इसे सेना की महंगी ट्रेनिंग से पूरी तरह तैयार किया जाता है। इसमें हर आपातकाल से निपटने की पूरी तरह से क्षमता है। यह तस्वीरें और जानकारी अमेरिक रक्षा विभाग से साभार ली गई है। 

अमेरिकी सेना में कदम से कदम मिला कर चलते चार पैरों  वाले फाईटर 

रविवार, दिसंबर 19, 2021

जब देवी कृपा करती है तब हर दुःख को वह हरती है

 बहुत ही समृद्धि वाला होगा इस नन्हीं परी का आना


लुधियाना
: 18 दिसंबर 2021: (रेक्टर कथूरिया//इर्दगिर्द डेस्क)

नन्ही परी सीरत कौर 
कोई ज़माना था जब हम जोश, सम्मान और स्नेह में गाया करते थे-- 

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा!

हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलिस्तां हमारा!

इस गीत को मैंने अपने रेडियो प्रोग्रामों में भी इस्तेमाल किया। इसके गायन से सबंधित जितने अंदाज़ थे तकरीबन सभी बहुत अच्छे गाए हुए हैं। फिर तकनीकी विकास शुरू हुआ तो इस भावना में तब्दीली जैसी रफ्तार भी तेज़ थी। पहले पहल कुछ अटपटा भी लगा फिर एक अहसास ज़ोर पकड़ने लगा की सारी दुनिया ही अपनी है। पूरा संसार अपने किसी गांव जैसा ही तो है।कभी कभार तो ऐसा भी लगता कि लोकल बात करनी मुश्किल है लेकिन विदेश में बात करनी आसान है। इस तरह दूरियां नज़दीकियों में बदलती रहीं। 

फेसबुक, व्टसप और वीडियो कालिंग ने तो इस अहसास को तेज़ी से बढ़ावा दिया। जो बच्चे विदेशों में गए हुए हैं रोज़ी रोटी के लिए उनसे बात करनी बेहद आसान हो गई है अब। उनसे आमने सामने जैसी बात का अहसास होता है। वहां के गलियां बाजार अपने अपने से लगते हैं। इसके बावजूद भी अगर हमें उनकी दूरी बार बार खलती तो उनको भी इस दूरी का अहसास शिद्दत से होता ही है। लेकिन तकनीक उस तकलीफ को कम कर देती। किसी ने इस तकलीफ को देखना हो तो उस ग़ज़ल से देख भी सकता है, सुन भी सकता है और समझ भी सकता है--चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है। इस गीत में इस दर्द का अहसास शिद्दत से होता है। इस गीत को फिल्म "नाम" के लिए लिखा था आनंद बक्शी साहिब ने और संगीत तैयार किया लक्ष्मी कान्त प्यारे लाल जी ने। आवाज़ दी थी पंकज उधास साहिब ने। इसकी आगे की पंक्तियाँ हैं:-

-चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है। 

बड़े दिनों के बाद, हम बेवतनों को याद -२

वतन की मिट्टी आई है, चिट्ठी आई है ...


ऊपर मेरा नाम लिखा हैं, अंदर ये पैगाम लिखा हैं -२

ओ परदेस को जाने वाले, लौट के फिर ना आने वाले

सात समुंदर पार गया तू, हमको ज़िंदा मार गया तू

खून के रिश्ते तोड़ गया तू, आँख में आँसू छोड़ गया तू

कम खाते हैं कम सोते हैं, बहुत ज़्यादा हम रोते हैं, चिट्ठी ...


सूनी हो गईं शहर की गलियाँ, कांटे बन गईं बाग की कलियाँ -२

कहते हैं सावन के झूले, भूल गया तू हम नहीं भूले

तेरे बिन जब आई दीवाली, दीप नहीं दिल जले हैं खाली

तेरे बिन जब आई होली, पिचकारी से छूटी गोली

पीपल सूना पनघट सूना घर शमशान का बना नमूना -२

फ़सल कटी आई बैसाखी, तेरा आना रह गया बाकी, चिट्ठी ...


पहले जब तू ख़त लिखता था कागज़ में चेहरा दिखता था -२

बंद हुआ ये मेल भी अब तो, खतम हुआ ये खेल भी अब तो

डोली में जब बैठी बहना, रस्ता देख रहे थे नैना -२

मैं तो बाप हूँ मेरा क्या है, तेरी माँ का हाल बुरा है

तेरी बीवी करती है सेवा, सूरत से लगती हैं बेवा

तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुड़ाया

पंछी पिंजरा तोड़ के आजा, देश पराया छोड़ के आजा

आजा उमर बहुत है छोटी, अपने घर में भी हैं रोटी, चिट्ठी ...

हमारे लीडर विकास के ढिंढोरे पीटते रहे लेकिन असलियत में हमारे बच्चे विदेशों में जा बसे। उनकी कमाई से कर्ज़े उतरने लगे जो शायद वैसे सम्भव ही नहीं थे। उनकी कमाई से घरों में आधुनिक साज़ो सामान आने लगा। मुझे याद है बहुत से जानकार लोग जिनके घरों में पहला टीवी सैट उनके बच्चों की इस कमाई से ही आ पाया। सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां फिर भी मन में बना रहा लेकिन एक दर्द भरी चाहत भी जागने लगी कब होगा हमारा देश इतना समृद्ध कि किसी बच्चे को रोज़ी रोटी और कर्ज़ों को उतारने के लिए विदेश न जाना पड़े। इस भावना को भी दशकों गुज़र गए। टीवी सैट ब्लैक ऐंड व्हाईट से कलर्ड हो गए। लेकिन आर्थिक कमज़ोरियाँ बनी रहीं। अब भी याद आतीं हैं सुरजीत पात्तर साहिब की पंक्तियां:

जो बदेसां च रुल्दे ने रोटी लई, ओह जदों देस परतणगे अपने कदी;

जां तां सेकणगे मां दी सिवे दी अगन; ते जां कबरां दे रुख हेठ जा बैहणगे!  

प्रदीप जी का बेटा अनुराग शर्मा
अपनी बेटी सीरत कौर के साथ 
समाज के इस तरह के दुःखों और दर्दों को लेकर बहुत पुराने वामपंथी सांस्कृतिक संगठन इप्टा से जुड़े प्रदीप शर्मा ने भी काफी कुछ किया। कई नाटक लिखे और उनके मंचन में भी सहयोग दिया। सख्त मेहनत करके भी इतना वक्त न बचता कि कला के लिए कुछ विशेष कर सकें। जो मन में है वो कर सकें। कोई नाटक, कहानी, नावल या कुछ और नया देख या पढ़ सकें।   

तंगियां, तुर्शियां और चिंता-फ़िक्र ज़िंदगी का एक अंग बने रहे। इन्होने कभी पीछा न छोड़ा। एक परछाईं की तरह यह सब साथ रहते। फिरइनकी आदत ही पक गई। ख़ुशी  आ भी जाती तो चिंता होने लगती कि शायद धोखे  आ गई होगी। या फिर अपने साथ छुपा कर कोई गम लाई होगी। वरना ख़ुशी और हमारे पास  कैसे? यहाँ याद आ रही है जनाब कतील शिफ़ाई साहिब की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल की कुछ पंक्तियां:

वफ़ा के शीशमहल में सजा लिया मैनें,

वो एक दिल जिसे पत्थर बना लिया मैनें,

ये सोच कर कि न हो ताक में ख़ुशी कोई,

गमों की ओट में खुद को छुपा लिया मैनें,

कभी न ख़त्म किया मैंने रोशनी का मुहाज़,

अगर चिराग बुझा तो दिल जला लिया मैनें,

कमाल ये है कि जो दुश्मन पे चलाना था,

वो तीर अपने ही कलेजे पे खा लिया मैनें।

घुटन, तंगदस्ती और इन्हीं चिंताओं में शर्मा जी सरकारी नौकरी से रिटायर हो गए। ख़ुशी भी थी परिवार के साथ रहने की लेकिन गम था संगी साथी छूट जाने का। आगे गुज़ारा कैसे होगा इसकी चिंता भी थी। उस रिटायरमेंट के वक्त कुछ लाख रुपयों की रकम मिली जो शर्मा जी को भारी भरकम भी लगी। लेकिन यह भी एक खाम ख्याली जैसी ही बात थी। उसका नशा भी ज़्यादा देर तक रहने वाला नहीं था।  

मध्यवर्गीय परिवारों में पैसे आते बाद में हैं उनके खर्च होने की लिस्ट झट से बनी होती है। घर का राशन, बच्चों की स्कूल फीसें, कर्ज़े उतारने के लिए बनी हुई किस्तें, खुशियों गर्मियों में आना जाना-यह सब पहले से ही तैयार होता है। कभी कभार पीज़ा या गोलगप्पे बाजार में निकल कर खा लिए जाएं यही बहुत बड़ी पार्टी ह जाती है। बहुत बड़ी सेलिब्रेशन। बाकी चाहतें, बाकी इच्छाएं तो उम्र भर दबी ही रह जाती हैं। खुद की भी परिवार की भी। बस यही है ज़िंदगी का सच। 

इस परिवार के सदस्यों की भी कुछ अपनी अपनी इच्छाएं थे। सबसे छोटा बेटा अनुराग विदेश जाने की चाहत लिए बैठा था। उसके मन में यह बहुत देर से ही थी। उसे लगता था कोई बड़ा कदम उठा क्र ही घर की हालत बदल सकती है। छोटे बच्चे अक्सर ज़्यादा जोशीले होते हैं और ज़्यादा हिम्मती भी। वे रिस्क उठाने में बहुत तेज़ होते हैं। आर्थिक कमज़ोरी के हालात में बच्चे अपनी छोटी छोटी इच्छाएं भी बहुत बार सोच सोच कर बताते हैं कि कहीं घर का बजट न बिगड़ जाए। विदेश जाना तो बहुत बड़ी बात थी। लेकिन अनुराग ने हिम्मत की। अपनी इच्छा सभी को ज़ाहिर कर दी। कहा आप बेशक इन्वेस्टमेंट समझ कर कर दो। आप मेरे लिए कुछ खतरा उठा लो। परिवार के सभी लोगों ने भी ज़ोर देते हुए बेटे का ही साथ दिया। इस तरह वह रकम उसे विदेश भेजने में खर्च हो गई।  

इस तरह गुज़ारा फिर से तंग होने लगा। थोड़े बहुते तकरार भी होने लगे। जब जेब खाली हो तो गुस्सा भी खुद पर या अपनों पर ही आता है। जानेमाने लेखक और ज्योतिषी डा. ज्ञान सिंह मान कहा करते थे-बलशाली सब को खाता है-बलहीन खुद को खता है-ऐसी हालत में अपने ही लोग बुरे लगते हैं और फिर वही दिलासा भी देते हैं। काम भी आते हैं। उसे विदेश भेज दिया गया। फिर उसी बेटे ने वहां एक लड़की पसंद कर ली। लड़की पंजाब की ही थी मनप्रीत कौर। दोनों ने कहा कि हम माता पिता का आशीर्वाद लिए बिना शादी न करेंगे। दोनों पंजाब आए। धार्मिक रस्मों के बाद शानदार पार्टी भी हुई। फिर बात आई गई हो गई। कोरोना के कहर ने सब कुछ भुला दिया। आर्थिक तरक्की में इस बेटे ने भी बहुत योगदान दिया। शर्मा जी की एक आवाज़ और मिनटों में ही पैसे इनके खाते में पहुंच जाते हैं। 

पत्रकारिता में सक्रिय प्रदीप शर्मा 
खुशियां फिर से लौटने लगीं। चेहरे के साथ साथ आंखों की चमक भी बढ़ने लगी। माहौल फिर से खुशगवार हो गया। प्रदीप शर्मा जी स्टेज के साथ साथ पत्रकारिता में भी रूचि दिखाने लगे। ऑनलाइन मुशायरों में भी दिलचस्पी बढ़ने लगी। लेकिन खुशियां थोड़े समय की ही रहीं। हम जैसे आर्थिक कमज़ोरी के मारे लोगों की किस्मत में ख़ुशी की झलक भी आ जाए तो भी गनीमत है। 
कुछ देर बीमार रहने के बाद पत्नी बाला शर्मा का देहांत गया। सी एम सी अस्पताल में जो भरी भरकम खर्चा हुआ वह अलग हुआ। खर्चा कर के भी उसे बचाया न जा सका यह सदमा अलग लगा। मन ज़िंदगी से उचाट सा हो गया। लोग तो अर्धांगिनी की बात धार्मिक नुक्ते से करते हैं लेकिन कामरेडों के नज़दीक रहे शर्मा जी के लिए यह ज़िंदगी की हकीकत रही जैसे कि संवेदनशील लोगों के साथ होता ही है।  धर्म कर्म को बेहद आस्था से मानने वाले इसे भगवान की मर्ज़ी समझ लेते हैं और आम तौर पर दूसरी शादी भी कर लेते हैं लेकिन शर्मा जी ने ऐसा कभी न सोचा। जानेमाने प्रगतिशील लेखक जनाब सूर्यकांत त्रिपाठी जी की तरह वह ऐसा सोच भी न पाए। 
उन्हें बार बार लगता उनकी शख्सियत का आधा हिस्सा बाला शर्मा ही थी उसे तो मौत ने निगल लिया।शर्मा जी की बातें सुन कर लगता धर्म में बिलकुल सच कहा गया है कि पत्नी अर्धांगनी ही होती है। 
हर सुख दुःख साथ साथ बांटने वाली जादू की कोई परी जो हमारा हर दुःख हर लेती है। बदकिस्मती के हर वार को खुद पर ले लेती है लेकिन हमें गमों की आंच नहीं लगने देती। सचमुच देवी ही होती है पत्नी। जो पत्नी को देवी नहीं समझते उन्हें देवी पूजा का कोई अधिकार भी नहीं होना चाहिए। इस तरह के लोग कन्या को भी देवी नहीं समझ सकते। 

आज सुबह शर्मा जी का फोन आया। कहने लगे परी आ गई। कुछ हैरानी भी हुई क्यूंकि झट से बात समझ ही नहीं आई थी। । पूछा कुछ डिटेल में बताओ तो? कहने लगे मेरे घर पोती ने जन्म लिया है न्यूज़ीलैंड की धरती पर। बहु को पांच दिन पहले ही अस्पताल में दाखिल कर लिया गया था। अलग प्राइवेट कमरा। कमरे में बहु बेटे के शिव कोई नहीं जा सकता। वहां पर आई परी। कोई साईजेरियन ऑपरेशन का ड्रामा नहीं। सब कुछ बहुत ही सहज ढंग से हुआ। पूरी तरह प्राकृतिक। नाम रखा है सीरत कौर। गौरतलब है कि मां का नाम मनप्रीत कौर है। अनुराग और मनप्रीत की बेटी सीरत कौर।  प्रदीप शर्मा जी की पोती सीरत कौर। न्यूज़ीलैंड की नागरिकता  तो उसे जन्म के साथ ही मिल गई। लेकिन यह बेटी एक पुल बनेगी भारत और न्यूज़ीलैंड के दरम्यान। दरसल कहा जाए कि यह बिटिया उन लोगों का दूत है जो मेहनत में यकीन रखते हैं और मेहनती बन कर ही परिवार की गरीबी को समाप्त करते हैं। 

उनका फोन सुनते हुए मैंने पूछा अब कैसा महसूस हो रहा है? 

जवाब में गीत गाने लगे-

मेरे घर आई एक नन्ही परी ..चांदनी के हसीन रथ पे सवार--मेरे घर आई एक नन्हीं परी। साथ ही एक छोटी सी वीडियो भी भेजी जो उनके बेटे ने वहीँ न्यूज़ीलैंड  करके भेजी। देखिए आप भी एक झलक। 


इस गीत को लिखा था साहिर लुधियानवी साहिब ने, आवाज़ दी थी लता मंगेशकर जी ने संगीत से संवारा था ख्याम साहिब ने। फिल्म थी कभी कभी। बहुत हिट हुई थी यह फिल्म। गमों के रेगिस्तान में तपती रेत पर चलते हुए कभी कभी गुलिस्तान इसी तरह खिला करते हैं। जैसे सीरत कौर आई है। आप भी सभी इस नन्हीं परी को सुस्वागतम कहिए। --रेक्टर कथूरिया 

शनिवार, नवंबर 13, 2021

एअर इंडिया फिर से ऊंचाई पर पहुंचे यही है कामना

बहुत उतराव चढ़ाव देखे इस एयरलाईन ने 


सोशल मीडिया//इंटरनेट:12 नवम्बर 2021 (इर्दगिर्द ब्यूरो)::

सन 1932 में टाटा ग्रुप ने भारत की पहली कमर्शियल "टाटा एअरलाईन" की स्थापना की थी। इस तरह भारतीय जज़बात भी आसमान छूने में कामयाब रहे। यह उड़ान ऐतिहासिक थी। निजी कम्पनी थी लेकिन फिर भी कहीं न कहीं राष्ट्रीयता की भावना जुडी हुई थी।  

इस एअरलाईन को मुंबई से कराची के बीच "डाक विमान सेवा" का काम मिला था। एक शुरुआत थी जिसने बहुत सी उपलब्धियां भी अर्जित कीं। बेहद दिलचस्प बात कि इस विमान मे जे.आर.डी.टाटा खुद पायलट थे। यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य रहा। भावनाओं से जुडी हुई बात। 

विकास का यह दौर जारी रहा। सन 1946 मे जे.आर.डी.टाटा ने "टाटा एअरलाईन" को पब्लिक लिमिटेड कंपनी "एअर इंडिया लिमिटेड" मे रूपांतरित कर दिया था। यह भी एक ऐतिहासिक कदम रहा। 

वर्ष 1953 में भारत सरकार ने "एअर इंडिया लिमिटेड" का राष्ट्रीयकरण करके "एअर इंडिया" को अंतरराष्ट्रीय विमान सेवा बनाया गया और "इंडियन एअरलाईन" नाम की घरेलू विमान सेवा बनाई गई थी। यह शायद उड़ान के क्षेत्र में टाटा परिवार की सेवाओं और उपलब्धियों की एक नई शिखर थी। 

 गौरतलब है कि राष्ट्रीयकरण से पहलें "एयर इंडिया" एक प्राईवेट  लिमिटेड कंपनी थी।  "एअर इंडिया"  के CEO जे. आर. डी. टाटा (Jehangir Ratanji Dadabhoy Tata) खुद थे। उनकी देखरेख और सूझबूझ इसे तरक्की पर ले कर जाती रही। नए नए एक्सः छूए इस एअरलाईन ने। 

यह सिलसिला राष्ट्रीयकरण के बाद भी जारी रहा। "एयर इंडिया" के राष्ट्रीयकरण के बाद भी कांग्रेस प्रणित भारत सरकार ने जे.आर.डी.टाटा को "एअर इंडिया" का चेयरमैन बनाये रखा था। "एअर इंडिया" बहुत  ही अच्छी तरह चल रही थी। दुनिया के सभी प्रमुख देशो मे "एअर इंडिया" के विमान जाते थे। "एअर इंडिया" मे सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था।  एक नाम बन गया था। एक साख बन गयी थी। लोग गर्व से लेते थे एयर इंडिया का नाम। 

लेकिन जल्द ही मोड़ आने लगा। शायद उतराव शुरू हो गया। इंदिरा गांधी को चुनाव मे हरा कर पहली बार संधी जनता पार्टी की सरकार बनी. उस संघी सरकार के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई बने थे। इसी सरकार ने भारत की सिक्रेट गुप्तचर संस्था "रॉ" के पाकिस्तान मे मौजूद गुप्त एजेंटो की जानकारी पाकिस्तान को देकर "रॉ" के सभी गुप्त एजेंटो की पाकिस्तान मे हत्या करवा दी थी। उस समय के "आई बी" और "रॉ" चीफ ऑफ डायरेक्टर ने रिटायर्ड होने के बाद अपनी किताब मे यें सब बात लिखी है। बातें सनसनीखेज़ हैं जिन्हें कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। आम जनता तक ये बातें नहीं पहुंच पायीं। इसी दौर से शुरू हो गयी थी एयरलाईन में गिरावट की शुरुआत। 

 बात कोई ज़यादा पुरानी नहीं है।  सन 1978 मे संघी मोरारजी देसाई सरकार ने "एअर इंडिया" के चेयरमैन पद से जे.आर.डी.टाटा को हटाकर अपने संघी विचारधारा के समर्थक व्यक्ती को चेयरमैन बनाया था। उसके बाद से ही धीरे धीरे एअर इंडिया आय के मामले पिछडने का सिलसिला शुरू हो गया था। 

जे.आर.डी.टाटा ने अपने जीवन में सिर्फ एक ही टीवी इंटरव्यू दिया था। Convention कार्यक्रम के इस इंटरव्यू में पत्रकार राजीव मेहरोत्रा ने जे.आर.डी.टाटा से मोरारजी देसाई सरकार द्वारा उन्हें एयर इंडिया चेयरमैन पद से हटाने के बारे में पूछा तो उन्होने बडी विनम्रता से जवाब दिया-“जो काम शुरू होता है, वो काम ख़त्म भी होता है। इस के बारे मे उन्हें उम्मीद भी थी। परन्तु मोरारजी देसाई सरकार ने मुझे बिना सूचित किये एकदम से हटा दिया। यूं  मुझे अपमानित करके बहोत दुःख देने वाला था।”

जब सन 1980 के लोकसभा चुनाव मे पूर्ण बहुमत के साथ इंदिरा गाँधी ने सत्ता वापिस हासिल कर ली, और जे.आर.डी.टाटा को दोबारा एयर इंडिया चेयरमैन बनाने का फेसला लिया था मगर जे.आर.डी.टाटा ने खुद इंदिरा गांधी से  मुलाकात करके चेअरमेन पद स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। 

जे.आर.डी.टाटा ने इंदिरा गांधी से कहा- 

"मुझे कामचलाऊ काम करना बिलकुल पसंद नहीं है।  मै एक perfectionist हूं. और मै चाहता हूं, कि हर काम पुर्णतः समर्पित हो कर किया जायें।" 

इसी तरह "एयर इंडिया" के स्टाफ से वो हमेशा कहते थे, की एअर इंडिया का कोई विमान उड़ान भरे तो वह अन्दर-बाहर से इतना चमचमाता हो जैसे उसे अभी-अभी ख़रीदा गया है। अपने विमान में उड़ान भरते समय वे हमेशा नोट्स लिखते थे कि और किन-किन सुधारों की एअर इंडिया को ज़रुरत है और विमान से उतरते ही उन सुधारों पर काम शुरू कर देते थे। 

संघर्ष और उतराव चढ़ावों का लम्बा दौर देखा इस एयरलाईन ने। अब "8 अक्टूबर 2021 को रतन टाटा ने 68 साल के बाद "एयर इंडिया" को देश को बर्बाद करके दिवालीयां बना चुकी संघी नरेंद्र मोदी सरकार से खरीद कर फिर से "टाटा ग्रुप" में वापीस लेकर आ गये है।"

"एअर इंडिया" को बधाई।  बहुत से लोग खुश हैं इस वापिसी से और उनके मनों में नई उम्मीदें जगी हैं। जल्दी ही एयरलाइन फिर से आसमान छाएगी पूरे गौरव के साथ। 


बुधवार, अक्तूबर 13, 2021

महात्मा गांधी नरेगा योजना के लिए CRISP-M उपकरण लॉन्च

प्रविष्टि तिथि: 13 OCT 2021 6:10PM by PIB Delhi

जलवायु लचीलापन सूचना प्रणाली और योजना में मिलेगी सहायता 

*श्री गिरिराज सिंह ने कहा कि पहले से ही मनरेगा का उपयोग विभिन्न परियोजनाओं में जलवायु लचीलापन प्रदान करने के लिए एक प्रणाली के रूप में किया जा रहा है

*सीआरआईएसपी-एम के क्रियान्वयन से ग्रामीण समुदायों के लिए जलवायु परिवर्तन से निपटने की नई संभावनाएं खुल जाएंगी

*क्लाइमेट रेजिलिएंट प्रोग्राम के लिए पायलट प्रोजेक्ट 7 जिलों - बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा, राजस्थान, एमपी, यूपी और झारखंड में शुरू हुआ

नई दिल्ली: 13 अक्टूबर 2021: (पीआईबी//इर्दगिर्द डेस्क)::

केंद्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री श्री गिरिराज सिंह ने आज एक वर्चुअल कार्यक्रम के माध्यम से ब्रिटेन के विदेश, राष्ट्रमंडल और विकास कार्यालय में दक्षिण एशिया व राष्ट्रमंडल राज्य मंत्री लॉर्ड तारिक अहमद के साथ संयुक्त रूप से महात्मा गांधी नरेगा के तहत भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) आधारित वाटरशेड योजना में जलवायु सूचना के एकीकरण के लिए जलवायु लचीलापन सूचना प्रणाली और योजना (सीआरआईएसपी-एम) उपकरण का लोकार्पण किया।


इस लोकार्पण समारोह में श्री गिरिराज सिंह ने कहा कि सीआरआईएसपी-एम टूल महात्मा गांधी नरेगा की जीआईएस आधारित योजना और कार्यान्वयन में जलवायु जानकारी को जोड़ने में सहायता करेगा। उन्होंने आगे ब्रिटिश सरकार और उन सभी हितधारकों के प्रयासों की सराहना की, जिन्होंने उपकरण विकसित करने में ग्रामीण विकास मंत्रालय की सहायता की थी। साथ ही, उन्होंने उम्मीद व्यक्त की कि सीआरआईएसपी-एम के कार्यान्वयन के माध्यम से हमारे ग्रामीण समुदायों के लिए जलवायु परिवर्तन के मुद्दों से निपटने के लिए नई संभावनाएं खुल जाएंगी। इस उपकरण का उपयोग उन सात राज्यों में किया जाएगा, जहां विदेशी राष्ट्रमंडल और विकास कार्यालय (एफसीडीओ), ब्रिटिश सरकार और भारत सरकार का ग्रामीण विकास मंत्रालय संयुक्त रूप से जलवायु लचीलापन की दिशा में काम कर रहे हैं। इन राज्यों में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और राजस्थान हैं।

सीआरआईएसपी-एम उपकरण के संयुक्त लोकार्पण के दौरान ब्रिटेन के विदेश, राष्ट्रमंडल और विकास कार्यालय में दक्षिण एशिया व राष्ट्रमंडल राज्य मंत्री लॉर्ड तारिक अहमद ने महात्मा गांधी नरेगा कार्यक्रम के माध्यम से जलवायु पहल को आगे बढ़ाने के लिए भारत की प्रतिबद्धता की सराहना की। अपने संबोधन में लॉर्ड तारिक ने कहा, “पूरे भारत में इस योजना के लागू होने से इसका सकारात्मक और जीवन बदलने वाला प्रभाव पड़ रहा है। यह गरीब और कमजोर लोगों को जलवायु परिवर्तन से निपटने और उन्हें मौसम संबंधी आपदाओं से बचाने में सहायता कर रही है। आज हम जिस प्रभावशाली नए उपकरण- सीआरआईएसपी-एम का उत्सव मना रहे हैं, इस महान कार्य का नवीनतम उदाहरण है।”


भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय में सचिव श्री एन एन सिन्हा ने कहा कि पूरे भारत में महात्मा गांधी नरेगा के कई प्रभाव अध्ययनों में जमीनी स्तर की योजना, कार्यान्वयन और उपयोग का असर भूजल पुनर्भरण, वन कवरेज और भूमि उत्पादकता की बढ़ोतरी के रूप में दिखाई देता है।

इस अवसर पर एक पैनल चर्चा भी हुई, जिसमें पोर्टल और इसकी प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की गई। इस पैनल में इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसायटी (आईएफआरसी) के रिस्क इन्फॉर्म्ड अर्ली एक्शन पार्टनरशिप के लिए सचिवालय के प्रमुख श्री बेन वेबस्टर, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एन्वॉयरमेंट एंड डेवलपमेंट (आईआईईडी) में क्लाइमेट चेंज रिसर्च ग्रूप की निदेशिक श्रीमती क्लेयर शाक्य, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के सदस्य श्री कमल किशोर, विदेशी राष्ट्रमंडल और विकास कार्यालय (एफसीडीओ)- भारत में अवसंरचना और शहरी विकास के प्रमुख श्री शांतनु मित्रा और मध्य प्रदेश विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिषद (एमपीसीएसटी) के जीआईएसएंडआईपी विभाग के प्रमुख और वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक डॉ. आलोक चौधरी शामिल थे।     

संयुक्त सचिव (आरई) श्री रोहित कुमार ने अपनी समापन टिप्पणी में कहा कि  ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भारत की कुल 2.69 लाख ग्राम पंचायतों में से 1.82 लाख ग्राम पंचायतों के लिए पहले ही जीआईएस आधारित योजनाएं तैयार कर ली हैं, जो रिज टू वैली परिकल्पना (इसमें पानी के बहाव को ध्यान में रखकर उसे संरक्षित करने की तैयारी की जाती है) पर आधारित रिमोट सेंसिंग तकनीक की सहायता से लगभग 68 फीसदी है। अब, इस सीआरआईएसपी-एम उपकरण के लोकार्पण के साथ, जीआईएस आधारित वाटरशेड योजना में जलवायु सूचना का एकीकरण संभव होगा और इससे महात्मा गांधी नरेगा के तहत जलवायु लचकदार कार्यों की योजना को और अधिक मजबूत किया जाएगा।

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एमजी/एएम/एचकेपी/डीए

मंगलवार, सितंबर 21, 2021

दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना हुई लोकप्रिय

 Saturday: 19th September 2021 at 02:50 pm

   इस योजना ने युवाओं के लिए खोले रोजगार के नए नए द्वार 

प्रतीकत्मक तस्वीर Pexels Photo By Kelly Lacy 

शिमला: 19 सितम्बर, 2021: (इर्द गिर्द ब्यूरो)::

शिक्षा, प्रशिक्षण, कौशल और रोज़गार की मज़बूत कड़ी ही ज़िंदगी को पूरी तरह से सफल और क्षमतापूर्ण बनाती है। इस बात का ध्यान रख कर बनाई गई है दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना जो सफल भी हुई है और लोकप्रिय भी हो रही है। 

प्रदेश के युवाओं को दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना के अन्तर्गत हुनरमंद बनाने के साथ-साथ काम और रोज़गार के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। इस योजना में प्रदेश की युवाशक्ति का समुचित दोहन कर उन्हें प्रशिक्षण भी प्रदान किया जा रहा है जिससे उनके कौशल का विकास होता है। 

उल्लेखनीय है कि ज़िंदगी से जुडी इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण गरीब युवाओं को कौशल प्रदान कर उन्हें न्यूनतम मजदूरी या उससे अधिक नियमित मासिक वेतन पर रोजगार प्रदान करना है। इस से युवा वर्ग को अपने पैरों पर खड़ा होने में बहुत ही सहायता मिलेगी। उनकी शक्ति में बढ़ोतरी होगी। 

आपको बता दें कि दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना (डीडीयू-जीकेवाई) के अन्तर्गत वर्ष 2023 तक 22000 युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस योजना के अन्तर्गत अभी तक 5320 युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान किया गया है, जिनमें से 3021 युवाओं को विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार प्रदान किया गया हैं। इस योजना के अन्तर्गत प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके लाभार्थी प्रदेश सहित पड़ोसी राज्यों में कार्यरत है। हाॅस्पिटैलिटी ट्रेड के अन्तर्गत कार्यरत युवाओं को भोजन के साथ छात्रावास की सुविधा प्रदान की जा रही है।

इसमें फोकस किया गया है गरीब वर्ग को। गरीब ग्रामीण युवाओं के लिए आयु सीमा 15-35 वर्ष तथा दिव्यांग, महिलाओं तथा अन्य कमजोर वर्गों के लिए आयु सीमा 45 वर्ष निर्धारित की गई है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार, मनरेगा के तहत वित्त वर्ष में कम से कम 15 दिन का कार्य करने वाले श्रमिक के परिवार सदस्य, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना कार्ड धारक परिवार, अन्त्योदय अन्न योजना/बीपीएल/पीडीएस कार्ड परिवार तथा स्वयं सहायता समूह के सदस्य इस योजना के पात्र होंगे।

इस योजना के तहत 70 प्रतिशत प्रशिक्षित लाभार्थियों को विभिन्न क्षेत्रों में निश्चित रोजगार का आश्वासन प्रदान किया जाता है। योजना के तहत प्रशिक्षुओं को निःशुल्क प्रशिक्षण प्रदान करने के साथ-साथ निःशुल्क छात्रावास की सुविधा प्रदान की जाती है। इस योजना के अन्तर्गत कोर्स की अवधि 3 से 12 महीने की होती है। योजना के लाभार्थियों को एक वर्ष का पोस्ट प्लेसमेंट प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता है।

 वर्तमान में इस योजना के तहत परिधान (अपैरल), हाॅस्पिटैलिटी, ग्रीन जाॅब्स, ब्यूटिशियन, सिलाई मशीन आॅपरेटर, बेकिंग, स्टोरेज आॅपरेटर, स्पा, अनआम्र्ड सिक्योरिटी गार्ड, इलेक्ट्रीशियन डोमेस्टिक, सेल्स एसोसिएट, अकाॅउंटिंग, बैंकिंग सेल्स रिप्रेजेन्टेटिव, कंप्यूटर हार्डवेयर असिस्टेंट, टेली एक्सेक्यूटिव-लाइफ साइंसेज आदि टेªड्स डीडीयू-जीकेवाई के अन्तर्गत संचालित किए जा रहे हैं।

इन ट्रेडस के अन्तर्गत युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान कर उनके कौशल में विकास किया जाता है। वर्तमान समय में डिजिटल स्किल, सोशल मीडिया, इलैक्ट्राॅनिक, विजुअलाइजेशन, टेलिविजन और मोबाइल रिपेयर जैसे क्षेत्रों में रोजगार, स्वरोजगार और रोजगार सृजन के अपार अवसर उत्पन्न हुए हैं। इन ट्रेडस के माध्यम से अर्धकुशल युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान कर उन्हें आत्मनिर्भरता की राह पर अग्रसर किया जाता है।

आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना के अन्तर्गत प्रशिक्षण प्राप्त कर कई युवाओं ने भविष्य के लिए सजाए सुनहरे सपनों को साकार किया है। जिला कांगड़ा के गांव कछियारी के अक्षय कुमार के लिए यह योजना वरदान सिद्ध हुई है। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी। उनके पिता दिहाड़ीदार मजदूर है और पूरे परिवार का बोझ उन्हीं के कंधों पर था। घर में आर्थिक तंगी होने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी लेकिन अक्षय कुमार आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन कर अपने परिवार का सहारा बनना चाहते थे। यह योजना उनके लिए आशा की किरण बनकर आई। जब उन्हें योजना के बारे में पता चला तो इसका लाभ उठाने के लिए उन्होंने बैंकिंग एण्ड अकाउंटिंग पाठ्यक्रम के अन्तर्गत प्रशिक्षण लेना शुरू किया।

इसके अतिरिक्त उन्होंने आई.टी. और स्पोकन इंग्लिश की मुफ्त कक्षाएं भी ली, जिससे उनके संचार कौशल में काफी सुधार हुआ है। योजना के अन्तर्गत उन्हें अध्ययन सामग्री के साथ-साथ यात्रा भत्ता भी मिला और प्रशिक्षण के दौरान उन्हें संबंधित क्षेत्र से काफी नई चीजें सीखने का अवसर प्राप्त हुआ। वर्तमान में वह पी.डब्ल्यू.डी. गेस्ट हाउस चंडीगढ़ में बतौर सहायक लेखाकार के रूप में कार्यरत है। उन्हें 12 हजार रुपये मासिक वेतन मिल रहा है। उनका कहना है कि यह योजना उनके सपने को साकार करने में सहायक सिद्ध हुई है और आज वह आर्थिक रूप से सक्षम होने के साथ-साथ अपने परिवार का सहारा भी बन रहे हैं।

विवरण बताता है कि ऐसा ही कुछ सुखद अनुभव ज़िला शिमला की तहसील रामपुर के गांव काशापाट के कमलेश को भी हुआ, जब उन्होंने डीडीयू-जीकेवाई के अन्तर्गत प्रशिक्षण प्राप्त किया। कृषक परिवार से संबंध रखने वाले कमलेश की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी। इस कारण उन्हें 12वीं के पश्चात अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। परिवार की आर्थिक सहायता करने के लिए उन्होंने शिक्षित होने के बावजूद मजदूरी करना शुरू कर दिया था, जिसमें उन्हें प्रतिमाह केवल तीन हजार रुपये मिलते थे। इतनी कम आय में उनके लिए गुजारा करना बहुत मुश्किल हो गया था, लेकिन जब उन्हें इस योजना के बारे में पता चला, तो उन्होंने हाऊसकिपिंग मैनुअल अटेंडेंट कोर्स में दाखिला लिया। तीन माह के इस कोर्स में उन्हें हाऊसकिपिंग से संबंधित सभी प्रकार का प्रशिक्षण प्रदान किया गया। प्रशिक्षण प्राप्त होने के पश्चात वह एक निजी होटल में हाऊसकिपिंग मैनुअल अटेंडेंट के रूप में चयनित हुए। वर्तमान में उन्हें अच्छा वेतन मिल रहा है। इसके साथ उन्हें समय-समय पर इंसेंटिव भी मिल रहे हैं। उनका कहना है कि सभी बेरोजगार युवाओं को इस योजना का लाभ उठाकर आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ना चाहिए।

ऐसे में कमलेश और अक्षय कुमार जैसे कई युवा इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि सरकार द्वारा क्रियान्वित की जा रही दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना युवाओं को रोजगार और स्वरोजगार के अवसर प्रदान कर रही है।

जारीकर्ताः निदेशालय, सूचना एवं जन सम्पर्क

हिमाचल प्रदेश, शिमला-171002

सोमवार, सितंबर 20, 2021

ओल्ड गोवा में नवीनीकृत हेलीपैड का उद्घाटन

 प्रविष्टि तिथि: 20 SEP 2021 5:17PM by PIB Delhi

उद्घाटन किया मंत्री श्री जी. किशन रेड्डी और गोवा के मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत ने 

उद्घाटन कार्यक्रम में केंद्रीय पर्यटन राज्य मंत्री श्री श्रीपद नाइक और गोवा के उप मुख्यमंत्री श्री मनोहर अजगांवकर, विधायक और गोवा व भारत सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे


नई दिल्ली
: 20 सितंबर 2021: (पीआईबी//इर्द गिर्द)::

इस अवसर पर अपने संबोधन में केंद्रीय मंत्री श्री जी. किशन रेड्डी ने कहा कि गोवा को न सिर्फ एक राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। केंद्रीय मंत्री ने इजरायल की सेना के साथ अपने अनुभवों का उल्लेख किया, कि कैसे अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण के बाद इजरायली सेना के जवानों ने गोवा के प्राकृतिक सौंदर्य और किफायती होने के कारण इसे अपने पसंदीदा स्थल के रूप में चुना। केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि पर्यटन क्षेत्र रोजगार सृजित करने वाला एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है और केन्द्र सरकार गोवा में पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए हर संभव समर्थन दे रही है, जिससे ज्यादा संख्या में रोजगार सृजित किए जा सकें। केंद्रीय मंत्री ने यह पुष्टि भी की कि गोवा की आजादी के 60वें साल में, पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय गोवा को पर्याप्त वित्तपोषण करेंगे और गोवा को अंतरराष्ट्रीय मानचित्र में शीर्ष पर्यटन स्थल बनाएंगे। केंद्रीय मंत्री ने माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का संदेश भी दिया कि केन्द्र सरकार हमेशा ही गोवा के नागरिकों के साथ है। गोवा के मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत ने कहा कि 5 करोड़ रुपये के व्यय के साथ हेलीपैड का नवीनीकरण किया गया है और सरकारी व निजी क्षेत्र के लिए इसका अच्छा उपयोग किया जाएगा। इसका मुख्य जोर राज्य में पर्यटन को बढ़ाना है।

हेलीपैड को स्वदेश दर्शन कोस्टल सर्किट थीम के तहत विकसित किया गया है। स्वदेश दर्शन स्कीम थीम-बेस्ड टूरिस्ट सर्किट्स के एकीकृत विकास के लिए पर्यटन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा शुरू की गई केंद्रीय क्षेत्र की योजना है। इस योजना में पर्यटन क्षेत्र को रोजगार सृजन के लिए एक प्रमुख इंजन के रूप में स्थापित करने, आर्थिक विकास के लिए मुख्य बल बनाने, पर्यटन क्षेत्र को अपनी क्षमताओं का अहसास कराने में सक्षम बनाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के साथ तालमेल बनाने के लिए स्वच्छ भारत अभियान, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया आदि जैसी भारत सरकार की अन्य योजनाओं के साथ सामंजस्य कायम करने की कल्पना की गई है।

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