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बुधवार, मई 10, 2023

ताज़ा ग़ज़ल//विजय तिवारी ‘विजय’

ताज़ा ग़ज़ल//विजय तिवारी ‘विजय’

जिसमें मिलेगी अतीत और आज की झलक 


लुधियाना: 12 फरवरी 2023: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

भोपाल एक ऐसा शहर है जहां शिक्षा और साहित्य से जुड़े बहुत से लोग रहते हैं। बुलंद आवाज़ लेकिन बहुत ही सलीके से सच कहने वाले इन लोगों से मिल कर, इनका कलाम पढ़ कर लगता है जैसे भोपाल के जलवायु में ही कोई ऐसा जादू है जो कलम में इंकलाब ले आता है। वहां भोपाल जा कर इन लोगों के जनजीवन को नज़दीक से देखने का मन भी अक्सर होता है और कुछ समय इनके पास रहने का भी। बहुत ही गहरी बातें बहुत ही सादगी से कह जाते हैं ये लोग। कलम और कलाम की दुनिया में इनका कद बहुत ऊंचा ही बना रहता है इसके बावजूद मिलने वालों को इनकी विनम्रता और स्नेह हमेशां के लिए  अपना भी बना लेते हैं ये लोग। विजय तिवारी विजय  लम्बे समय से बहुत ही सादगी से बहुत ही गहरी बातों की शायरी  करते आ रहे हैं। उनकी शायरी सियासत की साज़िशों की बात भी करती है और जी टी रोड पर जीने को तरसती ज़िंदगी की बात भी। देखिए उनकी एक ग़ज़ल की झलक। आज के महाभारत में घिरे अभिमन्यु की चर्चा भी आपको इसी शायरी में मिलेगी और इसके साथ ही हिंदी की मधुरता और उर्दू की मिठास को एक दुसरे के नज़दीक लाने का ज़ोरदार प्रयास भी। मुशायरा कहीं भी हो उनकी हाज़री उसमें चार चाँद लगा देती है। उनकी कोशिश भी होती है कि निमंत्रण मिलने पर शामिल भी ज़रूर हुआ जाए। इसके बावजूद कभी कभी कोई मजबूरी आन ही पड़ती है तो उनके चाहने वाले उदास हो जाते हैं। आपको उनकी शायरी कैस लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी ही।  --रेक्टर कथूरिया 

कितनी मुश्किल से कटा दिन होश के मारों के बीच। 

शाम ए ग़म का शुक्रिया ले आई मयख़ारों के बीच ...


क्या कभी देखा है वो ग़ुब्बारा ग़ुब्बारों के बीच। 

पेट की ख़ातिर भटकता दौड़ता कारों के बीच...


रिंद ओ साक़ी जाम ओ पैमाना तलबगारों के बीच। 

आ गये सब ग़म के मारे अपने ग़मख़्वारों के बीच... 


चीख़ता ही रह गया मैं अम्न हूँ मैं अम्न हूँ। 

दब गई आवाज़ मेरी मज़हबी नारों के बीच...


बार ए ग़म से लड़खड़ाकर क्या गिरा मस्जिद में आज । 

यूँ घिरा जैसे शराबी कोई दींदारों के बीच...


मौसम ए तन्हाई में बहते हैं आँसू इस क़दर। 

दस्त में बहता हो जैसे झरना कुहसारों के बीच...


बज़्म ए जानाँ में मुझे देखा गया कुछ इस तरह। 

जैसे कोई ग़म का नग़मा कहकहाज़ारों के बीच...


या ख़ुदा अहल ए अदब में यूँ रहे मेरा वुजूद। 

एक जुगनू आसमाँ पर चाँद और तारों के बीच...


एक अभिमन्यु घिरा फिर धर्म संसद में ‘विजय’

रिश्तेदारों चाटुकारों और सियहकारों के बीच

                           ----विजय तिवारी ‘विजय’

चलते चलते विजय साहिब का ही एक और शेयर:

किसी के इश्क में दुनिया लुटा कर

सुखनवर हो गए हैं कुल मिलाकर! 

शनिवार, फ़रवरी 06, 2021

रबीन्द्रनाथ टैगोर: मानवतावाद और राष्ट्रवाद//राम पुनियानी

 Feb 6, 2021, 2:15 PM

BJP ऐसा जताना चाहती है मानो गुरूदेव कट्टर हिन्दू राष्ट्रवादी थे

यह तस्वीरअंग्रेजी दैनिक नेशनल हेरल्ड से साभार 

भोपाल
:03 फरवरी, 2021: (राम पुनियानी//इर्दगिर्द)::

तस्वीर हिंदी जीवन परिचय से साभार 
पश्चिम बंगाल में चुनाव नजदीक हैं. भाजपा ने बंगाल के नायकों को अपना बताने की कवायद शुरू कर दी है. जहां तक भाजपा की विचारधारा का प्रश्न है, बंगाल के केवल एक नेता, श्यामाप्रसाद मुकर्जी, इस पार्टी के अपने हैं। वे भाजपा के पूर्व अवतार जनसंघ के संस्थापक थे। बंगाल के जिन अन्य नेताओं ने भारत के राष्ट्रीय मूल्यों को गढ़ा और हमारी सोच को प्रभावित किया, उनमें स्वामी विवेकानंद, रबीन्द्रनाथ टैगोर और सुभाषचन्द्र बोस शामिल हैं। स्वामी विवेकानंद जातिप्रथा के कड़े विरोधी थे और हमारे देश से गरीबी का उन्मूलन करने के मजबूत पक्षधर थे। वे दरिद्र को ही नारायण (ईश्वर) मानते थे। उनके लिए निर्धनों की सेवा, ईश्वर की आराधना के समतुल्य थी।

नेताजी प्रतिबद्ध समाजवादी थे और हिन्दू राष्ट्रवाद उनको कतई रास नहीं आता था। इसके बावजूद भाजपा उन्हें अपना सिद्ध करने में लगी है। गुरूदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर महान मानवतावादी थे और भयमुक्त समाज के निर्माण के पक्षधर थे। इसके बाद भी भाजपा जैसी साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद की पैरोकार पार्टी उन्हें अपनी विचारधारा का समर्थक बताने पर तुली हुई है। पार्टी ऐसा जताना चाहती है मानो गुरूदेव कट्टर हिन्दू राष्ट्रवादी थे।

नरेन्द्र मोदी ने कहा कि टैगोर स्वराज के हामी थे। आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत का दावा है कि टैगोर ने हिन्दुत्व की परिकल्पना का विकास किया था। यह विडंबना ही है कि जिस राजनैतिक संगठन ने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी ही नहीं की और ना ही भारत के एक राष्ट्र के रूप में विकास की प्रक्रिया में कोई योगदान दिया, वह स्वराज की बात कर रही है। टैगोर प्रतिबद्ध मानवतावादी थे। उनकी सोच मे सम्प्रदायवाद के लिए कोई जगह नहीं थी। मानवता उनके विचारों का केन्द्रीय तत्व थी। उन्होंने लिखा है कि भारत के मूल निवासियों ने पहले आर्यों और उसके बाद मुसलमानों के साथ मिलजुलकर रहना सीखा। इसके विपरीत, हिन्दू राष्ट्रवादी दावा करते आए हैं कि आर्य इस देश के मूलनिवासी थे। और वह इसलिए ताकि इस देश को एक धर्म विशेष की भूमि बताया जा सके। वे मुसलमानों को विदेशी और आक्रांता बताते हैं।

अपने उपन्यास 'गोरा' में गुरूदेव ने परोक्ष रूप से कट्टर हिन्दू धर्म की कड़ी आलोचना की है. उपन्यास के केन्द्रीय चरित्र गोरा का हिन्दू धर्म, आज के हिन्दुत्व से काफी मिलता-जुलता है. उपन्यास के अंत में उसे पता चलता है कि वह युद्ध में मारे गए एक अंग्रेज दंपत्ति का पुत्र है और उसका लालन-पालन एक हिन्दू स्त्री आनंदमोई ने किया है।  वह अवाक रह जाता है।

लेखक डा. राम पुनियानि 
आज हमारे देश की राजनीति में जो कुछ हम देख रहे हैं वह टैगोर की प्रसिद्ध और दिल को छू लेने वाली कविता "जहां मन है निर्भय और मस्तक है ऊँचा, जहां ज्ञान है मुक्त" से बिल्कुल ही मेल नहीं खाता. इस सरकार के पिछले छःह सालों के राज में सच बोलने वाला भयातुर रहने को मजबूर है. जो लोग आदिवासियों के अधिकारों की बात करते हैं उन्हें शहरी नक्सल कहा जाता है। जो लोग किसी धर्म विशेष के अनुयायियों पर अत्याचारों का विरोध करते हैं उन्हें टुकड़े-टुकड़े गैंग बताया जाता है। अपनी इस कविता में टैगोर 'विवेक की निर्मल सरिता' की बात करते हैं।  कहां है वह सरिता? आज की सरकार ने तो अपने सभी आलोचकों को राष्ट्रद्रोही बताने का व्रत ले लिया है। 

हमारे वर्तमान शासक आक्रामक राष्ट्रवाद के हामी हैं. वे 'घर में घुसकर मारने' की बात करते हैं। इसके विपरीत, टैगोर युद्ध की निरर्थकता के बारे में आश्वस्त थे। ऐसे राष्ट्रवाद में उनकी कोई श्रद्धा नहीं थी जो कमजोर देशों को शक्तिशाली देशों का उपनिवेश बनाता है और जिससे प्रेरित हो शक्तिशाली राष्ट्र अपनी सैन्य शक्ति का प्रयोग अपने देश की सीमाओं का विस्तार करने के लिए करते हैं। जिस समय पूरी दुनिया प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ने की आशंका से भयभीत थी उस समय टैगोर की 'गीतांजलि' ने ब्रिटिश कवियों पर गहरा प्रभाव डाला था। विलफ्रेड ओन व कई अन्य ब्रिटिश कवि, 'गीतांजलि' मे निहित आध्यात्मिक मानवतावाद से बहुत प्रभावित थे। टैगोर का आध्यात्मिक मानवतावाद, राष्ट्र की बजाए समाज की भलाई और स्वतंत्रता की बात करता है।

मोदी और शाह टैगोर की शान में जो कसीदे काढ़ रहे हैं उसका एकमात्र लक्ष्य बंगाल में होने वाले चुनावों में वोट हासिल करना है। वैचारिक स्तर पर वे टैगोर के घोर विरोधी हैं। आरएसएस से संबद्ध शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, जिसके अध्यक्ष दीनानाथ बत्रा थे, ने यह सिफारिश की थी कि एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में से टैगोर से संबंधित सामग्री हटा दी जाए।

टैगोर द्वारा लिखित हमारे राष्ट्रगान 'जन गण मन' को भी संघ पसंद नहीं करता। उसकी पसंद बंकिमचन्द्र चटर्जी लिखित 'वंदे मातरम' है। संघ के नेता समय-समय पर यह कहते रहे हैं कि टैगोर ने 'जन गण मन' ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम की शान में उस समय लिखा था जब वे भारत की यात्रा पर आए थे। भाजपा के वरिष्ठ नेता कल्याण सिंह ने यह आरोप लगाया था कि जन गण मन में 'अधिनायक' शब्द का प्रयोग जार्ज पंचम के लिए किया गया था। यह इस तथ्य के बावजूद कि टैगोर ने अपने जीवनकाल में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि अधिनायक शब्द से उनका आशय उस शक्ति से है जो सदियों से भारत भूमि की नियति को आकार देती रही है। नोबेल पुरस्कार विजेता महान कवि के स्पष्ट खंडन के बाद भी संघ और उसके संगी-साथी यह कहने से बाज नहीं आते कि टैगोर ने ब्रिटिश सम्राट की चाटुकारिता करने के लिए यह गीत लिखा था। और इसलिए वे जन गण मन की बात नहीं करते।  'इस देश में रहना है तो वंदे मातरम कहना होगा' उनका नारा है।

हमारा राष्ट्रगान देश की विविधता और समावेशिता का अति सुंदर वर्णन करता है। परंतु हमारे वर्तमान शासकों के विचारधारात्मक पितामहों को विविधता और बहुवाद पसंद नहीं हैं। वे तो देश को एकसार बनाना चाहते हैं। संघ परिवार यह भी कहता रहा है कि नेहरू ने मुसलमानों को खुश करने के लिए जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में चुना। जिस समिति ने इस गीत को राष्ट्रगान का दर्जा देने का निर्णय लिया था वह इसमें वर्णित देश के बहुवादी चरित्र से प्रभावित थी। यह गीत भारतीय इतिहास की टैगोर और अन्य नेताओं की इस समझ से भी मेल खाता है कि भारत के निर्माण में देश के मूल निवासियों, आर्यों और मुसलमानों-तीनों का योगदान रहा है।

भाजपा और उसके साथी वंदे मातरम को प्राथमिकता इसलिए देना चाहते हैं क्योंकि वह हमारे मन में एक हिन्दू देवी की छवि उकेरता है। मुसलमानों का कहना है कि वे अल्लाह के अलावा किसी के सामने अपना सिर नहीं झुका सकते। इस बात को भी ध्यान रखते हुए जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में चुना गया और वंदेमातरम् के पहले अंतरे को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया।

गुरूदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर साधु प्रवृत्ति के व्यक्ति थे जिनका आध्यात्म, मानवतावाद से जुड़ा हुआ था ना कि किसी संकीर्ण साम्प्रदायिक सोच से। उनका राष्ट्रवाद ब्रिटिश अधिनायकवाद का विरोधी था और स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय के मूल्यों में आस्था रखता था। 

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

(लेखक IIT मुंबई में पढ़ाते थे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

(प्रेषक:एल. एस. हरदेनिया) 

शुक्रवार, जनवरी 10, 2020

कलम वाले कलम की साधना को मज़बूत बनाएं

भाषा को सियासत की साज़िशों का शिकार न होने दें 
लुधियाना: 10 जनवरी 2020: (कार्तिका सिंह//इर्द गिर्द डेस्क):: 
भाषा को सम्मान देने की बजाये उसे हथियार बना लिया गया है। सियासत एक बार फिर अपनी नापाक चाल चल रही है। कभी पंजाबी के खिलाफ, कभी अंग्रेजी के खिलाफ और कभी हिंदी के खिलाफ। कुल मिला कर इन खतरनाक साज़िशों का खतरनाक प्रभाव मानवता पर ही पड़ता है। समाज के टुकड़े करने वाले इसका फायदा उठाते हैं। सियासत वाले लोग तो गुंडागर्दी भी कर सकते हैं। किसी न किसी भाषा पर कालख भी पोत सकते हैं, किसी भाषा प्रेमी की हत्या भी कर सकते हैं। लेकिन कलम वाले तो इनकी तरह नहीं सोच सकते। इसके बावजूद उन्हें और दृढ़ बनना होगा। कलम की साधना को और और मज़बूत बनाना होगा। भाषा को समाज के फायदे का ज़रिया बनाना होगा न कि विघटन का। भाषा समाज की एकता के काम आये न कि सियासत का हथियार बने। आज विश्व हिंदी दिवस पर हम इस बात  संकल्प कर सकें तो सचमुच बहुत ही अच्छा होगा। इस विशेष दिवस पर प्रस्तुत है मेरी एक काव्य रचा जिसे शब्द भास्कर ने पुरस्कृत भी किया था। 
हर ह्रदय में प्रेम का जिसने दीप जलाया; हिंदी है!  
दिल को दिल से जोड़ के जिसने देश बनाया; हिंदी है।
कदम से कदम मिला के जिसने साथ निभाया; हिंदी है।

कई धर्म थे, कई वर्ग थे, रोज़ ये झगड़े आम हुए,
हर ह्रदय में प्रेम का जिसने दीप जलाया; हिंदी है।

उर्दू फारसी कठिन बहुत थे, इंग्लिश भी आसान न थी,
 झट से आ कर इक जादू जिसने सिखलाया; हिंदी है।

पढ़ने लिखने की हर दिल में ललक उठे; आसान न था,
हर ह्रदय को जोड़ के जिसने जोश जगाया; हिंदी है।

हर इक हाथ में इक पुस्तक और लोग दीवाने पुस्तक के,
हर पुस्तक को हर इक तक जिसने पहुंचाया;हिंदी है।

दुनिया का उत्कृष्ठ साहित्य; पढ़ा है मैंने हिंदी में;
मुझको हर लेखक से जिसने आ मिलवाया; हिंदी है।

हिंदी देश की बिंदी है; यह सच है; इसको मान भी लो,
आज यहां भी हम सबको जिसने मिलवाया; हिंदी है।
                                                    ---कार्तिका सिंह 

गुरुवार, जनवरी 02, 2014

कौन सा मार्ग शेष रह गया//पंडित सिद्धार्थ शर्मा

Thu, Jan 2, 2014 at 12:36 PM
अब तो कमजोर और पाखण्ड का ये देश है 
अब ना भगत ना सुखदेव ना राज गुरु शेष हैं 

हे भारत भू हे सखी तू 
लौट जा उस काल में तू 
जब तेरे बालक के बाजू में था दम
जब था वो यमुना का जल सरस पावन
जब स्वम माधव ने भरी सभा चीर को बढाया 
जब एक धागे की कसम ने रक्षा बन्धन का सम्मान पाया 
जब भीम ने दुर्योधन के घमण्ड को जन्घा से हटाया
जब दुर्गा ने धरा पर माता का सम्मान पाया 
अब तो कमजोर और पाखण्ड का ये देश हैं 
अब ना भगत ना सुखदेव ना राज गुरु शेष हैं 
पैसा कमाना कैसे सब ये पढाते
जीवन जीना कैसे ये सब भूल जाते
आदर्श के नाम पे घोटाला लिखा हैं 
गैर ने नही ये खून तेरा अपनो ने पिया हैं 
हे भवानी ! क्यू राजपूतो का खून अब ना डोले
देख कर ये हशर कोई उद्धम सिंह क्यू ना बोले 
बस मंदिरो में सब ने तुझ को कैद कर दिया हैं 
केवल विनाश  का रास्ता ही शेष रह गया हैं 

--पंडित सिद्धार्थ शर्मा  (सत्र 2004-08)