शनिवार, जनवरी 07, 2017

प्रवासी भारतीयों ने एक लंबा सफर तय किया है

Posted On: 07th January 2017 at 5:35 PM by PIB
Special Service and Features                                      * प्रियदर्शी दत्ता 
कर्नाटक के बैंगलुरू में 7 से 9 जनवरी 2017 तक  विशेष आयोजन 
प्रियदर्शी दत्ता 
प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन के 15 वें संस्करण का कर्नाटक के बैंगलुरू में 7 से 9 जनवरी 2017 तक  विशेष आयोजन किया जाएगा। प्रथम वार्षिक सम्मेलन का आयोजन 9 से 11 जनवरी 2003 को किया गया था और अगस्‍त 2000 में गठित एक उच्‍च स्‍तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर इसे 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस अथवा ओवरसीज इंडियन के रूप में अपनाया गया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अत्‍यंत उत्‍सुकता के साथ प्रवासी भारतीयों के मुद्दे में दिलचस्पी रखते थे। पोखरण द्वितीय के बाद जब भारत प्रतिबंधों से जूझ रहा था ऐसे में 1998 में उभरते हुए भारत के प्रति अपने संबंधों में मजबूत विश्वास दिखाया। उदारीकरण के वातावरण के बाद भारतीय मूल के समुदाय अपने देश के साथ जुड़ने को तैयार थे। भारत के एक सूचना प्रौद्योगिकी क्षमता केन्‍द्र तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और परमाणु शक्ति के रूप में उभरने से प्रवासी भारतीयों में अत्‍यधिक आत्‍मविश्‍वास जगा दिया था। यह खेल के मैदान से व्यापार सम्मेलनों और अंतरराष्ट्रीय बैठकों जैसे विभिन्‍न स्‍थलों पर दिखाई भी दिया।  
प्रवासी भारतीयों की चिंताएं भारतीय नेतृत्व के मस्‍तिष्‍क में लंबे समय से थीं। ब्रिटेन  में हाऊस ऑफ कॉमन्‍स पर 1841 की शुरूआत में जितना शीघ्र हो सके मॉरीशस में भारतीय अनुबंधित श्रमिकों की दयनीय हालत की जांच के लिए दबाब डाला गया था। यह ब्रिटिश साम्राज्य में गुलामी उन्मूलन (1833) के बाद अनुबंधित व्‍यवस्‍था की शुरुआत के कुछ वर्ष के भीतर हुआ था। इसी तरह से 1894 में कांग्रेस के मद्रास सत्र में दक्षिण अफ्रीकी उपनिवेशों में भारतीयों के मताधिकार से वंचित करने के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया गया था। कांग्रेस  ने पूना (1895) कोलकाता (1896) मद्रास (1898) लाहौर (1900) कोलकाता (1901) और अहमदाबाद (1902) सत्रों में भी इसी तरह के प्रस्तावों को अपनाया। उन दिनों में प्रवासी भारतीयों से अभिप्राय अधिकांश दक्षिण और पूर्वी अफ्रीका में भारतीयों से संबंधित था। इन्‍होंने स्थानीय ब्रिटिश सरकार द्वारा उनके अधिकारों के अतिक्रमण के खिलाफ कई संघर्ष आरंभ किए थे। गांधी-स्मट्स समझौता 1914 उनके लिए एक बड़ी जीत का द्योतक है।

दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे बर्मा, सिंगापुर, मलेशिया, थाइलैंड इत्यादि में प्रवासी भारतीय काफी संख्या में थे। इनमें से कइ 1940 के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आजाद हिंद फौज में स्वयंसेवक रहे और साथ ही फंडिंग का भी इंतजाम किया। मलेशिया में जन्मी तमिल मूल की युवा लड़कियों की कहानियां भी है जिन्होंने बंदूक उठाकर कंधे से कंधा मिलाते हुए उस भारत की आजादी की लड़ाई करने का फैसला किया जिसे उन्होंने कभी देखा भी नहीं था।
प्रवासी भारतीय दिवस से महात्मा गांधी के 9 जनवरी 2015 को भारत आगमन की यादें भी ताजा होती हैं। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए 21 साल तक लड़ाइयां लड़ी। उनके अहिंसक प्रतिरोध का रूप, जिसे उन्होंने सत्याग्रह नाम दिया, उसे लागू तो भारत में किया लेकिन उसका विकास दक्षिण अफ्रीका में हुआ था। गांधी के समय के औपनिवेशिक विश्व में प्रवासी भारतीयों की स्थिति आज की स्थिति से बेहद अलग थी। वो ऐसे दिन थे जब विदेश जाना ये विदेश में बसने को प्रतिष्ठित नहीं माना जाता था। विदेश जाने वाले ज्यादातर भारतीय फैक्ट्रियों में मजदूरी और खेती से जुड़े कार्यों में मजदूर के लिए पट्टे पर (अफ्रीका, वेस्टइंडीज, फिजी, श्रीलंका, बर्मा इत्यादि देशों में) ले जाए जाते थे। लेकिन हिंदू समाज में समुद्री यात्रा निशेध जैसे मध्यकालीन मान्यताओं को बदलने का श्रेय उन्हीं लोगो को जाता है।

औपनिवेशिक काल में नस्लभेद को औपनिवेशिक सरकारों ने राज्य की नीति की तरह स्थापित किया था। लेकिन औपनिवेशिक काल के खात्मे के बाद भी कई दूसरी तरह की समस्याएं पैदा हुई। गांधी के जीवनकाल के दौरान ही सिलॉन (श्रीलंका) और बर्मा (म्यांमार) में भारतीयों और वहां के स्थानीय लोगों के बीच तकरार होने लगी और सिलॉन और बर्मा के लोग भारतीयों से दूरी चाहने लगे।
डीएस सेनानायके की सरकार द्वारा पारित शुरुआती 2 प्रस्ताव में ही आजाद सिलॉन के करीब 10 लाख भारतीय मूल के नागरिकों को वहां की नागरिकता से महरूम कर दिया। हालांकि मॉरिसस में भारतीयों ने सत्ता पर पकड़ मजबूत कर ली लेकिन म्यांमार में अल्पसंख्यक बना दिए गए। इस तरह के देशों में भारतीयों को एक नए तरह के नस्लवाद का शिकार होना पड़ा।

औपनिवेशिक काल समुद्री प्रभुत्व का काल भी था। 1950 के आखिर तक पानी के जहाज ही महाद्वीपों के बीच आने जाने का सबसे भरोसेमंद साधन थे। 1960 की शुरुआत में हवाई जहाज ने लंबी दूरी के लिए पसंदीदा आवागमन के साधन के रूप में पानी के जहाज की जगह ले ली। भारत से प्रवास के स्वरूप को देखें तो मानव संसाधन की दक्षता और भारत से आवागमन पर इसकी छाप स्पष्ट देखी जा सकती है। संयोग से करीब उसी समय अमेरिका में पारित हुए अप्रवास और राष्ट्रीयता कानून, 1965 ने कौशल संपन्न पेशेवरों और छात्रों के प्रवास की राह आसान कर दी। इस ऐतिहासिक कानून ने भारतीय प्रवासी समुदाय की संख्या और साख को बदलकर रख दिया। 1960 में जहां 12000 भारतीय अमेरिका में रहते थे वही आज उनकी संख्या 25 लाख हो चुकी है। ये पढ़े लिखे और सफल प्रवासी भारतीय दुनिया भर में फैले भारतीय मूल के लोगों को भी राह दिखा रहे हैं।

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। समाजवाद के दौर में जब भारत कमजोर विकास दर से जकड़ा हुआ था उस समय यहां के नागरिक विदेशों में अपनी भारतीय पहचान को उजागर होने देना नहीं चाहते थे। भारत में भी अप्रवासी भारतीयों को भगोड़े की तरह देखा जाता था। लेकिन उदारीकरण के बाद विकास दर में तेजी, आईटी पॉवर हब के रूप में भारत का उदय और वाजपेयी सरकार की विकास नीतियों ने मिलकर प्रवासी भारतीयों का हौसला बढ़ाया। सैटेलाइट टीवी, इंटरनेट के आगमन और उसके बाद 1990 के दशक में घर-घर में टीवी की पहुंच के बाद विदेशों में बसे भारतीयों को लगातार अपने देश से संपर्क का साधन मिल गया। अब प्रवासी भारतीयों के लिए भी अपनी जन्मभूमि के हित के बारे में सोचना संभव हो गया। भारतीय और अप्रवासी भारतीय मिलकर देश को दुनिया में ऊंचा स्थान दिलाने के बारे में सोच सकते हैं। इससे नए ‘वैश्विक भारतीय’ की अवधारणा को बल मिला और इसी नाम के साथ कंचन बनर्जी ने 2008 में बोस्टन में एक मैगजीन भी शुरू की।

लेकिन अभी भी दुनिया के कई हिस्सों में भारतीय समुदाय को नस्लवाद, धार्मिक कट्टरता और कानूनी भेदभाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कई मोर्चों पर अभी सफलता मिलनी बाकी है। ऐसे में महात्मा गांधी के 1890 में दक्षिण अफ्रीका में शुरू किए गए संघर्ष की लौ बुझने नहीं देनी है।
*****    वीके/एसएस/पीकेटी-96  (Features ID: 149778) 0

मंगलवार, सितंबर 02, 2014

प्रधानमंत्री मोदी ने की नेता जी के सबसे पुराने साथी के साथ मुलाक़ात

02-सितम्बर-2014 19:43 IST
भारतीय समुदाय के समारोह में प्रधानमंत्री का संबोधन यादगारी रहा 
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी 02 सितंबर, 2014 को जापान के तोक्यो में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सबसे पुराने साथी रहे 99 वर्षीय साइशिरो मिसुमी से मुलाकात करने पहुंचे। (पसूका-हिंदी इकाई)
The Prime Minister, Shri Narendra Modi reaches out to 99 year old Saichiro Misumi, Netaji's oldest living associate in Japan, in Tokyo, Japan on September 02, 2014
प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने आज जापान के तोक्‍यो में एक स्‍वागत समारोह के दौरान भारतीय समुदाय को संबोधित किया। उन्‍होंने जापान की यात्रा को सफल बताया और जापान द्वारा की गई 3.5 ट्रिलियन येन के निवेश की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। उन्‍होंने छह भारतीय कम्‍पनियों पर लगाई गई पाबंदी को हटाने का भी जिक्र किया और कहा कि ऐसा इसलिए संभव हो पाया क्योंकि दोनों देशों के आपसी रिश्‍ते विश्वास के मजबूत धागे पर आधारित हैं। प्रधानमंत्री ने वाराणसी-क्योतो साझेदारी नगर सहमति पत्र पर हस्‍ताक्षर किए जाने पर भी संतोष जताया और उम्‍मीद जताई कि वाराणसी भी क्‍योतो जैसे एक आधुनिक धरोहर नगर के रूप में उभरेगा।

प्रधानमंत्री ने जिक्र किया कि उन्‍होंने जापान के सम्राट अकिहितो और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे दोनों को ही बतौर भेंट भगवत गीता दी है।

महात्‍मा गांधी की 150वीं जयंती यानी 2019 तक स्‍वच्‍छ भारत के अपने विजन का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने जापान में भारतीय समुदाय के हर परिवार से आग्रह किया कि वे जापान से प्रत्‍येक वर्ष पांच जापानी परिवारों को भारत की यात्रा करने के लिए प्रेरित करें। उन्‍होंने जापान में भारतीय समुदाय से गवर्नेंस पर हाल ही लांच की गई ‘माईगव. इन’ वेबसाइट पर सुझाव देने की भी अपील की।

प्रधानमंत्री ने कहा कि 21वीं सदी निश्चित रूप से एशिया की सदी होगी लेकिन यह क्‍या आकार लेता है, यह इस पर निर्भर करेगा कि भारत और जापान के बीच रिश्‍ते किस प्रकार पनपते हैं, यह किन मूल्‍यों को बढ़ावा देता है और यह विश्‍व को किस दिशा में ले जाता है। उन्‍होंने जापान में भारतीय समुदाय से इस परिपेक्ष्‍य में इनकी अहमियत की सराहना करने का आग्रह किया।
वि. कासोटिया/एएम/आरआरएस/एसएसके-3471

गुरुवार, जनवरी 02, 2014

कौन सा मार्ग शेष रह गया//पंडित सिद्धार्थ शर्मा

Thu, Jan 2, 2014 at 12:36 PM
अब तो कमजोर और पाखण्ड का ये देश है 
अब ना भगत ना सुखदेव ना राज गुरु शेष हैं 

हे भारत भू हे सखी तू 
लौट जा उस काल में तू 
जब तेरे बालक के बाजू में था दम
जब था वो यमुना का जल सरस पावन
जब स्वम माधव ने भरी सभा चीर को बढाया 
जब एक धागे की कसम ने रक्षा बन्धन का सम्मान पाया 
जब भीम ने दुर्योधन के घमण्ड को जन्घा से हटाया
जब दुर्गा ने धरा पर माता का सम्मान पाया 
अब तो कमजोर और पाखण्ड का ये देश हैं 
अब ना भगत ना सुखदेव ना राज गुरु शेष हैं 
पैसा कमाना कैसे सब ये पढाते
जीवन जीना कैसे ये सब भूल जाते
आदर्श के नाम पे घोटाला लिखा हैं 
गैर ने नही ये खून तेरा अपनो ने पिया हैं 
हे भवानी ! क्यू राजपूतो का खून अब ना डोले
देख कर ये हशर कोई उद्धम सिंह क्यू ना बोले 
बस मंदिरो में सब ने तुझ को कैद कर दिया हैं 
केवल विनाश  का रास्ता ही शेष रह गया हैं 

--पंडित सिद्धार्थ शर्मा  (सत्र 2004-08)

मंगलवार, दिसंबर 31, 2013

बाबा रामदेव: 1 मार्च से घर-घर जाकर वोट फार मोदी कैंपेन चलाएंगे

Tue, Dec 31, 2013 at 1:58 PM
कहा-लोगों को पानी मुफ्त देना सरकार का दायित्व
केजरीवाल ने नया क्या किया
अमृतसर: 31 दिसंबर 2013 : (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन//इर्द गिर्द): 
देश में भ्रष्टाचार समाप्त करने और विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने के मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार से टक्कर लेने वाले योग गुरु बाबा रामदेव ने स्पष्ट किया है, कि इस समय देश को नरिंदर मोदी जैसे दिग्गज नेता की जरूरत है, जो लोगों को भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन देने में समर्थ हैं। वह आज अमृतसर पहुंचे थे। पत्रकार वार्ता के दौरान उन्होंने कहा, कि 2014 में देवत्व की स्थापना के साथ-साथ अन्य मुद्दों पर भी उनका आंदोलन जारी रहेगा। अपने आंदोलन के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा, कि एक मार्च से वह और उनके कार्यकर्ता पूरे देश में घर-घर जाकर वोट फार मोदी और भ्रष्टाचार समेत अन्य मुद्दों के खिलाफ वोट करने के लिए लोगों से अपील करेंगे। इसके अलावा 23 मार्च को शहीदी दिवस के उपलक्ष्य में वह दिल्ली में एक बहुत बड़ा योग कैंप लगा रहे हैं, जिसमें एकसाथ पूरे देश में करीब दस करोड़ लोग एकसाथ योगाभ्यास करेंगे।
   नरिंदर मोदी के प्रचारक के रूप में बाबा रामदेव के आगे आने के बारे में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा, कि वह नरिंदर मोदी के प्रचारक नहीं है। बल्कि वह इसलिए उनका साथ दे रहे हैं, क्योंकि नरिंदर मोदी और उनके मुद्दे एकसमान है। इसलिए वह नरिंदर मोदी का प्रचार करने में जुटे हुए हैं। आम आदमी पार्टी की ओर से सत्ता में आते ही लोगों को मुफ्त पानी जैसी सुविधा दिए जाने के बारे में बाबा रामदेव ने कहा, कि इसमें केजरीवाल ने नया क्या किया। उन्होंने कहा, कि पहले आम आदमी पार्टी को अपनी विचार धारा स्पष्ट करनी होगी कि उनकी विचारधारा वामपंथी है या कुछ और। दिल्ली में नरिंदर मोदी के जादू के फेल होने के बारे में बाबा रामदेव ने कहा, यदि वहां मोदी फैक्टर नहीं चला होता, तो भाजपा की हालत कांग्रेस से भी बदत्तर होती।

गुरुवार, नवंबर 14, 2013

Each image of Kashmiri Hindu House is stark,

Plain-spoken, without embellishment
14-06-2009 को अपलोड किया गया
My Lost Home
Video Produced by: Deepak Ganju
Images: Veer Munshi & Deepak Ganju
Song: Arti Tiku Kaul
See at shehjar Magazine at:http://www.shehjar.com/list/94/840/1....

Each image of Kashmiri Hindu House
is stark, plain-spoken, without embellishment.
There is no annotati ve manipulati on of these
images, no theatricality, no vein of melodrama,
no overtly elegiac air, no demand for sympathy.
There they stand, in our line of sight: ruins,
monuments, memorials.
This is testimony to the unforgiving march of
history, which takes no prisoners.
'Ranjit Hoskote'  (Courtesy: YouTube)

सोमवार, अक्टूबर 07, 2013

सड़कों पर पहुंचा लुधियाना का मजदूर आंदोलन

Mon, Oct 7, 2013 at 5:30 PM
श्रम विभाग पर रोषपूर्ण प्रदर्शन:चौथे दिन भी नहीं हुआ कोई फैसला 
लुधियाना:07 अक्टूबर 2013: (*विश्वनाथ//पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):ऊपर खुला आसमान, नीचे जमीन, कड़कती धुप में एक बार बुलंद हो रहा था वही पुराना नारा---
हर जोर ज़ुल्म की टक्कर में हडताल हमारा नारा है    
आज हड़ताली टेक्सटाइल मजदरों ने श्रम विभाग कार्यालय पर रोषपूर्ण प्रदर्शन किया। वास्तव में उनके पास कोई और रास्ता शायद बचा ही नहीं था। श्रम विभाग ने मजदूरों और मालिकों को आज की तारीख पर श्रम कार्यालय बुलाया था। लेकिन वहाँ न मालिक मिले न श्रम अधिकारी। टेक्सटाइल-हौजरी कामगार यूनियन के अध्यक्ष राजविन्दर ने बताया कि मालिकों के साथ साथ श्रम अधिकारियों द्वारा अपनाए जा रहे यह मजदूर विरोधी रवैया मजदूरों को कतई झुका नहीं पाएगा बल्कि इससे मजदूरों में रोष को और भी बढ़ गया है। मजदूर अपने अधिकार हासिल करके ही काम पर लौंटेंगे भले ही उन्हें कितनी भी लम्बी हड़ताल क्यों न लडऩी पड़े। जैसे साहिर साहिब के शब्दों में कह  रहे हों---
तुम समझौते की आस रखो हम आगे बढ़ते जायेंगे 
इस समय 36 कारखानों के मजदूर टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन के नेतृत्व में हड़ताल पर हैं। 40 कारखानों में पहले ही 15 प्रतिशत वेतन/पीस रेट वृद्धि और 8.33 प्रतिशत सालाना बोनस की माँग पर समझौता हो चुका है। लेकिन 36 कारखानों के मालिक मजदूरों को उनके कानूनी अधिकार देने को तैयार नहीं हैं। 
श्रम विभाग कार्यालय पर हुए प्रदर्शन में कई अन्य संगठनों के नेताओं ने समर्थन जाहिर किया। प्रर्दशन को टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन के अध्यक्ष राजविन्दर, कारखाना मजदूर यूनियन के संयोजक लखविन्दर, मोल्डर एण्ड स्टील वर्कज यूनियन के हरजिन्दर सिंह, इंटक के उपाअध्यक्ष सबरजीत सिंह सरहाली व टेक्सटाइल-हौजरी कामगार यूनियन के समिति सदस्यों विश्वनाथ, प्रेमनाथ, गोपाल आदि ने सम्बोधित किया। सभी मजदूरों ने जोशीले नारों के साथ यह ऐलान किया कि उनकी लड़ाई हक हासिल होने तक जारी रहेगी।

*विश्वनाथ टेक्सटाइल-हौजरी कामगार यूनियन, पंजाब (रजि.) के सचिव हैं   

शनिवार, सितंबर 07, 2013

कृपालु महाराज अपने बेडरूम में शिष्याओं को दान में देते हैं प्रेम ?

15 सालों तक कृपालु के आश्रम में रहीं, अब ठगा महसूस करती हैं केरेन 
Comrade Aman Mishra Dyfi ने आज बाद दोपहर करीब ढाई बजे पोस्ट की एक रचना में कृपालू महाराज को भी आड़े हाथों लिया है। समाज को खोखला कर रहे, संघर्ष की शक्ति को कुंद कर रहे और पूंजीवाद के जीवन को और लम्बा कर रहे ये डेरे-ये बाबे क्या हैं…पढ़िये कामरेड मिश्रा की इस पोस्ट में आपको उनके विचार कैसे लगे अवश्य लिखें। यदि आप उनसे सहमत न भी हुए तो भी आपके विचारों को स्थान अवश्य मिलेगा पर उनका  तर्क आधारित और उचित शब्दों में होना आवश्यक है। गाली गलौज और व्यक्तिगत रंजिश से भरी कोई बात न भेजें। यदि आपका इस मामले में कोई अनुभव रहा हो तो उसे भी भेजने में संकोच न करें। उस रचना से सबंधित तस्वीर भी अवश्य भेजने का प्रयास करें।  हम आपके विचार आपके नाम से प्रकाशित करेंगे। अगर किसी को अपना नाम ज़ाहिर करने में संकोच हो तो स्पष्ट लिखें आपका नाम ज़ाहिर नहीं किया जायेगा। --रेक्टर कथूरिया 
   उनके पूर्व गुरु की बेडरूम गतिविधियों की तीखी आलोचना होती है। केरेन के मुताबिक, 
'चूंकि उन्हें भक्त कृष्ण का अवतार मानते हैं, इसलिए उनका सेक्शुअल टच ईश्वरीय प्रेम का उपहार या प्रेमदान मान लिया जाता है

भारत में ऐसे कई संत हैं, जिन पर धर्म के खिलाफ जाकर आचरण करने का आरोप लग चुका है। खुद को कृष्ण और चैतन्य प्रभु का अवतार और जगतगुरु बताने वाले विवादास्पद आध्यात्मिक गुरु कृपालु महाराज ऐसे ही आरोपों से घिरे 'संत' हैं। उनके दामन पर महिलाओं से अभद्रता के आरोपों के दाग हैं। कृपालु महाराज की एक शिष्या केरेने जॉनसन ने 'सेक्स, लाइज एंड टू हिंदू गुरुज: हाउ आई वॉज कॉन्ड बाई अ डैंजरस कल्ट' नाम की किताब में कृपालु महाराज के आश्रमों में चल रही गतिविधियों और खुद कृपालु महाराज के चरित्र को लेकर कई संगीन आरोप लगाए हैं।15 सालों तक कृपालु के आश्रम में रहीं, अब ठगा महसूस करती हैं केरेन 
कृपालु महाराज की पूर्व अमेरिकी शिष्या केरेन जॉनसन का कहना है कि उनका अपने पूर्व गुरु के यहां 15 सालों का तजुर्बा बहुत ही खराब रहा। अपने बारे में केरेन बताती हैं, 'मैं जगदगुरु कृपालु परिषद (जेकेपी) संप्रदाय की सदस्य थी। मैं अमेरिका के ऑस्टिन शहर में जेकेपी आश्रम में 15 सालों तक रही। पहले इस आश्रम को बरसाना धाम कहा जाता था। जब मुझे लगा कि मैं एक खतरनाक संप्रदाय का हिस्सा हूं तो मुझे लगा कि इसकी पोल खोलना जरूरी है। मैं शुरुआत में आध्यात्मिकता की तलाश कर रही मासूम युवती थी। लेकिन अब मैं इंसाफ चाहती हूं। मैं उन लड़कियों और बच्चों के लिए लड़ना चाहती हूं जो इन गुरुओं का शिकार बनीं।' कृपालु महाराज की पूर्व अमेरिकन शिष्या केरेन जॉनसन का कहना है कि उनके पूर्व गुरु की बेडरूम गतिविधियों की तीखी आलोचना होती है। केरेन के मुताबिक, 'चूंकि उन्हें भक्त कृष्ण का अवतार मानते हैं, इसलिए उनका सेक्शुअल टच ईश्वरीय प्रेम का उपहार या प्रेमदान मान लिया जाता है। कृपालु महाराज कई महिलाओं को आपत्तिजनक तरीके से छूते हैं। वे महिलाओं को चरण-सेवा के लिए भी आमंत्रित करते हैं। चरण-सेवा के तहत कृपालु महाराज की मालिश की जाती है और इसमें सेक्शुअल टच भी शामिल होता है।'

मदरसे आतंक की फेक्ट्री और अपने आश्रम संस्कृति के जनक?