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शनिवार, मई 01, 2021

कोरोना महामारी: मुसलमानों पर निशाना//राम पुनियानी

1st May 2021 at 9:11 AM

'नमस्ते ट्रंप' और कनिका कपूर की यात्रा को कोरोना से नहीं जोड़ा

28 अप्रैल, 2021

इस समय भारत कोरोना महामारी के सबसे विकट दौर से गुजर रहा है। संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है और मौतें भी।  हर चीज की कमी है-अस्पतालों में बिस्तरों की, दवाईयों की, आक्सीजन की, जांच सुविधाओं की और वैक्सीनों की।  इस रोग से ग्रस्त लोगों और उनके परिवारों के लिए यह एक बहुत बड़ी आपदा है। देश देख रहा है कि योजनाएं बनाने में दूरदृष्टि के अभाव और संसाधनों के कुप्रबंधन के कितने त्रासद परिणाम हो सकते हैं। ज्योंही सरकार की निंदा शुरू होती है, सारा दोष 'व्यवस्था' पर लाद दिया जाता है। दोष श्री मोदी का नहीं है, समस्याओं के लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं-सारा दोष 'व्यवस्था' का है। 

हमारे शासकों में वैज्ञानिक सोच और समझ की भारी कमी है। यही कारण है कि हमारे शीर्ष नेता ने यह दावा किया था कि हम 21 दिन में महामारी पर विजय प्राप्त कर लेंगे। कुछ नेताओं ने श्रद्धालुओं से अपील की  वे बड़ी संख्या में कुंभ में आकर पुण्य लूटें। कुछ अन्य ने मास्क जेब में रखकर बड़ी-बड़ी चुनावी सभाओं को संबोधित किया। इन सभाओं में श्रोताओं के बीच दो गज तो क्या दो इंच की दूरी भी नहीं रहती थी। कम से कम दो उच्च न्यायालयों ने देश में कोविड के फैलाव के लिए चुनाव आयोग को दोषी ठहराया है। 

इसके साथ ही हमारे सामने कोरोना योद्धाओं की कड़ी मेहनत और समर्पण के उदाहरण भी हैं। इस संकटकाल में हिन्दू और मुसलमान जिस तरह एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं उससे हमारे देश के मूलभूत मूल्य सामने आए हैं। 

जिन मुसलमानों को इस रोग को फैलाने का जिम्मेदार ठहराया गया था वे ही अब आगे बढ़कर परेशान हाल लोगों की मदद कर रहे हैं और उनके दर्द में साझेदार बन रहे हैं। हमारे शासक चाहे अपनी पीठ कितनी ही क्यों न थपथपा लें इतिहास में उनकी भूलें दर्ज हो चुकी हैं। हमारे देश की बुरी हालत को पूरी दुनिया अवाक होकर देख रही है। 

हमारे देश में आक्सीजन तक नहीं है। हां, हम अरबों रूपये गगनचुंबी मूर्तियों, सेन्ट्रल विस्टा, बुलैट ट्रेन और राम मंदिर पर खर्च कर रहे हैं। हमारे देश के शासकों को केरल से सबक लेना चाहिए जिसने व्यर्थ की परियोजनाओं में पैसा फूंकने की बजाए आक्सीजन संयत्रों में निवेश किया और नतीजे में आज न केवल राज्य में आक्सीजन की कोई कमी नहीं है वरन् वह पड़ोसी राज्यों को भी यह जीवनदायिनी गैस उपलब्ध करा रहा है। 

मार्च 2020 में मरकज निजामुद्दीन में आयोजित तबलीगी जमात की अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस के बहाने मुसलमानों का जमकर दानवीकरण किया गया था। भारत की साम्प्रदायिक ताकतों को मुसलमानों के खिलाफ नफरत पैदा करने के लिए मौके की तलाश रहती है। उन्हें सैकड़ों साल पहले के मुस्लिम बादशाहों के कर्मों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय आतंकी गिरोहों से उनके संबंध जोड़े जाते हैं। उन्हें ढ़ेर सारे बच्चे पैदा कर देश की आबादी को बढ़ाने का दोषी ठहराया जाता है। उन्हें लव जिहाद और गौमांस खाने के लिए कठघरे में खड़ा किया जाता है। जाहिर है कि इस माहौल में तबलीगी जमात का आयोजन, साम्प्रदायिक संगठनों और पूर्वाग्रह ग्रस्त मीडिया के लिए एक सुनहरा मौका था। 

इस रोग के फैलने के अन्य सभी कारणों को नजरअंदाज करते हुए उसके लिए सिर्फ तबलीगी जमात के आयोजन को दोषी ठहराया गया। ऐसा बताया गया कि मरकज का आयोजन ही इसलिए किया गया था ताकि भारत में कोरोना फैलाया जा सके। 'नमस्ते ट्रंप' और कनिका कपूर की यात्रा को कोरोना से नहीं जोड़ा गया। यह हमारा दुर्भाग्य है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार का भोंपू बन गया है।

कुछ 'प्रतिभाशाली' पत्रकारों ने कोरोना जिहाद और कोरोना बम जैसे शब्द ईजाद किए। जल्दी ही कई अन्य प्रकार के जिहाद भी सामने आए. ऐसा लगने लगा मानो इस देश के मुसलमानों के पास जिहाद करने के अलावा और कोई काम है ही नहीं। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म ने मुसलमानों को बलि का बकरा बनाए जाने पर एक रिपोर्ट जारी की। इसका शीर्षक था 'द कोविड पेन्डेमिक: ए रिपोर्ट आन द स्केप गोटिंग ऑफ़ मुस्लिम्स इन इंडिया।'  

इस रपट में उन विभिन्न प्रकार के जिहादों की चर्चा की गई है जिनके नाम पर मुसलमानों को कठघरे में खड़ा किया जाता है। इनमें शामिल हैं 1. आर्थिक जिहाद, अर्थात व्यापार और व्यवसाय के जरिए धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ाना, 2. इतिहास जिहाद, अर्थात इतिहास को इस प्रकार तोड़ना-मरोड़ना जिससे इस्लाम का महिमामंडन हो, 3. फिल्म और गीत जिहाद, अर्थात फिल्मों के जरिए मुगलों और माफिया का महिमामंडन करना व फिल्मी गीतों के जरिए इस्लामिक संस्कृति को बढ़ावा देना, 4. धर्मनिरपेक्षता जिहाद, अर्थात वामपंथियों, साम्यवादियों और उदारवादियों को मुसलमानों के पाले में लाना, 5. आबादी जिहाद, अर्थात चार महिलाओं से शादी करना और अनगिनत बच्चे पैदा करना, 6. भूमि जिहाद, अर्थात जमीन पर कब्जा कर बड़ी-बड़ी मस्जिदें, मदरसे और कब्रिस्तान बनाना, 7. शिक्षा जिहाद, अर्थात मदरसे स्थापित करना और अरबी भाषा को प्रोत्साहन देना, 8. बेचारगी जिहाद, अर्थात अपने आप को बेचारा बताकर आरक्षण और अन्य सुविधाएं मांगना एवं 9. प्रत्यक्ष जिहाद, अर्थात गैर-मुसलमानों पर हथियारबंद हमले। 

रपट में फेक न्यूज के अनेक उदाहरण दिए गए हैं। इनमें शामिल हैं ये खबरें कि मुसलमान जगह-जगह थूककर और खाने के बर्तन चाटकर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि कोरोना का वायरस ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे।  मीडिया के दोहरे मानदंड मुसलमानों और हिन्दू/सिक्खों के लिए प्रयुक्त अलग-अलग भाषा से ही जाहिर हैं।  उदाहरण के लिए जी न्यूज की एक खबर का शीर्षक था, 'आठ मस्जिदों में 113 लोग छिपे हुए हैं'  हिन्दुस्तान टाईम्स की एक खबर का शीर्षक था 'कोविड-19: दिल्ली में छुपे 600 विदेशी तबलीगी जमात कार्यकर्ता पकड़े गए।'  इसके विपरीत, दो सौ सिक्ख दिल्ली के मजनूं का टीला गुरूद्वारे में 'फंसे' हुए थे। इसी तरह अचानक लॉकडाउन लगा दिए जाने से 400 तीर्थयात्री वैष्णोदेवी में ‘फंस‘ गए थे। अर्थात, जहां हिन्दू और सिक्ख 'फंसे' थे वहीं मुसलमान 'छिपे' थे भाजपा के आईटी सेल के अमित मालवीय ने 'कट्टरपंथी तबलीगी जमात' की मरकज में गैरकानूनी बैठक की बात कही। गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी भी तबलीगी जमात को कोविड के फैलाव के लिए जिम्मेदार बताते हैं। 

अल्पसंख्यकों के बारे में ये झूठी बातें मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए इतनी बार दुहराई जाती हैं कि लोगों को वो सच लगने लगती हैं। 

हमें कोरोना से मुक्त होना है। साथ ही हमें धार्मिक पूर्वाग्रह के वायरस से भी मुक्त होना होगा। सोशल मीडिया और मीडिया में अल्पसंख्यकों के विरूद्ध दुष्प्रचार को हमें रोकना ही होगा। कोरोना के मामले में जिस तरह के झूठ बोले गए और जिस तरह एक समुदाय को दोषी ठहराया गया। उससे हमारी आंखे खुल जानी चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि कुंभ, चुनाव रैलियां और हमारी सरकारों का निकम्मापन कोरोना संकट के लिए जिम्मेदार हैं। 

(अग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

शनिवार, अगस्त 01, 2020

Covid-19:बहुत से वैज्ञानिक सवालों का जवाब ढूँढ लिया गया है

1st August 2020 at 5:53 AM
 लेकिन अनेक सवाल अब भी अनुत्तरित हैं 
31 जुलाई 2020//स्वास्थ्य
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने वैश्विक महामारी कोविड-19 को एक ऐसा स्वास्थ्य संकट क़रार दिया है जो सदी में एक ही बार आता है और जिसके प्रभाव आने वाले कई दशकों तक महसूस किए जाते रहेंगे। इस मुद्दे पर  30 जनवरी 2020 को यूएन स्वास्थ्य एजेंसी की आपात समिति ने कोविड-19 को अन्तरराष्ट्रीय चिन्ता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा घोषित किए जाने की सिफ़ारिश की थी जिसके छह महीने पूरे होने पर शुक्रवार, 31 जुलाई, को समिति ने फिर बैठक कर मौजूदा हालात की समीक्षा की है। 

जनवरी 2020 में अन्तरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नियामक आपात समिति ने पहली बार कोरोनावायरस संकट पर चर्चा की थी जिसके बाद समिति  चौथी बार मिल रही है।  

शुक्रवार को आपात समिति को सम्बोधित करते हुए यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के महानिदेशक डॉक्टर टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने कहा कि छह महीने पहले आपात समिति की सिफ़ारिश पर ही अन्तरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एमरजेंसी की घोषणा की गई थी। 

उस समय चीन से बाहर किसी संक्रमित की मौत नहीं हुई थी और महज़ 98 मामलों की ही पुष्टि हुई थी।  

“यह वैश्विक महामारी एक सदी में एक बार आने वाला स्वास्थ्य संकट है जिसके प्रभाव आने वाले कई दशकों तक महसूस किए जाते रहेंगे।”

उन्होंने कहा कि बहुत से वैज्ञानिक सवालों का जवाब ढूँढ लिया गया है लेकिन अनेक सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। 

कुछ अध्ययनों के शुरुआती नतीजे दर्शाते हैं कि विश्व की अधिकाँश आबादी पर अब भी इस वायरस से संक्रमित होने का जोखिम मंडरा रहा है, उन इलाक़ों में भी जहाँ पहले ही व्यापक स्तर पर संक्रमण का फैलाव हो चुका है। 

“बहुत से देश जिनका मानना था कि अब वे ख़राब हालात से गुज़र चुके हैं, उन्हें भी नए फैलाव से जूझना पड़ रहा है।” 

“शुरुआती हफ़्तों में जो देश कम प्रभावित थे अब वहां तेज़ी से संक्रमणों व मौतों की संख्या बढ़ रही है। व्यापक स्तर पर संक्रमणों का सामना करने वाले कुछ उन पर क़ाबू पाने में सफल रहे हैं।”

यूएन एजेंसी प्रमुख ने स्पष्ट किया है कि असरदार वैक्सीन को विकसित करने के प्रयास तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं लेकिन हमें इस वायरस के साथ रहना सीखना होगा, और मौजूदा औज़ारों के साथ इससे लड़ना होगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब तक छह बार अन्तरराष्ट्रीय चिन्ता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति की घोषणा की है:
- एच1एन1 (2009)
- पोलियो (2014)
- पश्चिम अफ़्रीका में इबोला (2014)
- ज़ीका (2016)
- काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य में इबोला (2019)
- कोविड-19 (2020) 
अन्तरराष्ट्रीय चिन्ता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य एमरजेंसी की घोषणा के तहत यूएन स्वास्थ्य एजेंसी कुछ अस्थाई सिफ़ारिशें जारी करती है।

ये अनुशंसाएं बाध्यकारी नहीं होती हैं लेकिन व्यावहारिक व राजनैतिक रूप से ऐसे उपायों के रूप में होती हैं जिनसे यात्रा, व्यापार, मरीज़ को अलग रखे जाने, स्क्रीनिंग व उपचार पर असर पड़ता है। 

साथ ही यूएन एजेंसी इस संबंध में वैश्विक मानक स्थापित कर सकती है। 
खबर के साथ दी गई तस्वीर ग़ाज़ा की एक मस्जिद में कोविड-19 से ऐहतियाती उपायों के तहत सफ़ाई किये जाने के मौके पर UNDP PAPP/Abed Zagout ने क्लिक की। 

रविवार, मई 03, 2020

इस बार कैसे दें मज़दूर दिवस की बधाई-पूछा है अनीता शर्मा ने

Sunday: 3rd May 2020 at 2:31 PM  
मज़दूर तो कोरोना महामारी के कारण घरों में भूखे बैठे है-अनीता शर्मा 
लुधियाना: 1 मई 2020: (कार्तिका सिंह//इर्द गिर्द डेस्क):: 
कामरेड कुलदीप बिन्द्र ने इस तस्वीर को सीपीआई के
वाटसप ग्रुप में मज़दूर दिवस के मौके पर पोस्ट किया
अनीता शर्मा फाईल फोटो 
मज़दूर की मेहनत और उसके बनते हक पर बहुत पहले जनाब फ़ैज़ अहमद फैज़ साहिब ने एक गीत लिखा था जो उसकी लूट की चर्चा भी करता था और उसके मज़बूत इरादों को भी दर्शाता था। गीत के शुरूआती बोल हैं:
हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे;
इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे!
मज़दूरों ने अपने अपने झंडे तले इस गीत को बार बार गाया और दोहराया। हर वर्ष पहली मई को मज़दूर दिवस के मौके पर लगने वाली स्टेजों पर इस गीत का गायन बहुत ही जोशो खरोश से हुआ करता। सन 1983 में जब "मज़दूर" फिल्म आई तो इस गीत को उसमें भी शामिल किया गया। दलीप कुमार, राज बब्बर और अन्य कलाकारों पर इस गीत के बोलों को बहुत ही खूबसूरती से पिक्चराईज़ किया गया। गीत के बोलों और कलाकारों के इशारों का समन्वय बेहद अर्थपूर्ण रहा। उस फिल्म से यह गीत उन तक भी  पहुंचा जिन्होंने इसे पेहे न कभी सुना था न ही कभी पढ़ा था। इस तरह यह गीत समाजवाद की फिलासफी ले कर घर घर तक पहुंचा। लेकिन पूंजीवाद अपनी चाल चलता रहा। बड़ी बड़ी मशीनें बनी, मोटर कारें बनी, कम्प्यूटर बने और कामकाज बेहद आसान भी हो गया। इसके बावजूद मज़दूर को इसका फायदा न हुआ। फायदा सिर्फ मालिकों को ही पहुंचा। अमीर और ज़्यादा अमीर होता चला गया और गरीब और ज़्यादा गरीब होता गया।  मशीनीकरण के बावजूद मज़दूर के काम के घंटे आठ से कम न हुए। बहुत जगहों पर तो उससे आठ से भी कहीं ज़्यादा काम लिया जाता रहा। ट्रेड यूनियनों ने जो जो कुछ किया उसकी झलक भी कई बार फिल्मों में नज़र आती रही। एक सवाल बहुत लोकप्रिय हुआ कि गरीबों के लिए उनकी लड़ाई लड़ने वाले खुद कैसे अमीर हो जाते हैं और गरीब रास्ते की धुल बन कर कहां खो जाते हैं? रास्ते की धुल बन कर खो गए मज़दूर की बात की है बेलन ब्रिगेड की राष्ट्रिय प्रमुख अनीता शर्मा ने। 
उन्होंने याद दिलाया है इस बार 2020 का मज़दूर दिवस उस वक्त आया है जब सारी दुनिया में कोरोना का आतंक और शोर है। कारोबार बंद हैं। फ़ैक्ट्रियन बंद हैं। बहुत बड़ी संख्या में रेलें और बसें भी बंद हैं। मज़दूर कोरोना महामारी के कारण घरों में बैठे हैं। करीब 40 दिन हो गए हैं उन्हें घर बैठे हुए। उनके सामने यही रास्ता बचा कि या तो भूख से तेदेपा तेदेपा कर दम तोड़ दें और या फिर पैदल ही अपने अपने गांव की तरफ चल पड़ें। मज़दूरों ने पैदल चलने को पहल दी। सैंकड़ों किलोमीटर की दूरी पर स्थित अपने गांवों में उन्हें अपना भविष्य सुरक्षित नज़र आया। बरखा दत्त, आरिफा खानुम और बहुत ऐसे अन्य पत्रकारों ने उनके इंटरव्यू सड़कों पर खुद हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करके लिए हैं। मुख्य धरा का मीडिया जिन हकीकतों को छुपा रहा था इन जांबाज़ पत्रकारों ने उन हकीकतों को जनता के सामने रखा। आने वाले वक़्त में इन छोटी छोटी वीडियो खबरों को बहुत बड़ी अहमियत मिलेगी। किसी डॉक्यूमेंट्री से कम नहीं हैं यह कवरेज। 
बेलन ब्रिगेड की राष्ट्रीय अध्यक्ष आर्किटेक्ट अनीता शर्मा ने बताया कि कोरोना वायरस के कारण हर गली- मोहल्ले और शहर में इस कड़वी हकीकत को देखा जा सकता है। देश भर के इलाकों में जो मज़दूर लोग  फैक्ट्रियों में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन में दिन रात काम करके अपना और अपने परिवार का पेट पालते थे आज घरों में बैठने को मजबूर हो गए हैं। जो मज़दूरहर रोज़  400-500 रुपये की मज़दूरी  करता था आज लंगर की लाईन में लगने को मजबूर है। ऐसे मज़दूरों के हालात हमारे देश में बहुत दयनीय हो चुके हैं।  
मज़दूरों की हालत बताते हुए मैडम अनीता शर्मा ने कहा कि इन मज़दूरों के पास बीमार होने पर दूध दवाई के लिए पैसे तो क्या घर में खाने के लिए राशन तक नहीं है। बहुत सारे मज़दूरों के पास  नीले पीले राशन कार्ड  नहीं है। कोई बैंक अकाउंट भी नहीं है। लेबर डिपार्टमेंट में उनकी कोई रजिस्ट्रेशन भी नहीं है और सरकार की तरफ से गरीब लोगो के लिए जो राशन आ रहा है वह भी इन तक नहीं पहुंचता। उस राशन को सरकारी अफसर, इलाके के नेता पार्षद विधायक मजदूरों व गरीबो में बांटने की जगह अपने अपने चहेतो सपोर्टरो में ही बांट रहे हैं।  
अनीता शर्मा ने आगे कहा कि जो लोग कॉरपोरेट फैक्ट्रियों के मालिक हैं और जिन मज़दूरों की बदौलत आज वे आलिशान कोठियों में बैठे है उन मज़दूरों को कम से कम पेट भरने के लिए राशन तो उनके घरो तक पहुंचाने का बंदोवस्त करें ताकि कोरोना महामारी के बाद जब ये लोग काम पर लौटेगे तो आपकी इस मदद का दोगुना ज्यादा लाभ देंगे।  आज लेबर डे पर इंसानियत के नाते हर  नागरिक का फर्ज बनता है कि इस कोरोना महामारी के हालात में अपने आस पड़ोस में रहने वाले गरीब मजदूरों को दो वक्त की रोटी खिला कर उनकी मदद करे। मज़दूरों के बेहतर भविष्य के लिए एक विशेष स्थायी फंड भी कायम किया जाना चाहिए। 

गुरुवार, अप्रैल 30, 2020

मज़दूरों पर छाया कोरोना और भूख का साया

हर कोने में परेशान बैठे मज़दूर मांग रहे हैं गांव वापिस जाने की सहायता 
लुधियाना: 29 अप्रैल 2020:(एम एस भाटिया//प्रदीप शर्मा इप्टा//इर्द गिर्द डेस्क)::
जिन मज़दूरों ने कभी मांगना नहीं सीखा था। जिनको केवल आपने हाथों की सच्ची मेहनत पर भरोसा था। इसी मेहनत के बल पर वह जोश में आ कर गाते:
हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे!
इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे!
फ़ैज़ साहिब का लिखा यह गीत बहुत गहरी बातें करता है। बहुत ऊंचे इरादों को दर्शाता है। इस गीत में आगे जा कर शायर ने जो कुछ कहा है बहुत गहरे जाते हैं। उन पकंतियों में इरादे भी हैं, सपने भी और उन सपनों को साकार करने की हिम्मत भी। इन पंक्तियों को पढ़िए और मज़दूर की बाज़ुओं का अनुमान लगा लीजिये।  लीडरों के बयानों में शायद आपको कभी कभार कमज़ोरी या समझौतों की बात नज़र आ जाये लेकिन मज़दूर तो पूरी तरह समर्पित भी है और शिद्द्त से उस तरफ अग्रसर भी है। इस लिए इनको ज़रूर देखिये। अब पढ़िए ज़रा वो पंक्तियां जो लिखे  लेकर अब तक हर मज़दूर की  ज़ुबान पर हैं: 

यां पर्वत-पर्वत हीरे हैं, यां सागर-सागर मोती हैं;
ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे!

वो सेठ व्‍यापारी रजवारे, दस लाख तो हम हैं दस करोड़;
ये कब तक अमरीका से, जीने का सहारा मांगेंगे!

जो खून बहे जो बाग उजडे जो गीत दिलों में कत्‍ल हुए;
हर कतरे का हर गुंचे का, हर गीत का बदला मांगेंगे! इस गीत को मज़दूर बिगुल ने अपने ढंग से प्रस्तुत किया और बहुत खूबसूरती से किया। देखें उसकी एक झलक:
इस गीत को फिल्मों में भी फिल्माया गया। वहां भी यह गीत बहुत लोकप्रिय भी हुआ। यह बात अलग है की वहां बोल कुछ आसान कर दिए गए। फिल्म मज़दूर में यह गीत बहुत ही अच्छे तरीके से पिक्चराइज़ किया गया। फ़िल्मी गीत के तौर पर भी यह बहुत हिट हुआ था। 
बहुत से स्टेजों पर इसका मंचन भी हुआ। भविष्य भी इसी तरह का लगने लगा लेकिन अचानक कोरोना का माहौल किसी खतरनाक और अदृश्य बम की तरह प्रकट हुआ। शाहीन बाग़ जैसे अंदोलन भी रोकने पड़े और  भी। हमारे दुश्मनों के लिए तो कोरोना किसी सुनहरी अवसर की तरह आया। मज़दूरों को मांगना पड़ गया। अन्नदाताओं को मांगना पड़ गया। कोरोना के इस माहौल ने मज़दूरों की बेबसी और बढ़ा दी। लॉक डाउन मार्च महीने के आखिर में शुरू हुआ था। मार्च महीने की 25 तारीख को लॉक डाउन का पहला दिन था। तब तक मज़दूरों को उनके वेतन नहीं मिले थे। दिहाड़ीदार लोगों के घरों में राशन भी ज़्यादा नहीं होता। दो चार दिन में ही भूखे मरने की नौबत आने लगी। सरकार की तरफ से बहुत से प्रचार हुए। बहुत से नंबर जारी किये गए। कुछ बारसूख़ लोगों ने राशन भी बंटवाया और अपनी अपनी फोटो भी खिंचवाई। इस सारी प्रक्रिया में राशन पहुंचा सिर्फ बारसूख़ लोगों के अपने अपने जानकार घरों में। ज़रूरतमंद  लोग फिर भूखे रह गए। 
उनका दर्द किसी ने समझा तो बस मज़दूर संगठनों ने। मज़दूर संगठनों ने अपने बलबूते भी अपने फंड एकत्र किया और समाजिक संगठनों से भी सम्पर्क किया तब कहीं जा कर बहुत से ज़रूरतमंद घरों में राशन पहुंचा। इस सारे प्रयास के बावजूद वह राशन एक दो सप्ताह तक ही चला। राशन घटता गया और ज़रूरतमंद लोगों की संख्या बढ़ती गई। मज़दूर संगठन भी इतना राशन लाते? उनको भी वेतन नहीं मिले थे। बहुत से लोग सिर्फ पेंशन पर हैं। इसके बावजूद दर्द का यह रिश्ता काम आया और लोग एक दुसरे के लिए कुछ न कुछ करते रहे। इस दर्द को दर्शाती बहुत सी सच्ची कहानियां सामने आयीं। इन सच्ची कहानियों के बावजूद हकीकत बेहद कठिन और कड़वी होती चली गई। दूध नगद लेना पड़ता। बुखार हो तो दवा-दारू भी नगद ही मिलता। सब्ज़ी भी नगद लेनी पड़ती। गैस सिलेंडर भी सभी तक तो नहीं पहुंचे। मज़दूरों के परिवार हिम्मत हारते चले गए। किसी के गाँव में उसके पिता ने दम तोड़ दिया, किसी की बेटी चल बसी, किसी के मां बीमार हो गई और किसी के भाई को बुखार ने जकड़ लिया। एटक के लोग उन्हें गांव जाने के लिए कर्फ्यू पास बनवाने में मदद करते रहे लेकिन सैंकड़ों किलोमीटर दूर जाना आसान कहां था? शहर से बाहर जाती टैक्सियों पर कीमतों का कोई नियंत्रण नहीं था। नवयुवा उम्र की 17 वर्षीय बेटी का देहांत हह गया तो अमेठी जाने के लिए टेक्सी वाले ने 18 हज़ार रूपये मांगे। यह पैसे उस मज़दूर ने गांव पहुंच कर अपने गहने बेच कर दिए। यहां न कोई धर्म कर्म करने वाला समाजिक संगठन काम आया और न ही कोई सरकार काम आई। न ही वोटें मांगने वाले किसी नेता ने उसका हाल पूछा और न ही तीर्थ यात्रायें करवाने वाले लोगों में से किसी ने उसके पास आ कर पूछा-भाई अपनी बेटी को आखिरी विदा देने कैसे जाओगे? मज़दूर की बेबसी उसकी बेटी की जान भी ले गयी। उसकी बेटी बुखार से तड़पती रही, पापा पापा पुकारती रही लेकिन उसका मज़दूर पापा उसके पास उसके जीते जी नहीं पहुंच सका। इस सारी कहानी को आप पढ़ सकते हैं हमारे सहयोगी डिजिटल प्रकाशन कामरेड स्क्रीन में बस यहां क्लिक कर के। काम आया तो मज़दूर संगठन एटक। एटक के लोगों ने सारा प्रबंध किया। फिर भी एक टीस तो हमेशां उसके उसके दिल में रहेगी ही। मज़दूर के दिल में छुपी यह आहें ही एक दिन तूफ़ान बन कर उठेंगी। कोरोना के कहर से भी मज़दूरों और किसानों की क्रान्ति नहीं रुकने वाली। यह हो कर ही रहेगी। इसका यकीन आज भी हर मज़दूर के दिल में है। 
आज वह कोरोना के हालात से परेशान है। उसका  तो अपने वेदों के मुताबिक हमें जीने के लिए दो वक़्त का राशन दे दो या हमें अपने गांव जाने के लिए किसी बस/ट्रक/गाड़ी का प्रबंध कर दो। हमें कोरोना के चैंबर में भूख से मरने के लिए मत छोडो। 
तकरीबन 485 मज़दूरों के लिए राशन और पैसों की मांग को लेकर कुछ मज़दूर प्रतिनिधि एटक के नेताओं से मिलने पहुंचे। उन्हें एक स्थानीय स्कूल में ठहरया गया जहाँ उन्होंने मीडिया को भी अपना दर्द बताया। जितने मज़दूर प्रतिनिधि यहां पहुंचे उनके पीछे उनके घरों/कमरों में दस-दस,बीस बीस लोग थे। सोशल डिस्टेंस का नियम भंग न हो इस लिए यह उन सभी को यहाँ नहीं लाये। क्या दावों के मुताबिक इन मज़दूरों का कुछ बनेगा? इन्हें राशन मिलेगा? इन्हें अपने घर वापिस जाने के लिए कोई वाहन मिलेगा?इनका कहना यही है या हमें राशन दो या हमें वापिस भेज दो। समस्या बेहद विकराल है। 
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आप जरा खुद आ कर देखिये ...!

शुक्रवार, अप्रैल 10, 2020

जो परिवार चटनी के साथ चावल मिलाकर खाता है

अब सोचिये वो सेनिटाइजर कहाँ से खरीदेगा !
लॉक डाउन आवश्यक था। लॉक डाउन आवश्यक है। इसी से लड़ा जा सकेगा कोरोना के साथ। इस लड़ाई में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। इसके साथ ही आवश्यक है उन सवालों की चर्चा जिनकी चिंता न किसी राजनीतिक दल ने की और न ही किसी समाजिक संगठन ने। इन सवालों को उठाया है डा. अनुराग आर्य ने। आप भी देखिये ज़रा एक नज़र:
सोशल मीडिया//फेसबुक: शुक्रवार:10 अप्रैल 2020: 10:45 AM:: (इर्द गिर्द डेस्क की प्रस्तुति)
जो परिवार चटनी के साथ चावल मिलाकर इसलिए खाता है क्योंकि इस समय मसालों के लिये उसके पास पैसे नही है। अब सोचिये वो सेनिटाइजर कहाँ से खरीदेगा।
सेनिटाइजर उसके लिए लक्ज़री है। एक बड़ी आबादी के पास पीने और इस्तेमाल करने के लिये साफ पानी नही है उनसे हम कैसे कहेगे के साबुन से हाथ 20 सेकंड तक धोते रहिये। दूर गांव कस्बो के दिहाड़ी मजदूरो के आंकड़े देखने की जरूरत नही है।
अपनी कालोनी के बाहर बैठे चौकीदार को देखिए ,फल सब्जी बेचते लोगो को देखिए इस पेंडेमिक ने इनके जीवन पर कितना असर डाला होगा । रिक्शा ,ऑटोरिक्शा ना जाने कितने लोग।
ऑस्ट्रेलिया से मेरा दोस्त जब पेंडेमिक में वहां की टेस्टिंग की गाइडलाइन की बात करता है ,मैं कालोनी की गली में टहलते टहलते मुंह पर मास्क बंधे चौकीदार को देखता हूँ उससे कहता हूं यहां दूसरी बड़ी चुनोतियाँ है जिसका भारत जैसे और कई देशों को सामना करना है।
असंगठित क्षेत्रो में दिहाड़ी मजदूर की संख्या आप इमेजिन नही कर सकते ,ऐसे समय मे जब निजी उद्योग वाला भी लगातार दूसरे महीने अपने उधोग और कर्मचारियों की तनख्वाह को लेकर थोड़ा चिंतित हुआ हैं। मजदूरो की क्या हालत होगी आप सोचिये।

हम कहते है ये बीमारी सिर्फ बुजुर्गो को ज्यादा नुकसान पहुंचाती है क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता कम है ।हमारे यहां के कुपोषित बच्चों और टी बी ग्रस्त आबादी के बारे में सोचिये ,एक कमरे में बसर करते 6 लोगो के बारे में के उन्हें कैसे बतायेगे सोशल डिस्टेंसिंग क्या है ?
तो क्या केवल पैसे वाले लोग सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट की लड़ाई देर तक लड़ेंगे गर पेंडेमिक उसी इंफेक्टिविटी से इस देश मे आया तो ।
लेखक:डा. अनुराग आर्य 
मैं आंकड़ो और ग्राफ से बहुत सी डिटेल आपके सामने बात को अधिक प्रभावी बनाने के लिए रख देता पर वो महत्वपूर्ण नही है ,महत्वपूर्ण था ये बात आपको बताना।
P.S -ब्रिटेन की 32 साल की एक डॉक्टर कहती है उसने रेड कलर के शूज़ अपने आप को" चीयर" करने के लिये पहने है क्योंकी उस पर हस्पताल ने ये जिम्मेदारी दी है के वो लोगो को बताये के कहाँ म्रत्यु का सामना करना पसंद करेंगे घर पर या अस्पताल में। वो बाथरूम में जाकर रो रो कर थक गई है।

मेरे पास मरीज़ों की, डॉक्टर की कई नई कहानियां है पर मैं उन्हें आज दोहराना नही चाहता इसलिए कुछ उम्मीदों की तस्वीरें लगा रहा हूँ। कुछ के नीचे उनकी डिटेल है। 
डा. अनुराग आर्य की फेसबुक Wall से साभार 
(लॉक डाउन की तस्वीर पत्रकार संतोष पाठक ने 10 अप्रैल 2020 को बाद दोपहर खींची)