सोमवार, फ़रवरी 13, 2012

त्रिपुरा कृषि योजना सफल हुई

कृषि करमन पुरस्‍कार के रूप में मिली त्रिपुरा के योगदान को मान्‍यता
विशेष लेख                                                                          शुभाषीष के चंदा*
सभी तस्वीरें त्रिपुरा के कृषि विभाग से साभार 
कुमुद बिहारी त्रिपुरा के पर्वतीय क्षेत्र में परांपरागत ढंग से झूम खेती करने वाले एक किसान हैं। वह इस साल बहुत खुश हैं क्‍योंकि फसलों की पैदावार दुगुनी हुई है। ऐसा ही एक और रिकार्ड मोहम्‍मद अब्‍दुल गफ्फार ने बनाया है जिन्‍होंने धान की खेती का एसआरआई तरीका अपनाया और अपने खेतों में पहले की 2.3 टन प्रति हेक्‍टेयर की जगह 3.3 टन उपज प्राप्‍त की। यह प्रेरणादायक उदाहरण है जबकि इस समय देश में खेती का परिदृश्‍य इसके उलट है। यह उदाहरण त्रिपुरा कृषि विभाग द्वारा शुरू की गई उस व्‍यापक योजना का नतीजा है जिसके लिए कृषि करमन पुरस्‍कार प्रदान किया गया है। यह खेती की समग्र ऊंची पैदावार के लिए दिया गया है। पुरस्‍कार प्रदान करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने देश में अनाज उत्‍पादन बढ़ाने में राज्‍य के योगदान को मान्‍यता दी।

     सुनने में भले ही यह चमत्‍कार जान पड़े लेकिन ऐसा क्‍यों हो पाया इसका जवाब राज्‍य की दस वर्ष की अवधि वाली उस कृषि योजना में छिपा है जिसे केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित दो कार्यक्रमों से मजबूती मिली है। इन परियोजनाओं के नाम हैं राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना और कृषि प्रशिक्षण एवं प्रबंधन एजेंसी।

राज्‍य में कृषि परिदृश्‍य

     त्रिपुरा में भू-भाग 6 पहाडि़यों का मिला जुला रूप है। इस राज्‍य में मैदानी जमीन कम है और पहाड़ी इलाका ज्‍यादा। एक अनुमान के अनुसार राज्‍य में जो विभिन्‍न प्रकार की जमीनें उपलब्‍ध हैं, उनमें से 4000 वर्ग किलोमीटर पर्वतीय क्षेत्र हैं। 2300 वर्ग किलोमीटर की जमीन टीला यानि पहाडि़यों से बनी है, जबकि घाटी का इलाका 2249 वर्ग किलोमीटर और मैदानी इलाका 2042 वर्ग किलोमीटर है। यहां के अधिकांश किसान गुजारा करने वाले हैं और उनमें से लगभग 96 प्रतिशत किसानों की जोतें 0.5 से 1.25 हेक्‍टेयर रकबे वाली हैं। इन किसानों के बीच फसलों और पैदावार पर निवेश बहुत कम किया जाता है। राज्‍य का बुआई वाला इलाका कुल भू-भाग अर्थात 10,49,169 हेक्‍टेयर का 24 प्रतिशत है जबकि राष्‍ट्रीय आंकडे 43 प्रतिशत हैं।

     राज्‍य में इस समय मुख्‍य रूप से दो प्रकार की फसल व्‍यवस्‍थाएं प्रचलित हैं। पहली है स्थिर खेती जो मैदानी भागों में की जाती है और दूसरा तरीका है चलायमान खेती जो पहाड़ी इलाकों में प्रचलित है। अधिकांश किसान इन्‍हीं दो में से एक तरीका अपनाते है। जहां तक आधुनिक टैक्‍नोलॉजी इस्‍तेमाल करने का सवाल है वे पुराना तरीका पसंद करते हैं जिसके परिणामस्‍वरूप फसलों की उपज बहुत कम होती है। जहां तक खेती के पुराने तरीके का संबंध है, किसानों को उपलब्‍ध जमीन कम होती जा रही है। इसके साथ ही, भारत बंगलादेश सीमा पर कंटीले तार लगाए जाने के कारण भी खेती वाली जमीन का रकबा 27 हजार एकड कम हो गया है। पहाड़ी जमीन कटने से मिट्टी का धीरे-धीरे क्षय होता है जो मैदानी इलाके में काफी ज्‍यादा है। यह सचमुच ही खतरे का कारण बन रहा है। एक सरकारी अनुमान के अनुसार हर साल बहुत ऊंची जमीन से लगभग तीस लाख टन ऊपरी मिट्टी कटकर बह जाती है।

पुराने तरीके का सशक्तीकरण 
     उक्‍त बातों को देखते हुए शुरू-शुरू में यहां की चुनौतियां मुश्किल जान पड़ती है। राज्‍य कृषि विभाग को अनाज उत्‍पादन के मामले में आत्‍मनिर्भर बनने की सोचना बड़ी चुनौती हो सकती है। राज्‍य कृषि विभाग ने एक बड़ा कृषि कार्यक्रम शुरू किया है जिसके अनुसार दस वर्षों में 1,16,867 हेक्‍टेयर जमीन के लिए सिंचाई सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी। 1999-2000 की स्थिति के अनुसार सिर्फ 51 हजार हेक्‍टेयर के लिए सिंचाई सुविधाएं मौजूद थीं। इसी तरह से फसल सघनता वर्तमान 169 प्रतिशत से बढ़ाकर 283 प्रतिशत करने के लिए कई तरह की कोशिशें शुरू की गई हैं। चलायमान खेती के सुधरे तरीके शुरू किए गए हैं ताकि धान की उत्‍पादकता वर्तमान 600 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर (1999-2000) से बढ़ाया जा सके। इसके अलावा अधिक उपज देने वाली किस्‍मों के धान की खेती शुरू करने से पैदावार कम से कम 3500 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर करने की कोशिशें शुरू की गई हैं। इसके लिए समन्वित कीट प्रबंधन, पौधों को पोषक तत्‍व देने वाले तत्‍वों की खपत बढ़ाना और अजैविक खाद के साथ बॉयो फर्टिलाइजर का इस्‍तेमाल शुरू करने को उच्‍च प्राथमिकता दी जा रही है।

भावी योजना और नया दृष्टिकोण

     हर तरह की मुश्किलों के बावजूद खेती ही आर्थिक रूप से यहां के लोगों के गुजारे के लिए एकमात्र विकल्‍प जान पड़ती है। यह राज्‍य दो प्रकार के भू-भागों से बना है। पहला है- घाटी का इलाका और दूसरा- पहाड़ी क्षेत्र जहां संचार सुविधाएं और उद्योग धंधे लगभग मौजूद नहीं हैं।

     राज्‍य कृषि विभाग ने मुश्किलों का सामना करने के लिए यहां विस्‍तार सेवाएं बढ़ाने, टैक्‍नोलॉजी मुहिम शुरू करने और किसानों को प्रशिक्षण स्‍कूलों तक पहुंचाने, धान की ज्‍यादा उपज देने वाली किस्‍मों की खेती शुरू करने, बॉयो-उर्वरकों का इस्‍तेमाल, जैविक खाद और कृषि आधारित उपकरणों का प्रयोग शुरू करने और किसान क्रेडिट कार्ड स्‍कीम के जरिये लोगों को ऋण सुविधाएं दिलाने की शुरूआत की है। ऐसे समय जब इस राज्‍य के लोगों की 27 हजार एकड़ जमीन सीमा पर कटीले तार लगाने के चलते परती पड़ी रही, राज्‍य सरकार ने वर्ष 2011 में दो लाख टन अधिक अनाज की उपज देखी जिसका कारण कृषि विभाग की चल रही कोशिशें बताया गया। वर्ष 2000 में दस वर्षों के लिए एक योजना तैयार की गई जिसके चलते अनाज उत्‍पादन में बहुत कामयाबी मिली और वर्ष 2010-11 में अनाज उत्‍पादन बढ़कर 7.12 लाख टन हो गया। 1999-2000 में सिर्फ 5.13 लाख टन अनाज की पैदावार हुई थी। लेकिन राज्‍य में वर्ष 2010-11 तक अनाज की लक्षित जरूरत 8.22 लाख टन आकलित की गई है जिसकी तुलना में कमी 1.10 लाख टन रहेगी। इस बीच सिंचाई सुविधाएं भी बढ़ाई गई हैं और अब 1,16,867 हेक्‍टेयर जमीन के लिए सिंचाई सुविधाएं जुटा दी गई हैं। फसल सघनता जहां 1999-2000 में 172 प्रतिशत थी वहीं दस वर्षों में यह बढ़कर 184 प्रतिशत हो गई है। रोचक बात यह है कि पहाड़ी किसानों को जहां झूम वाली जमीन से सिर्फ 600 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर की उपज मिली वहीं अब यह हर सीजन दुगुनी फसलें ले सकते हैं। इसके लिए उन्‍हें बॉयो-फर्टिलाइजर और जैविक खाद इस्‍तेमाल करनी पड़ती है।

आरकेवीवाई, एटीएमए एवं भागीदारी संप्रेषण 

राज्‍य ने 2007-08 में राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना शुरू की गई थी। इसके चलते इस क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बढ़ गया है। राज्‍य सरकार इस योजना को अनाज उत्‍पादन के क्षेत्र में आत्‍मनिर्भर बनने के उद्देश्‍य से एक वरदान मानती है। राज्‍य ने इस प्रोग्राम के पहले चरण के अंतर्गत 41 परियोजनाएं शुरू की है जिनका बुनियादी तौर पर उद्देश्‍य है अनाज का उत्‍पादन और उत्‍पादकता बढ़ाना। इस कार्यक्रम के अंतर्गत कई प्रमुख योजनाएं शुरू की गई हैं जिनमें एसआरआई तकनीक के जरिये धान की पैदावार बढ़ाना, मिट्टी की शत-प्रतिशत जांच, उन्‍नत किस्‍म के धान की खेती, संकर मक्के की खेती, रेह वाली मिट्टी को ठीकठाक करना, छोटी सिंचाई सुविधाएं, मशीनी खेती, प्रमाणित सब्जियों के बीज उपजाना, ट्रू आलू बीजों को प्रोत्‍साहन देना और आलू की खेती को बढ़ावा देना शामिल है। अभी तक इन सभी परियोजनाओं में राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना पर सबसे ज्‍यादा यानि 177 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है।

किसानों को अधिक उपज देने वाली किस्‍मों को अपनाने के लिए प्रेरित करने, रोगों के कारण फसलों में नुकसान बचाने, मिटृटी की उत्‍पादकता बढ़ाने और कृषि प्रशिक्षण एवं प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) के जरिए किसानों को परंपरागत और खेती की नई जानकारी देने को सभी जिलों में महत्‍व दिया गया है। इसके लिए विस्‍तार सेवा का एक व्‍यापक तरीका निकाला गया है और एटीएमए ने विशेषज्ञों की तरफ से खेती के लिए एक प्रभावी, दुतरफा संप्रेषण मॉडल विकसित किया है। इसके जरिए पशुपालन, मछलीपालन और वानिकी के बारे में जानकारी दी जाती है। दूसरी ओर किसानों के लिए प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम तथा खेतों में ग्रुप बैठकों जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी मॉडल के अनुरूप कृषि विभाग ने चालू वित्‍त वर्ष के दौरान एक और कार्यक्रम शुरू किया है जिसे टैक्‍नोलॉजी एक्‍सटेंशन केंपेन कहते हैं। इसमें एक ही छत के नीचे पौधे की रक्षा, जैविक और जैव उर्वरकों का इस्‍तेमाल, मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला और कार्यशाला रखे गए हैं। यह कार्यक्रम पिछले साल नवम्‍बर-दिसम्‍बर से पहले शुरू किया गया जिसके अंतर्गत किसानों को राज्‍य से बाहर ले जाकर ऐसी खेती दिखाई गई। इस प्रकार की हर यात्रा को केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने प्रायोजित किया। 
ऐसी ही एक यात्रा के दौरान एक प्रतिभागी श्री हरेन्‍द्र नाथ खुश नजर आए। उनका कहना था कि इस यात्रा से उन्‍हें बहुत फायदा हुआ है। उन्‍होंने उन कीड़ों को पहचान लिया है जिनसे खेती को फायदा होता है। यात्रा के दौरान उन्‍होंने नये औजार और गहाई मशीने भी देखीं। एक अन्‍य किसान श्री आनंद देबबर्मन ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम जारी रहने चाहिए। राज्‍य कृषि विभाग के अधिकारियों ने कहा कि किसानों के लिए ऐसी यात्रा का कार्यक्रम अगले वर्षों भी जारी रखा जायेगा ताकि वह आधुनिक टैक्‍नोलॉजी और जानकारी प्राप्‍त कर सकें। इससे खेती की उत्‍पादकता और किसानों की आमदनी बढ़ेगी, उनकी सोच बदलेगी और वे खेती को व्‍यापार समझकर संभालेंगे। {
पीआईबी}  10-फरवरी-2012 17:17 IST

लेखक-पीआईबी अगरतला में मीडिया एंड कम्‍युनिकेशन ऑफिसर हैं

बैंकों का बैंक रिज़र्व बैंक : झलक इतिहास की

भारतीय रिज़र्व बैंक:एक लम्‍बी और कठिन यात्रा
रिजर्व बैंक की गौरव गाथा पर एक विशेष लेख                                      समीर पुष्‍प*
भारतीय रिज़र्व बैंक एक ही दिन में देश भर के बैंकों का बैंक नहीं बना है। क्रमिक विकास, एकीकरण, नीतिगत बदलावों और सुधारों की एक लम्‍बी और कठिन यात्रा रही है, जिसने भारतीय रिज़र्व बैंक को एक अलग संस्‍थान के रूप में पहचान दी है। रिज़र्व बैंक की स्‍थापना के लिए सबसे पहले जनवरी, 1927 में एक विधेयक पेश किया गया और सात वर्ष बाद मार्च, 1934 में यह अधिनियम मूर्त रूप ले सका। विकासशील देशों के सबसे पुराने केन्‍द्रीय बैंकों में से रिज़र्व बैंक एक है। इसकी निर्माण यात्रा काफी घटनापूर्ण रही है। केन्‍द्रीय बैंक की कार्य प्रणाली अपनाने की इसकी कोशिश न तो काफी गहरी और न ही चौतरफा रही है। द्वितीय विश्‍व युद्ध छिड़ जाने की स्थिति में अपनी स्‍थापना के पहले ही दशक में रिज़र्व बैंक के कंधों पर विनिमय नियंत्रण सहित कई विशेष उत्तरदायित्व निभाने की जिम्‍मेदारी आ गई। एक निजी संस्‍थान से राष्‍ट्रीय कृत संस्‍थान के रूप में बदलाव और स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद  अर्थव्‍यवस्‍था में इसकी नई भूमिका दुर्जेय थी। रिज़र्व बैंक के साल-दर-साल विकास की राह पर चलते हुए कई कहानियां बनीं, जो समय के साथ इतिहास बनती चली गई।
   1935 में रिज़र्व बैंक की स्‍थापना से पहले केन्‍द्रीय बैंक के मुख्‍य कार्यकलाप प्राथमिक तौर पर भारत सरकार द्वारा संपन्‍न किये जाते थे और कुछ हद तक ये कार्य 1921 में अपनी स्‍थापना के बाद भारतीय इम्‍पीरियल बैंक द्वारा संपन्‍न होते थे। नोट जारी करने का नियमन, विदेशी विनिमय का प्रबंधन एवं राष्‍ट्र की अभिरक्षा और विदेशी विनिमय भंडार जैसे कार्यों की जिम्‍मेदारी भारत सरकार की हुआ करती थी। इम्‍पीरियल बैंक सरकार के बैंक के रूप में काम करता था और व्‍यावसायिक बैंक के रूप अपनी प्राथमिक गतिविधियों के अलावा यह एक सीमित हद तक बैंकों के बैंक के रूप में भी काम करता था। जब रिज़र्व बैंक की स्‍थापना हुई, तब भारत में एक हद तक संस्‍थागत बैंकिंग का विकास हुआ और विदेशी बैंकों को सामान्‍य तौर पर विनिमय बैंक के रूप में पहचान मिली।
    1941 में कराची में रिज़र्व बैंक का कार्यालय मुख्य तौर पर नकदी कार्यालय था, जहां लगभग 75 लोग काम करते थे। अविभाजित भारत में उस समय कानूनी निविदाओं के तहत मुद्राएं क्षेत्रवार छपती थीं, जो मुख्‍यत: 100 और 1000 रुपये के नोट के रूप में होती थीं। तब नोटों पर इन्‍हें जारी करने के क्षेत्रों के नाम जैसे – मुंबई, कानपुर, कलकत्‍ता, मद्रास, कराची, लाहौर छापे जाते थे। नोट छापने वाले हर क्षेत्र को नोट जारी करने और समय-समय पर इन्‍हें रद्द करने का सदस्‍यवार रिकॉर्ड रखना पड़ता था। यदि कराची क्षेत्र से जारी किये गए नोट कलकत्‍ता में पकड़े गए, तो उन्‍हें कराची लाया जाता था और जारी करने वाले खाते पर इनकी संख्‍या दर्ज कर रद्द कर दिया जाता था। खातों में जारी और रद्द किये गए हर नोट की संख्‍या दर्ज होता थी। यदि किसी नोट की संख्‍या रद्द नोट की संख्‍या से मिलती पाई गई, तो ऐसे मामलों में जांच कराई जाती थी।
    1946 में, जब 1000 रुपये के नोट का विमुद्रीकरण किया गया, तो कुछ लोगों ने प्रति 1000 रुपये के नोट के बदले में 500 से 600 रुपये के नोट लिये। ऐसा विनिमय रिज़र्व बैंक और आयकर विभाग के दफ्तर में कराया गया। बैंक और दूसरे कारपोरेट निकायों ने बड़ी राशि के नोट को छोटी राशि के नोट में बदलवाया। इस तरह बैंकों ने अपने ग्राहकों और परिचितों के नाम नोट विनिमय कर उनकी मदद की। उन दिनों एक रुपये के चांदी के सिक्‍कों की शुद्धता की  जांच रोकडिया सिक्‍के को लकड़ी के टेबल पर तेजी से फेंक कर करता था। वे नकली सिक्‍कों की पहचान इस तरह सिक्‍कों की आवाज सुन कर करते थे। इस तरह हम कह सकते हैं कि रिज़र्व बैंक उस जमाने में एक संगीतप्रेमी था।
  1940 के शुरूआती दशक में रिजर्व बैंक के वरिष्‍ठ अधिकारिक पदों पर मौजूदा कर्मियों को ही पदोन्‍नत कर जिम्‍मेदारी दी जाती थी या इंपीरियल बैंक के अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर लाया जाता था। अधिकारियों का अंतिम साक्षात्‍कार कलकत्‍ता में निदेशकों के केन्‍द्रीय मंडल में संपन्‍न होता था। देश के विभाजन के बाद कराची में कार्यरत अधिकारियों को 1947 में मुंबई कार्यालय में आने को कहा गया। इस पर कुछ टेलीफोन ऑपरेटर ही मुंबई कार्यालय में योगदान देने आए। उस समय रिज़र्व बैंक में कोई महिला कर्मचारी नहीं थी। 1940 के शुरूआती दशक में लिपिक के पद पर एक महिला की नियुक्ति हुई और एक अधिकारी के रूप में मार्च, 1949 में सुश्री धर्मा वेंकटरमन की बहाली हुई। बैंक में धीरे-धीरे महिला कर्मियों की संख्‍या बढ़ने लगी। एक आंकड़े के अनुसार जनवरी, 1968 में महिलाओं की संख्‍या कुल कर्मचारियों के आठ फीसदी से कम थी।
    इतिहास के पन्‍ने बताते हैं कि रिज़र्व बैंक में इम्‍पीरियल बैंक से आये अधिकारियेां को छोड़ बहुत कम यूरोपीय अधिकारी थे। ऐसा डिप्‍टी गर्वनर नानावटी की कोशिशों की वजह से संभव हो पाया। वे चाहते थे कि अधिकारी बनने का मौका अधिक-से-अधिक भारतीयों को मिले। कर्मचारियों के संदर्भ में नानावटी भारतीयकरण चाहते थे और वे भारत में बनी वस्‍तुओं को खरीदने में तरजीह देते थे। इस संबंध में यह जानना बड़ा रुचिकर है कि बैंक में एक बार भारत में बनी घडियों की खरीदारी का कर्मचारियों ने विरोध किया और काम करना बंद कर दिया। तब नानावटी की टिप्‍पणी थी कि इससे कोई मतलब नहीं है कि बैंक की सभी घडियां इस तरह गतिरोध पैदा कर दें।
    हालांकि यह जानना बड़ा दिलचस्‍प है कि सेक्रेटरी ऑफ स्‍टेट फॉर इंडिया रिज़र्व बैंक को एक संस्थागत रूप देने के लिए कई कारणों से कर्मचारियों को सुकून देने वाली समय सारणी का समर्थन करते थे। प्राथमिक प्रबंधन के लिए आवश्‍यक समय के अलावा बैंक की स्‍थापना के लिए सरकारी बजट में संशोधन और सामान्‍य निर्यात सरप्‍लस की वापसी जैसी कुछ पूर्व शर्तें लागू करने की जरूरत महसूस की गई। ये शर्तें अधिक समय लेने वाली थीं, जिसे पूरा होने में लगने वाला समय कष्‍टदायक था। सेक्रेटरी ऑफ स्‍टेट फॉर इंडिया का मानना था कि रिज़र्व बैंक की स्‍थापना में ज्‍यादा तत्‍परता तब तक उचित नहीं है, जब तक नये वित्‍त सदस्‍य वास्‍तविक स्थिति को व्‍यक्तिगत तौर पर समझे बिना इस मसले पर अपनी राय देने की स्थिति में न आ जायें। उन्‍होंने भारत सरकार के उस सुझाव को निरस्‍त कर दिया, जिसमें बिना मुद्रा नियमन के बैंक की शुरूआत करने की बात कही गई थी। अंत में इस मसले पर ऐसी सहमति बनी, कि बैंक की शुरूआत न तो भारत सरकार की इच्‍छा के अनुरूप बहुत जल्‍दी हुई और न ही देर से, जैसा कि सेक्रेटरी ऑफ स्‍टेट फॉर इंडिया ने अंदाजा लगाया था।
    15 अगस्‍त, 1947 को भारत और ब्रिटेन के बीच एक महत्‍वपूर्ण समझौता  ‘’ब्रिटिश डेट (DEBT) पैक्‍ट विद इंडिया’’ पर समझौता हुआ। ब्रिटेन और भारत की सरकार ने उस वक्‍त भारत के स्‍टर्लिंग संतुलन के संबंध में 1947 तक की अवधि के लिए अंतरिम समझौते पर हस्‍ताक्षर किये। दोनों देशों के अधिकारियों की बैठक में दोनों देशों के बीच आर्थिक और वित्‍तीय समस्याओं की समीक्षा की गई और भारत की संभावित आवश्यकताओं पर विचार किया गया। बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि खर्च के लिए भारत की मौजूदा बचत में 35 मिलियन पॉउंड उपलब्‍ध होना चाहिए, जिसकी व्‍यवस्‍था 31 दिसम्‍बर, 1947 तक होनी चाहिए। इसके अलावा 30 मिलियन पॉउंड की कार्यकारी बचत रिज़र्व बैंक के अधिकार क्षेत्र में होगी। दोनों सरकारों ने खासतौर से इस बात पर भी सहमति जताई कि ब्रिटिश मूल के उन लोगों की बचत राशि पर कोई सरकार किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाएगी, जो स्‍थायी तौर पर ब्रिटन वापस जाने वाले हैं। ब्रिटेन में रह रहे लोगों की निवेश राशि पर भी किसी तरह के प्रतिबंध से मना किया गया।
   रिज़र्व बैंक आज एक ऐसे संस्‍थान के रूप में काम कर रहा है, जो मौद्रिक स्‍थायित्‍व, मौद्रिक प्रबंधन, विदेशी विनिमय, आरक्षित निधि प्रबंधन, सरकारी कर्ज प्रबंधन, वित्‍तीय नियमन एवं निगरानी सुनिश्चित करने के उद्देश्‍य के साथ काम करता है। इसके मुख्‍य दायित्‍वों में मुद्रा प्रबंधन और भारत के हक में इसकी साख व्‍यवस्‍था का संचालन भी शामिल है। इसके अलावा अपनी स्‍थापना की शुरूआत से ही रिज़र्व बैंक ने विकास की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाई है, खासकर कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों में। रिज़र्व बैंक के इतिहास के पन्‍नों से ये कुछ ऐसी झलकियां थी, जिसे हम बैंकों के इस बैंक की लंबी और महत्‍वपूर्ण यात्रा से निकाल कर पेश कर पाए हैं। 
08-फरवरी-2012 20:56 IST

*इस फीचर के लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार है और इसमें उद्धृत विचार उनके अपने हैं, तथा इसमें पीआईबी का विचार निहित नहीं है।

रविवार, जनवरी 29, 2012

आज सरकार सबसे बड़ी जमीदार हो गयी है


यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है 
*विस्थापन और गैरबराबरी के खिलाफ अभियान हुआ और तेज़
*बिहार और झारखण्ड का लोकशक्ति अभियान का तीसरा चरण पूरा
*पहले पुराना हिसाब साफ़ करो! फिर नए की बात करो!
बोकारो, जनवरी २९ : उत्तर प्रदेश, हरियाणा, आँध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार होते हुए लोक शक्ति अभियान की टीम कल रांची पहुंची और उसके बाद आज सुबह मैथन पहुंची और शाम को बोकारो में दुन्गिबाग बाज़ार में हॉकर्स लोगों के बीच आम सभा की | रांची से १८ किलो. मीटर दूर काके रोड नगली में IIM रांची के लिए आदिवासी किसानो की ली जा रही ज़मीन के खिलाफ और देर शाम रांची में जगन्नाथपुर चौक पर HEC की ज़मीन पर अतिक्रमण के नाम पर तोड़े गए घरों के खिलाफ बड़ी आम सभा की गयी | किसी अध्यादेश के बिना किसानों की जमीन गैर तरीके से शासन की कब्जेदारी के खिलाफ़ एक बड़ी सभा आयोजित की गयी है.

मेधा पाटकर ने नांगली में होने वाले विस्थापितों और डी वी सी के ५५ साल से विस्थापित आदिवासियों से कहा कि, आदिवासीयों के लिए बिहार से विभाजित होकर नवगठित राज्य झारखण्ड में अगर आदिवासियों को एक आदिवासी मुख्यमंत्री इस तरह से उजाड़ने में लगा हो तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है | आई. आई. एम् के लिए जबरन २२७ एकड जमीन पर सेकडों अर्द्सेनिक बलों को तैनात कर जमीन के मालिक किसानों को बेदखल करना और प्रताड़ित करना धिक्कार योग्य है | गोबर बीनने पर प्रतिबन्ध शर्मनाक है | जिस तरह से आदिवासियों के हितार्थ पेशा कानून अनुपालन समिति के संगठनकर्ताओं को १०७ की नोटिस देकर न्यायलय में जबाब तलन करना और उसी दिन उनके धान कटे खेतों पर अर्द्सैनिक बलों को तैनात करना गैरबराबरी एवम आदिवासी द्रोही कदम है |

अर्जुन मुंडा जी आदिवासियों मुख्यमंत्री है तो आपसे आदिवासियों के उद्धार की अपेक्षा थी लेकिन बंदूक और अर्द्सैनिक बलों की ताकत पर आदिवासीयों को खेत से खदेड़ने बाले मुख्यमंत्री को हम सेनापति कहेंगे मुख्यमंत्री नहीं | आज सरकार सबसे बड़ी जमीदार हो गयी है | विश्वविद्यालय, फैक्ट्री, खदान, हर चीज़ के लिए जमीन ली जा रही है | ये सब अंग्रेजों ने भी नहीं किया था | उस समय के राज्यों ने नहीं किया | भूमिअधिग्रहण में उस समय जबरदस्ती नहीं थी | एक तरफ़ा दंगा हो रहा है | अर्जुन मुंडा आदिवासी नहीं रहे राज नेता हो गये है | आज झारखण्ड में करीब तीस लाख से ज्यादा विस्थापित लोग हैं तो अगर उनको सरकार नहीं बसा सकती तो लोगों को उजाड़ने का हक़ और चेहरा कैसे रखती है | किस मुँह से यहाँ के नेता और केंद्र की सरकार लोगों की ज़मीन पर बुलडोजर चलाती है | उन्हें पहले पुराना हिसाब चुकता करना होगा तब जाकर कोई और बात होगी | डी वी सी के विस्थापितों को पहले न्याय देना होगा तब जाकर आगे कोई और बात होगी |

पेसा कानून अनुपालन समिति में शामिल झारखण्ड की सामाजिक कार्यकर्त्ता दयामणि बरला ने कहा की नगड़ी में बंदूक की ताकत से जमीन अधिग्रहण की पूरी तैयारी गैर क़ानूनी है | नगड़ी में जमीन बचाने की लड़ाई पूरे झारखण्ड की लड़ाई हो गयी है और इसे पूरे देश की समर्थन चाहिये | एक किसान को कुछ पैसा देकर १० किसानों की ज़मीन पर कब्ज़ा कर रही है | बोकारो इलेक्ट्रो कम्पनी कर रही है यही जिंदल कंपनी कर रही है माफिया ठेकेदरों को देने के लिए जमीन है गरीबों को देने के लिए नहीं है | दयामनी ने कहा कि यह नगड़ी की ही नहीं, झारखण्ड की ही नहीं पूरे भारत की लड़ाई नहीं है | हम अपने पूर्वजों की एक इंच जमीन नहीं देंगे |

नगड़ी की शांतिदेवी ने कहा, इस जमीन से हमने दो बच्चे पैदा किया है, उनका पालन – पोषण किया और आज सरकार कहती है की १९५७ में इसका अधिग्रहण हो गया, हम गैरकानूनी हैं तो मैं पूछती हूँ की फिर किस मुहँ से सरकार ने अहुमको आज तक मालगुजारी वसूल किया | बताये हमको सरकार | नगड़ी की जमीन १९५७ से १९५८ में ९०० रूपये प्रति एकड के हिसाब से ली जानी थी २२ आदमीयों ने मुआवजा लिया था बाकी किसी ने नहीं लिया | आज सरकार उसी पैसे को १०% ब्याय की दर जोड़ कर मुआवजा देने की बात की जा रही है | यह सरासर गलत और गैरकानूनी है | अगर धारा ४, ६, ९, ११, कुछ भी नहीं लगी तो सरकार को कैसे यह हक़ बनता है कि वोह कोई भी काम शुरू करे इन ज़मीनों पर |

मैथन बाँध के विस्थापितों की लड़ाई, दिल्ली में अक्टूबर माह में ८ दिन के धरने के बाद, जिसमे मेधा पाटकर, स्वामी अग्निवेश, राजिंदर सच्चर, कुलदीप नय्यर और अन्य गणमान्य लोगों ने हस्तक्षेप किया था, ने एक बार फिर से जोर पकड़ा है. उर्जा मंत्री शुशील कुमार शिंदे से मुलाकात के बाद २८ दिसम्बर को डी वी सी के चेयरमन के साथ स्वामी अग्निवेश की मध्यस्थता में वार्ता हुई | मामले को एक धक्का तो मिला है लेकिन न्याय नहीं मिला है, घटवार आदिवासी महासभा के सलाहकार रामश्रय सिंह ने बी एस के कॉलेज के मैदान में आयोजित मीटिंग में कहा |

स्वामी अग्निवेश ने सभा को संबोधित करते हुए कहा की देश में आज भीषण समस्या है, विकास के नाम पर चरों ओर लूट मची है | इस पूरी विकास प्रक्रिया में आदिवासी, दलित, शोषित और वंचित समाज के लोगों के साथ और भी अन्याय हो रहा है | आज़ादी के बाद की विकास की प्रक्रिया में आदिवासियों ने सबसे बड़ा बलिदान दिया है | डी वी सी परियोजना उनमे से एक है | आज भी ९,००० परिवारों को वायदे के मुताबिक नौकरी और मुआवजा नहीं मिला है | लेकिन प्रबंधन यह दावा करता है की उन्होंने दे दिया | यह तो वक्त ही बताएगा जब आदिवासी महासभा के लोगों के दावे सरकारी आंकड़ों को झूठा करके दिखा देंगे | सरकार को चहिये की इनके साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है और न्याय करे | इन्हें हर सुख सुविधा मुहया कराये |
पिछले साल २०११ के अप्रैल महीने में रांची उच्च न्यालय के आदेश के मुताबिक पूरे झारखण्ड के शहरों में एक जबरदस्त विस्थापन का दौर चला जिसमे हजारों घर तोड़े गए | रांची में इस्लामनगर और अन्य कई बस्तियों में घर तोड़े गए | सदमे से करीब आठ लोगों के मौत हो गयी, क्योंकि उनके जीवन के कमाई धूल में मिला डी गयी थी | कारण : ये सभी बस्तियां सरकारी ज़मीन या पब्लिक सेक्टर कंपनी जैसे एच ई सी की ज़मीन पर काबिज थे |

सिद्धेश्वर सिंह, बस्ती बचाओ संघर्ष समिति, रांची के अध्यक्ष ने कहा जब एच ई सी ने लोगो को जगह जगह से लाकर मजदूरी के तौर पर काम दिया और इन ज़मीनों पर बसाया था तब सरकार कहाँ थी | आज वही लोग कैसे अतिक्रमणकारी हो गए | इन बस्तियों में रहने वाले ८० % लोग आदिवासी हैं, मजदूर हैं, झारखंडी हैं, उनका हक़ है इस धरती पर वे अपनी जान दे देंगे लेकिन अपनी जीविका और घर नहीं टूटने देंगे |

निजाम अंसारी, राष्ट्रीय हौकर्स फेडरेशन, बोकारो के समन्वयक ने कहा की उस दौरान रांची के साथ साथ बोकारो में बस्तियां तोड़ी गयी, लोगों की जीविका खतम की गयी | मेहनतकश मजदूर वर्ग पूरे शहर को सेवाएं देते हैं और अपने खून पसीने की कमाई से अपना परिवार चलते हैं, क्या इस नयी आर्थिक व्यवस्था में उनके लिए कोई जगह नहीं है | उनका इस आर्थिक व्यवस्था में स्थान तय करना होगा |

पूरे दो दिन के झारखण्ड दौरे के बाद लोकशक्ति अभियान ने यह एलान किया की विस्थापन और बढती गैरबराबरी के खिलाफ आगामी बजट सत्र के दौरान एक विशाल जन संसद का आयोजन १९ से २३ मार्च को किया जाएगा जिसमे देश के विभिन्न जन संगठन अपने अपने झंडे और बन्नेर के नीचे सरकार को एक कड़ी चुनौती देंगे | लोकशक्ति अभियान का यह तीसरा चरण आज समाप्त हुआ |
अभियान का चौथा चरण ६ मार्च को मुंबई में लोक मंच के कार्यक्रम के साथ होगा | ७ मार्च

को बेलगांव, ८ और ९ मार्च को गोवा, १० मार्च को पुणे, ११ मार्च को औरंगाबाद, १२ मार्च को नागपुर में कार्यक्रम होंगे | १३ मार्च को देश के विभिन्न जन संगठनों एक तैयारी बैठक नागपुर में आयोजित की जायेगी जिसमे बजट सत्र के दौरान होने वाले कार्यक्रम की वृहद योजना तैयार की जायेगी |
लोकशक्ति अभियान के लिए
राजेंद्र रवि, नागेश त्रिपाठी, अमिताव मित्र, मधुरेश कुमार

डेरा सिरसा में हाजिरी भरने का मामला फिर गर्माया

खालसा पंचायत ने की ऐसे नेतायों को अकाल तख्त पर तलब करने की मांग
लुधियाना// 28 जनवरी// गुलशन कुमार
शिरोमणी खालसा पंचायत के नेतृत्व में पंथक संगठनों ने श्री अकाल तख्त से मांग की है कि वोटें प्राप्त करने के लिये जिन जिन सिख नेताओं नें डेरा सिरसा के प्रमुख बाबा की हाजिरी भरी है उन्हें श्री अकाल तख्त साहिब पर तलब किया जाये। इस सबंधी कन्वीनर शिरोमणी खालसा पंचायत भुपिंदर सिंह निमाणा ने कहा कि डेरा सिरसा प्रमुख के खिलाफ 17 मई 2007 को पांच तख्तों के जथेदार साहिबान द्वारा समूची सिख कौम की भावनाओं की तर्जमानी करता बायकाट का हुक्मनामा जारी किया गया था जिसमें डेरा प्रमुख के साथ धार्मिक , सभ्यिाचारक ,भाईचारक ,राजनीतिक सांझ न रखने क ा हुक्म जारी किया गया था। परन्तु गत दिनों जिन राजनीतिक पार्टीयों के नेताओं द्वारा हुक्मनामे की उलंघना की गई है। जिस में प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल प्रमुख है उनको तुरन्त आकल तख्त साहिब पर किया जाये। उन्होंने गत दिनों जो डेरा सिरसा प्रमुख को प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल दोनों बाप-बेटे नें डेरे प्रमुख से लिखती रूप में पिछली गलतियों की माफी मांगी गई है और कहा कि पंजाब में अकाली सरकार के सता में आने पर डेरे के प्रोग्रामों को खुली छूट दी जायेगी। स: निमाणा ने कहा कि अगर यह झूठ है तो बादल श्री अकाल तख्त साहिब पर पेश होकर इसका खंडऩ करें अगर यह सही है तो जथेदार साहिब श्री अकाल तख्त साहिब के हुक्मनामे से भगौड़े हुऐ इन नेताओं को अकाल तख्त पर तलब करके सख्त सजा दिलाये । खालसा पंचायत समूचे सिख जगत को भी बादल की दोगली नीति और लूम्बड़ चालों से बचनें की अपील करता है। स: निमाणा ने कहा कि फखरे-ऐ-कौम का खिताब हासिल करने वाले बादल नें डेरे पर जाकर सिखों के दिलों को ठेस पहुंचाई है और बाबा द्वारा किये गये ऐलान के पश्चात जथेदार साहिबान को बादल से स्पष्टीकरन लेने चाहिये। 

शनिवार, जनवरी 28, 2012

कडवी हकीकतों के रूबरू कराते सादगी भरे शब्द

गाँधी के गुजरात से मेहल मकवाना की एक कविता  
जैसे मेरे पास भी एक योनि है…सोनी सोरी
जज साहब,
मेरे साल तेंतीस होने को आये लेकिन,
मैंने कभी कारतूस नहीं देखी है !
सिर्फ बचपन में फोड़े दीपावली के पटाखों की कसम,
आज तक कभी छुआ भी नहीं है बन्दुक को !
हा, घर में मटन-चिकन काटने इस्तेमाल होता,
थोडा सा बड़ा चाकू चलाने का महावरा है मुझे !
लेकिन मैंने कभी तलवार नहीं उठाई है हाथ में !
में तो कब्बडी भी मुश्किल से खेल पानेवाला बंदा हूँ,
मल्ल युद्द्द या फिर कलैरीपट्टू की तो बात कहा ?
प्राचीन या आधुनिक कोई मार्शल आर्ट नहीं आती है मुझे !
में तो शष्त्र और शाष्त्र दोनों के ज्ञान से विमुख हूं !
यह तक की लकड़ी काटने की कुल्हाड़ी भी पड़ोसी से मांगता हूँ !

लेकिन मेरे पास दो हाथ है जज साहब,
महनत से खुरदुरे बने ये दोनों हाथ मेरे अपने है !
पता नहीं क्यों लेकिन जब से मैंने यह सुना है,
मेरे दोनों हाथो में आ रही है बहुत खुजली !
खुजला खुजला के लाल कर दिए है मेने हाथ अपने !

और मेरे पास दो पैर है जज साहब !
बिना चप्पल के काँटों पे चल जाये और आंच भी न आये
एसे ये दोनों पैर, मेरे अपने है जज साहब !
और जब से मेंने सुना है
की दंतेवाडा कि आदिवासी शिक्षक सोनी सोरी की योनि में
पुलिसियों ने पत्थर भरे थे,
पता नहीं क्यों में बार बार उछाल रहा हु अपने पैर हवा में !
और खींच रहा हूं सर के बाल अपने !
जैसे मेरे पास भी एक योनि है और कुछ पैदा ही रहा हो उस से !

हा, मेरा एक सर भी है जज साहब,
हर १५ अगस्त और २६ जनवरी के दिन,
बड़े गर्व और प्यार दुलार से तिरंगे को झुकनेवाला
यह सर मेरा अपना है जज साहब !
गाँधी के गुजरात से हूं इसलिए
बचपन से ही शांति प्रिय सर है मेरा !
और सच कहू तो में चाहता भी हूं कि वो शांति प्रिय रहे !
लेकिन सिर्फ चाहने से क्या होता है ?

क्या छत्तीसगढ़ का हर आदिवासी,
पैदा होते हर बच्चे को नक्सली बनाना चाहता है ?
नहीं ना ? पर उसके चाहने से क्या होता है ?
में तो यह कहता हु की उसके ना चाहने से भी क्या होता है ?
जैसे की आज में नहीं चाहता हु फिर भी ...
मेरा सर पृथ्वी की गति से भी ज्यादा जोर से घूम रहा है !
सर हो रहा है सरफिरा जज साहब,
इससे पहले की सर मेरा फट जाये बारूद बनकर,
इससे पहले की मेरा खुद का सर निगल ले हाथ पैर मेरे ,
इससे पहले की सोनी की योनि से निकले पत्थर लोहा बन जाए,
और ठोक दे लोकतंत्र के पिछवाड़े में कोई ओर कील बड़ी,
आप इस चक्रव्यूह को तोड़ दो जज साहब !
रोक लो आप इसे !
इस बिखरते आदिवासी मोती को पिरो लो अपनी सभ्यता के धागे में !
वेसे मेरे साल तेंतीस होने को आये लेकिन,
मैंने कभी कारतूस नहीं देखी !
कभी नहीं छुआ है बन्दुक को ,
नहीं चलाई है तलवार कभी !
और ना ही खुद में पाया है
कोई जुनून सरफरोशी का कभी !
– मेहुल मकवाना, अहमदाबाद, गुजरात
94276 32132 and 84012 93496



गुरुवार, जनवरी 26, 2012

एक यादगारी भेंट

इस बार भारत के 63वें गणतन्त्र दिवस के शुभ अवसर पर थाईलैंड की प्रधानमंत्री कुमारी यिंगलुक्क  शिनावत्रा मुख्य मेहमान थी. उनके सम्मान में राष्ट्रपति भवन नै दिल्ली २६ जनवरी, 2012 को किये गए एक विशेष आयोजन में प्रधान मंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी श्रीमती गुरशरण कौर भी उपस्थित रहे. इस ख़ास मेहमान की उपस्थिति से यह दिन और भी यादगारी बन गया. इन पलों को हमेशां के लिए संजोये रखने के मकसद से पी आई बी के कैमरामैन ने इन की एक शानदार और जानदार तस्वीर भी खींच ली. 

सीएमसी अस्पताल लुधियाना में भी मनाया गया गणतन्त्र दिवस

बेटियों की हत्या के खिलाफ दिया गया एक ज़ोरदार संदेश
सी एम सी छात्र-छात्रायों ने किया दिल को झंक्झौर देने वाला मंचन
लुधियाना//26 जनवरी, 2012// शालू अरोड़ा और रेक्टर कथूरिया:
गणतन्त्र दिवस के शुभ अवसर पर जगह जगह पर रंगारंग कार्यक्रम हुए. कार्यक्रमों की इस भीड़ में एक अलग सा आयोजन था लुधियाना के सी एम् सी अस्पताल और कालेज प्रबन्धन की ओर से,  झंडे की रस्म थी, गीत संगीत था, और मिल; बैठने का एक ऐसा खूबसूरत बहाना जिसमें जग रहा था देश का प्रेम, देश के लोगों का फ़िक्र और दुनिया के विकास की रफ़्तार में भारत को सबसे आगे देखने का जनून.
इस यादगारी अवसर पर जानेमाने उद्योगपति जोगिन्दर कुमार भी विशेष तौर पर उपस्थित हुए. उन्होंने मीडिया  से एक संक्षिप्त भेंट के दौरान भारत की प्रगति, आर्थिक मजबूती और अनेकता में एकता का उल्लेख करते हुए कहा की आज गणतन्त्र दिवस के मौके पर इन सब बातों को याद करके एक बार फिर हमारा सर फखर से ऊंचा हो जाता है. उन्होंने याद दिलाया की आज भारत आर्थिकता केमामले में विश्व में तीसरे स्थान पर है.
कालेज के छात्र छात्रायों की ओर से बहुत सी रंगारंग आईटमें प्रस्तुत की गयीं. मंच से दिल में उतर जाने वाला मनमोहक गीत संगीत भी था, पंजाब की पहचान, पंजाबियों की जान भांगड़ा भी, अनेकता में एकता का संदेश देता राजस्थानी लोक नाच भी और आज के समाज में लगातार सर उठा रही बुराई भ्रूण हत्या का मर्मस्पर्शी मंचन भी.
ह्रदय को बार बार छू कर दिल और दिमाग को झंक्चौर देने वाली इस प्रस्तुती को तैयार किया था सी एम् सी के ही कालेज आफ फिजियोथरेपी के छात्र-छात्रायों ने. इस टीम में अगर एक आशिमा लुधियाना की थी तो दूसरी आशिमा मनाली से आई थी.कनिका सिंह चंडीगढ़ से थी तो पुबली दास कोलकाता से. बनीत शर्मा की कला से हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर की झलक मिल रही थी तो नवां शहर से रमण दीप की कला भी कम नहीं थी. बेगिवल दोराहा से दपिन्द्र ने भी इसी टीम अपनी आवाज़ बुलंद की थी की मर मरो बेटियों को. इन्होने ही हमें जन्म दिया है. इनकी हत्या करके हम कहाँ जायेंगे.  किसे मूंह दिखायेंगे. लुधियाना की सुखं प्रीत ने इस सम्बन्ध में बात करते हुए इस शानदार प्रस्तुती का सेहरा अपनी पूरी टीम को दिया. करीब ढाई घंटे तक चले इस आयोजन ने दर्शकों पर एक गहरी चाप छोड़ी और साबित किया कि इस बार इन टीमों ने पहले से कहीं अधिक मेहनत की है. इस दिन को और भी यादगारी बनाने के लिए हुए इस आयोजन में सीएमसी अस्पताल और कालेज पर्बंधन की और से डाक्टर ए जी थोमस और कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी, डाक्टर अ प्रोफेसर शामिल हुए.