History लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
History लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, नवंबर 25, 2020

जिसको आप लोग नक्सली हिंसा कहते हैं

 छतीसगढ़ के बस्तर संभाग की सच्ची कहानी 

जब आप बस्तर के महाराजा प्रवीणचंद्र भंजदेव की कहानी पढ़ेंगे तब आप को खुद लगेगा कि हे प्रभु यह कैसा अनर्थ कर दिया अपने! जब हम लोग छोटे थे तो अक्सर यह कहा करते थे एक था राजा और एक थी रानी दोनो मर गए ख़त्म हो गई कहानी ,,,,, लेकिन यह कहानी ख़त्म नही होनी चाहिए लोगोको जानना चाहिए इस राजा की कहानी जिसका बदला आज भी इनके वफ़ादार जनता ले रही हैं! जिसको आप लोग नक्सली हिंसा कहते हैं छतीसगढ़ के बस्तर संभाग की सच्ची कहानी ।

महाराजा प्रवीण ने अपने पूरे आदिवासी एरिया में कभी किसी मिशनरी को आने नहीं दिया था यह  आदिवासियों के सबसे बड़े हितेषी थे

 जब महाराजा प्रवीण चंद्र भंजदेव का विवाह हुआ था तब पूरे भारत से करीब चार लाख से ज्यादा आदिवासी उनके विवाह में शामिल हुए थे

महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी तथा प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव की दूसरी संतान “प्रवीरचंद्र भंजदेव” जो बस्तर रियासत काल के आखरी शासक हुए, इनका जन्म 25 जून 1929 को हुआ।

इनकी माता महारानी प्रफुल्ल कुमारी जो कि बस्तर की महिला शासिका थी, उनकी असमय और रहस्यमय निधन के पश्चात लंदन में ही ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा 6 वर्षीय प्रवीरचंद्र भंजदेव का औपचारिक राजतिलक कर दिया गया। बारह साल बाद जब प्रवीर 18 साल के हो गए तब उन्हें पूर्ण रूप से राज्याधिकार दे दिए गये। इसी साल सरदार वल्लभ भाई पटेल ने छत्तीसगढ़ के सभी चौदह रियासतों से बातचीत कर भारतीय संघ में विलयन के लिए दस्तखत करवा लिए। 15 अगस्त को भारत स्वतन्त्र हुआ और 1 जनवरी 1948 को बस्तर रियासत आधिकारिक रूप से भारतीय संघ के अंतर्गत मध्य प्रान्त का हिस्सा हो गया। राजशाही सत्ता के समर्पण के बाद जेहन में जो दर्द था वो दोगुना हो गया जब 13 जून 1953 को उनकी सम्पत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अंतर्गत ले ली गयी।

वाटसप के प्रतीक ग्रुप से साभार 
हालांकि अब भारत एक संघीय राष्ट्र हो गया था पर तब भी बस्तर की आदिवासी जनता प्रवीर चंद्र को ही अपना राजा व प्रतिनिधि मानती थी। आदिवासियों को कोई भी परेशानी होने पर प्रवीर को ही सबसे पहले याद किया जाता था।

जनता का आशीर्वाद मिलता रहा और कांग्रेस के जिला अध्यक्ष बनने के साथ-साथ प्रवीर चंद्र 1957 के आम चुनाव में भारी मतों से जीतकर विधानसभा पहुँचे। अभी प्रवीर चंद्र को विधानसभा सदस्य के तौर पर दो साल ही हुए थे कि उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया।

इस्तीफा देते ही मानो कांग्रेस सरकार प्रवीरचंद्र की जानी दुश्मन हो गई

11 और 12 फरवरी 1961 को पहले उन्हें राज्य विरोधी होने के नाम पर गिरफ्तार किया गया फिर प्रवीर की बस्तर के भूतपूर्व शासक होने की मान्यता भी समाप्त कर दी गयी इसके साथ ही प्रवीर के ही छोटे भाई विजयचन्द्र भंजदेव को भूतपूर्व शासक होने के अधिकार दे दिये गये।

प्रवीर के आंदोलनों के ऊपर हिंसक होने के साथ साथ लोकतंत्र के प्रति असहिष्णु होने के भी आरोप लगते रहे। इन सब अव्यवस्था और अशांति के बावजूद जनता प्रवीर के ही साथ थी। भूतपूर्व शासक होने की मान्यता समाप्त करने के विरोध में जब आदिवासियों द्वारा लौहंडीगुड़ा और सिरिसगुड़ा में प्रदर्शन किया तब शासन ने बड़े ही निर्मम तरीके से बीस हज़ार के भीड़ पर गोली बरसाई थी। लौहण्डीगुड़ा का यह गोली कांड अब भी अपने साथ दर्द से भरे अनगिनत कहानी समेटे हुए है।

जब संवैधानिक तरीके से प्रवीरचंद्र ने दिया जवाब 

फरवरी 1962 को जब विधानसभा चुनावों का परिणाम आया तब कांकेर तथा बीजापुर को छोड कर पूरे बस्तर में महाराजा प्रवीर चंद्र को समर्थित पार्टी के प्रत्याशी विजयी रहे। 30 जुलाई 1963 को प्रवीर की सम्पत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स से मुक्त कर दी गयी। सन् 1963 से लेकर 1966 तक प्रवीर चंद्र ने बस्तर की जनता के लिए खूब आवाज़ उठाए, कई आंदोलन कई अनशन किया गया। अब जनता आश्वस्त थी कि उनको सुनने वाला कोई है।

जब राजमहल पर गोलिया चलाई गई

25 मार्च 1966 की सुबह जब सैकड़ो लोग अलग अलग गांव से जैसे कोंटा, उसूर, सुकमा, छिंदगढ, कटे कल्याण, बीजापुर, भोपालपटनम, कुँआकोंडा, भैरमगढ, गीदम, दंतेवाडा, बास्तानार, दरभा, बकावण्ड, तोकापाल लौहण्डीगुडा, बस्तर, जगदलपुर, कोण्डागाँव, माकडी, फरसगाँव, नारायनपुर से महाराजा के महल पहुँचे थे। इतनी बड़ी संख्या का एक कारण सालों की रही एक परंपरा भी थी। अनेकों गाँवों के माझी ‘आखेट की स्वीकृति’ अपने राजा से लेने आये थे और चैत्र के नवरात्र में आदिवासी कुछ बीज राजा को देते है फिर वही बीज वो खेत मे बुआई के दौरान उपयोग करते है। चैत्र और वैशाख के दिनों में में एक मान्यता ऐसी भी है जिसमे आदिवासी शिकार से पहले राजा से आज्ञा लेने आते हैं इसीलिए उस दिन वहां मौजूद शिकारियों ने अपने साथ धनुष – बाण भी रखा था। जिनमे से ज्यादातर धनुष – बाण तो चिड़िया मारने के लिए काम आने वाले थे।

भीड़ को देखते ही आनन फानन में पुलिस द्वारा राजमहल परिसर को घेर लिया गया और आत्मसमर्पण के लिए कहा गया। लोग कुछ समझ पाते उससे पहले आँसू गैस छोड़ी गई और थोड़ी देर में पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। तभी भगदड़ शुरू हो गयी और सभी लोग महल के अंदर चले गए। पुलिस ने फायरिंग नहीं रोकी तब आदिवासियों ने भी आत्म रक्षा के लिए धनुष-बाण थाम लिए। दोपहर होते होते सब शांत होने लगा था फिर भी इक्का दुक्का फायरिंग अभी भी जारी थी। बीच बीच मे धमाकों की भी आवाज़ सुनाई दे रही थी। लाउडस्पीकर में लगातार आत्मसमर्पण के लिए कहा जा रहा था। कहा गया कि निहत्थे लोगों पर गोली नहीं चलाई जाएगी। महाराजा प्रवीर के कहने पर करीब डेढ़ सौ महिलाएं बच्चों के साथ आत्मसर्पण के लिए महल से बाहर जाने के लिए तैयार हुए। उनके महल से बाहर आते ही उनको घेर लिया गया और उनपर लाठियां बरसाई जाने लगी। अब महल के अंदर जितने लोग थे उनका आत्मसर्पण से विश्वास उठ गया था। 

अभी भी माहौल शान्त नहीं हुआ था तभी एक गाड़ी महल की तरफ आती दिखी और एक बार फिर से प्रवीर और महल के अंदर आश्रितों को आत्मसर्पण के लिए कहा गया। प्रवीर महल के अंदर से निकल कर अब बरामदे में आ गए थे। तभी अचानक से फायरिंग शुरू हो गयी और एक गोली सीधे आकर प्रवीर को लगी। गोली प्रवीर चंद्र के जांघ में आ धसी थी। अब पुलिस महल के अंदर घुस चुकी थी और अब फायरिंग महल के अंदर भी सुनाई देने लगी थी।

आदिवासियों ने बड़े संघर्ष के साथ पुलिस को अपने महाराजा के शयनकक्ष में जाने से रोक रखा था लेकिन धनुष – बाण बंन्दूक के सामने कब तक टिकती। पुलिस अब प्रवीर चंद्र के कक्ष के अंदर दाखिल हो गयी। बस्तर के महाराजा प्रवीर चंद्र मार डाले गए। अब महल के अंदर मौजूद आदिवासी उग्र हो चुके थे और महल रणभूमि में बदल चुकी थी।

रात से सुबह हो चुकी थी पर संघर्ष रुकने का नाम नहीं ले रही थी। गोलियों की आवाज़ सुबह चार बजे तक सुनाई दे रही थी।

26 मार्च को करीब ग्यारह बजे जिलाधीश और पुलिस के बड़े अधिकारी महल महल के अंदर गए। पार्थिव शरीर को कक्ष से निकाला गया और उसी शाम प्रवीर चंद्र का अंतिम संस्कार किया गया। 

आज तक आप लोग एक तरफा कहानी सुनते थे जो अखबार में निकला या सरकार ने बताया परन्तु आज हमने उस सिक्के के दूसरे पहलू को दर्शाने का प्रयास किया है । इस दावे के साथ कि जो लिखा है सत्य लिखा है कैसे एक राजा को मारा गया और उसकी जनता को नक्सली बनाया गया । कौन असली दोसी हैं निर्णय आप खुद ले। वन्देमातरम 

आपका अपना आदिवासियों का संघर्ष 

मनोज श्रीवास्तव

राष्ट्रीय अध्यक्ष

भारतीय केसरिया वाहिनी

+91 9389577220

मंगलवार, अप्रैल 23, 2019

डॉ. हेडगेवार- भारत के परिवर्तन के वास्तुकार//*तरुण विजय


Posted On: 01 APR 2017 1:23PM
    एक महान व्‍यक्ति की अविश्‍वसनीय गाथा                  यदि हमें किसी ऐसे व्‍यक्तित्‍व का चयन करना हो, जिनके जीवन और संगठनात्‍मक क्षमता ने किसी औसत भारतीय के जीवन को सर्वाधिक प्रभावित किया हो, वह व्‍यक्तित्‍व निर्विवाद रूप से डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार होंगे।

साभार चित्र 

नागपुर में 1889 में हिंदू नव वर्ष (1 अप्रैल)  को जन्‍में, डॉ हेडगेवार आगे चलकर राष्‍ट्र की हिंदू सभ्‍यता से संबंधित विरासत के प्रति सुस्‍पष्‍ट गौरवयुक्‍त आधुनिक सर्वशक्तिमान भारत के वास्‍तुकार बनें।
यह एक ऐसे महान व्‍यक्ति की अविश्‍वसनीय गाथा है, जो समर्पित युवाओं की एक ऐसी नई व्‍यवस्‍था के साथ समाज में परिवर्तन लाने में सफल रहा, जिसका प्रसार आज - तवांग से लेकर लेह तक और ओकहा से लेकर अंडमान तक भारत के कोने-कोने में देखा जा रहा है।
लेखक-तरुण विजय 
उन्‍होंने 1925 में विजय दशमी के अवसर पर राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्‍थापना की थी, लेकिन इसे यह नाम एक वर्ष बाद दिया गया। इस संगठन के बारे में पहली घोषणा एक साधारण वाक्‍य - ‘’मैं आज संघ (संगठन) की स्‍थापना की घोषणा करता हूं‘’  के साथ की गई। इस संगठन को आरएसएस का नाम साल भर के गहन वि‍चार-विमर्श और अनेक सुझावों के बाद दिया गया, जिनमें - भारत उद्धारक मंडल (जिसका अस्‍पष्‍ट अनुवाद- भारत को पुनर्जीवित करने वाला समाज) और राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ शामिल थे। इसका प्रमुख उद्देश्‍य आंतरिक झगड़ों का शिकार न बनने वाले समाज की रचना करना और एकजुटता कायम करना था, ताकि भविष्‍य में कोई भी हमें अपना गुलाम न बना सके। इससे पहले वे कांग्रेस के सक्रिय सदस्‍य और कांग्रेस के प्रसिद्ध नागपुर अधिवेशन के आयोजन के सह-प्रभारी रह चुके थे। उन्‍होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया था और  आजादी के लिए जोशीले भाषण देने के कारण उन्‍हें एक साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी। वह अनुशीलन समिति के क्रांतिकारियों और उसके नेता पुलिन बिहारी बोस के साथ संबंधों के कारण भी ब्रिटेन के निशाने पर  थे।
लेकिन उन्‍हें अधिक प्रसिद्धि नहीं मिली और उनके जीवन के बारे में उन लोगों से भी कम जाना गया, जिनको उन्‍होंने सांचे में ढाला था और जो आगे चलकर अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जानी-मानी हस्तियां बनें। आज भारत में अगर किसी संगठन द्वारा सेवाओं और परियोजनाओं का विशालतम नेटवर्क संचालित किया जा रहा है, तो वह संभवत: आरएसएस – डॉ. हेडगेवार से प्ररेणा प्राप्‍त लोगों द्वारा संचालित जा रहा नेटवर्क ही है। इन परियोजनाओं की संख्‍या एक लाख 70 हजार है, जिनमें अस्‍पताल, ब्‍लड बैंक, आइ बैंक, दिव्‍यांगों, दृष्टि बाधितों और थेलेसीमिया से पीडि़त बच्‍चों  की सहायता के लिए विशेष केंद्र शामिल हैं। चाहे युद्ध काल हो या प्राकृतिक आपदा की घड़ी- हेडगेवार के समर्थक मौके पर सबसे पहले पहुंचते हैं और राहत पहुंचाते हैं। चाहे चरखी दादरी विमान दुर्घटना हो, त्‍सुनामी, भुज, उत्‍तरकाशी भूकम्‍प या केदारनाथ त्रासदी हो- आरएसएस के स्‍वयंसेवक पीडि़तों की मदद के लिए और बाद में पुनर्वास के कार्यों में भी सबसे आगे रहते हैं।
यह सत्‍य है कि भाजपा अपने नैतिक बल के लिए आरएसएस की ऋणी है और उसके बहुत से नेता स्‍वयंसेवक हैं, तो भी भारतीय समाज पर डॉ. हेडगेवार के प्रभाव का आकलन केवल भाजपा के राजनीतिक प्रसार से करना, उसे बहुत कम करके आंकना होगा। भारत-म्‍यांमार सीमा के अंतिम छोर पर बसे गांव – मोरेह को ही लीजिए- वहां स्‍कूल कौन चला रहा है और स्‍थानीय ग्रामीणों को दवाइयां कौन उपलब्‍ध करवा रहा है ? ये वे लोग हैं, जो डॉ. हेडगेवार के विज़न से प्रेरित हैं। इसी तरह पूर्वोत्‍तर में स्‍थानीय लोगों की सेवा के लिए मोकुकचेंग और चांगलांग परियोजनाएं और अंडमान के जनजातीय विद्यार्थियों के लिए पोर्टब्‍लेयर आश्रम भी इन्‍हीं केवल लोगों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। आरएसएस के पास आज स्‍कूलों और शिक्षकों तथा शैक्षणिक संस्‍थाओं का विशालतम नेटवर्क है। विद्या भारती आज 25000 से ज्‍यादा स्‍कूल चलाती है, उनमें पूर्वोत्‍तर के सुदूर गांव से लेकर लद्दाख का बर्फीले क्षेत्रों तक,  राजस्‍थान, जम्‍मू और पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों में 2,50,000 छात्र पढ़ते हैं और एक लाख अध्‍यापक शिक्षा प्रदान करते हैं।
    मैं पिछले सप्‍ताह एक वृत्‍तचित्र बनाने के लिए हेडगेवार के पैतृक गांव तेलंगाना के कंडाकुर्ती गया था। यह गोदावरी, हरिद्र और मंजरी के संगम पर बसा एक ऐतिहासिक गांव है। हेडगेवार परिवार का पैतृक घर लगभग 50 फुट बाइ 28 फुट का है, जिसे आरएसएस के वरिष्‍ठ नेता मोरोपंत पिंगले की सहायता और प्रेरणा से स्‍थानीय ग्रामीणों द्वारा स्‍मारक का रूप दिया जा चुका है। यहां एक उत्‍कृष्‍ट सह-शिक्षा विद्यालय केशव बाल विद्या मंदिर का संचालन किया जा रहा है, जिसमें लगभग 200 बच्‍चे पढ़ते हैं। मैं यह देखकर हैरान रह गया कि उस स्‍कूल के विद्यार्थियों की काफी बड़ी संख्‍या, लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम लड़कियों और लड़कों की थी। ऐसा नहीं कि उस गांव में और स्‍कूल नहीं हैं। इस शांत, प्रशांत गांव में लगभग 65 प्रतिशत आबादी मुस्लिमों और 35 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है। वहां जितने प्राचीन मंदिर हैं, उतनी ही मस्जिदे भी हैं। दोनों साथ- साथ स्थित हैं और वहां एक भी अप्रिय घटना नहीं हुई है। मुस्लिम अपने बच्‍चों को ऐसे स्‍कूल में पढ़ने क्‍यों भेजते हैं, जिसकी स्‍थापना आरएसएस के संस्‍थापक की याद में की गई है?
    मेरी मुलाकात एक अभिभावक – श्री जलील बेग से हुई, जिनके वंश का संबंध मुगलों से है। वे पत्रकार हैं और उर्दू दैनिक मुन्सिफ के लिए लिखते हैं। उन्‍होंने कहा कि उनका परिवार इस स्‍कूल को पढ़ाई के लिए अच्‍छा मानता है, क्‍योंकि यह स्‍कूल गरीबों और आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर वर्गों को उत्‍कृ‍ष्‍ट सुविधाएं उपलब्‍ध कराता है। सबसे बढ़कर इस स्‍कूल का स्‍तर अच्‍छा है और उसमें डिजिटल क्‍लास भी है, जहां बच्‍चों को कंप्‍यूटर शिक्षा प्रदान की जाती है। मैंने स्‍कूल की नन्‍हीं सी छात्रा राफिया को लयबद्धढंग से ‘’हिंद देश के निवासी सभी हम एक हैं, रंग रूप वेश भाषा चाहे अनेक हैं’’ गाते सुना।
    कई प्रमुख नेताओं पर बहुत अधिक प्रभावित करने वाले डॉ हेडगेवार ने ‘सबका साथ सबका विकास’ थीम को पूर्ण गौरव के साथ प्रस्‍तुत करते अपने पैतृक गांव के माध्‍यम से एक सर्वोत्‍तम उपहार दिया है।
    जिस व्‍यक्ति ने लाखों लोगों को अखिल भारतीय विज़न प्रदान किया, प्रतिभाशाली भारतीय युवाओं को प्रचारक – भिक्षुओं के रूप में एक ऐसी नई विचारधारा का अंग बनने के लिए प्रेरित किया, जो भले ही गेरूआ वस्‍त्र धारण न करें, लेकिन तप‍स्‍वी जैसा जीवन व्‍यतीत करते हुए लोगों की शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य सेवा, शांति के साथ, बिना किसी प्रचार के, मीडिया की चकाचौंध से दूर रहते हुए सभ्‍यता के उत्‍थान में अपना उत्‍कृष्‍ट योगदान दें।  यह एक ऐसे भारत की गाथा है, जो अभूतपूर्व रूप से बदल रहा है।
    डॉ हेडगेवार ने लाखों लोगों को राष्‍ट्र के व्‍यापक कल्‍याण के लिए कार्य करने के लिए प्रेरित किया, भारत के सार्वभौमिक मूल्‍यों और धार्मिक परम्‍पराओं के लिए गर्व और साहस की भावना से ओत-प्रोत किया, जिसके बारे में  देश को अधिक जानकारी प्राप्‍त करने और उसका आकलन किए जाने की आवश्‍यकता है। वे भारत में परिवर्तन के अब तक के सबसे बड़े प्रवर्तक हैं। (PIB)
****
*लेखक राज्‍य सभा के पूर्व सदस्‍य, वरिष्‍ठ पत्रकार और समालोचक हैं
लेख में व्‍यक्‍त विचार निजी हैं।
वि लक्ष्‍मी/ रीता/ एनआर-46
पूरी सूची-01-04-2017

शुक्रवार, फ़रवरी 24, 2012

सूफीवाद और भारतीय रहस्‍यवाद

उपराष्‍ट्रपति ने किया एक विशेष पुस्‍तक का विमोचन
उपराष्‍ट्रपति श्री एम.हामिद अंसारी ने आज यहां एक समारोह में प्रोफेसर अख्‍तरूल वासी और श्री फरहत एहसास (फरहतुल्‍ला खान) द्वारा संपादित पुस्‍तक ''सूफीज्‍म एंड इंडियन मिस्‍टीसिजम'' का विमोचन किया। इस अवसर पर उन्‍होंने कहा कि इस्‍लामी परंपरा में सूफीवाद सदियों से आत्मिक शांति, आध्‍यात्मिक पुनरुत्‍थान और ज्ञानोदय का स्रोत रहा है। यह अपनी उत्‍पत्ति, प्रकृति और बाहरी स्‍वरूप के संबंध में उठे सवालों को लेकर विद्वानों में बहस का विषय रहा है। उपराष्‍ट्रपति ने इस्‍लामी सूफीवाद और भारतीय रहस्‍यवाद के विभिन्‍न पहलुओं पर विद्वानों और जाने-माने विशेषज्ञों के विचार रखने के लिए पुस्‍तक के संपादकों की सराहना की। 

पुस्‍तक के इस खण्‍ड में 29 विस्‍तृत शोध पत्र हैं, जिनमें इस्‍लामी सूफीवाद और भारतीय रहस्‍यवाद के विभिन्‍न पहलुओं के बारे में गहरी जानकारी दी गई है। इस खण्‍ड में दर्शन, इस्‍लामी अध्‍ययन, मनोविज्ञान, समाज शास्‍त्र, इतिहास और पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों और विद्वानों ने योगदान दिया है।
 23-फरवरी-2012 19:44 IST

सोमवार, फ़रवरी 13, 2012

बैंकों का बैंक रिज़र्व बैंक : झलक इतिहास की

भारतीय रिज़र्व बैंक:एक लम्‍बी और कठिन यात्रा
रिजर्व बैंक की गौरव गाथा पर एक विशेष लेख                                      समीर पुष्‍प*
भारतीय रिज़र्व बैंक एक ही दिन में देश भर के बैंकों का बैंक नहीं बना है। क्रमिक विकास, एकीकरण, नीतिगत बदलावों और सुधारों की एक लम्‍बी और कठिन यात्रा रही है, जिसने भारतीय रिज़र्व बैंक को एक अलग संस्‍थान के रूप में पहचान दी है। रिज़र्व बैंक की स्‍थापना के लिए सबसे पहले जनवरी, 1927 में एक विधेयक पेश किया गया और सात वर्ष बाद मार्च, 1934 में यह अधिनियम मूर्त रूप ले सका। विकासशील देशों के सबसे पुराने केन्‍द्रीय बैंकों में से रिज़र्व बैंक एक है। इसकी निर्माण यात्रा काफी घटनापूर्ण रही है। केन्‍द्रीय बैंक की कार्य प्रणाली अपनाने की इसकी कोशिश न तो काफी गहरी और न ही चौतरफा रही है। द्वितीय विश्‍व युद्ध छिड़ जाने की स्थिति में अपनी स्‍थापना के पहले ही दशक में रिज़र्व बैंक के कंधों पर विनिमय नियंत्रण सहित कई विशेष उत्तरदायित्व निभाने की जिम्‍मेदारी आ गई। एक निजी संस्‍थान से राष्‍ट्रीय कृत संस्‍थान के रूप में बदलाव और स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद  अर्थव्‍यवस्‍था में इसकी नई भूमिका दुर्जेय थी। रिज़र्व बैंक के साल-दर-साल विकास की राह पर चलते हुए कई कहानियां बनीं, जो समय के साथ इतिहास बनती चली गई।
   1935 में रिज़र्व बैंक की स्‍थापना से पहले केन्‍द्रीय बैंक के मुख्‍य कार्यकलाप प्राथमिक तौर पर भारत सरकार द्वारा संपन्‍न किये जाते थे और कुछ हद तक ये कार्य 1921 में अपनी स्‍थापना के बाद भारतीय इम्‍पीरियल बैंक द्वारा संपन्‍न होते थे। नोट जारी करने का नियमन, विदेशी विनिमय का प्रबंधन एवं राष्‍ट्र की अभिरक्षा और विदेशी विनिमय भंडार जैसे कार्यों की जिम्‍मेदारी भारत सरकार की हुआ करती थी। इम्‍पीरियल बैंक सरकार के बैंक के रूप में काम करता था और व्‍यावसायिक बैंक के रूप अपनी प्राथमिक गतिविधियों के अलावा यह एक सीमित हद तक बैंकों के बैंक के रूप में भी काम करता था। जब रिज़र्व बैंक की स्‍थापना हुई, तब भारत में एक हद तक संस्‍थागत बैंकिंग का विकास हुआ और विदेशी बैंकों को सामान्‍य तौर पर विनिमय बैंक के रूप में पहचान मिली।
    1941 में कराची में रिज़र्व बैंक का कार्यालय मुख्य तौर पर नकदी कार्यालय था, जहां लगभग 75 लोग काम करते थे। अविभाजित भारत में उस समय कानूनी निविदाओं के तहत मुद्राएं क्षेत्रवार छपती थीं, जो मुख्‍यत: 100 और 1000 रुपये के नोट के रूप में होती थीं। तब नोटों पर इन्‍हें जारी करने के क्षेत्रों के नाम जैसे – मुंबई, कानपुर, कलकत्‍ता, मद्रास, कराची, लाहौर छापे जाते थे। नोट छापने वाले हर क्षेत्र को नोट जारी करने और समय-समय पर इन्‍हें रद्द करने का सदस्‍यवार रिकॉर्ड रखना पड़ता था। यदि कराची क्षेत्र से जारी किये गए नोट कलकत्‍ता में पकड़े गए, तो उन्‍हें कराची लाया जाता था और जारी करने वाले खाते पर इनकी संख्‍या दर्ज कर रद्द कर दिया जाता था। खातों में जारी और रद्द किये गए हर नोट की संख्‍या दर्ज होता थी। यदि किसी नोट की संख्‍या रद्द नोट की संख्‍या से मिलती पाई गई, तो ऐसे मामलों में जांच कराई जाती थी।
    1946 में, जब 1000 रुपये के नोट का विमुद्रीकरण किया गया, तो कुछ लोगों ने प्रति 1000 रुपये के नोट के बदले में 500 से 600 रुपये के नोट लिये। ऐसा विनिमय रिज़र्व बैंक और आयकर विभाग के दफ्तर में कराया गया। बैंक और दूसरे कारपोरेट निकायों ने बड़ी राशि के नोट को छोटी राशि के नोट में बदलवाया। इस तरह बैंकों ने अपने ग्राहकों और परिचितों के नाम नोट विनिमय कर उनकी मदद की। उन दिनों एक रुपये के चांदी के सिक्‍कों की शुद्धता की  जांच रोकडिया सिक्‍के को लकड़ी के टेबल पर तेजी से फेंक कर करता था। वे नकली सिक्‍कों की पहचान इस तरह सिक्‍कों की आवाज सुन कर करते थे। इस तरह हम कह सकते हैं कि रिज़र्व बैंक उस जमाने में एक संगीतप्रेमी था।
  1940 के शुरूआती दशक में रिजर्व बैंक के वरिष्‍ठ अधिकारिक पदों पर मौजूदा कर्मियों को ही पदोन्‍नत कर जिम्‍मेदारी दी जाती थी या इंपीरियल बैंक के अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर लाया जाता था। अधिकारियों का अंतिम साक्षात्‍कार कलकत्‍ता में निदेशकों के केन्‍द्रीय मंडल में संपन्‍न होता था। देश के विभाजन के बाद कराची में कार्यरत अधिकारियों को 1947 में मुंबई कार्यालय में आने को कहा गया। इस पर कुछ टेलीफोन ऑपरेटर ही मुंबई कार्यालय में योगदान देने आए। उस समय रिज़र्व बैंक में कोई महिला कर्मचारी नहीं थी। 1940 के शुरूआती दशक में लिपिक के पद पर एक महिला की नियुक्ति हुई और एक अधिकारी के रूप में मार्च, 1949 में सुश्री धर्मा वेंकटरमन की बहाली हुई। बैंक में धीरे-धीरे महिला कर्मियों की संख्‍या बढ़ने लगी। एक आंकड़े के अनुसार जनवरी, 1968 में महिलाओं की संख्‍या कुल कर्मचारियों के आठ फीसदी से कम थी।
    इतिहास के पन्‍ने बताते हैं कि रिज़र्व बैंक में इम्‍पीरियल बैंक से आये अधिकारियेां को छोड़ बहुत कम यूरोपीय अधिकारी थे। ऐसा डिप्‍टी गर्वनर नानावटी की कोशिशों की वजह से संभव हो पाया। वे चाहते थे कि अधिकारी बनने का मौका अधिक-से-अधिक भारतीयों को मिले। कर्मचारियों के संदर्भ में नानावटी भारतीयकरण चाहते थे और वे भारत में बनी वस्‍तुओं को खरीदने में तरजीह देते थे। इस संबंध में यह जानना बड़ा रुचिकर है कि बैंक में एक बार भारत में बनी घडियों की खरीदारी का कर्मचारियों ने विरोध किया और काम करना बंद कर दिया। तब नानावटी की टिप्‍पणी थी कि इससे कोई मतलब नहीं है कि बैंक की सभी घडियां इस तरह गतिरोध पैदा कर दें।
    हालांकि यह जानना बड़ा दिलचस्‍प है कि सेक्रेटरी ऑफ स्‍टेट फॉर इंडिया रिज़र्व बैंक को एक संस्थागत रूप देने के लिए कई कारणों से कर्मचारियों को सुकून देने वाली समय सारणी का समर्थन करते थे। प्राथमिक प्रबंधन के लिए आवश्‍यक समय के अलावा बैंक की स्‍थापना के लिए सरकारी बजट में संशोधन और सामान्‍य निर्यात सरप्‍लस की वापसी जैसी कुछ पूर्व शर्तें लागू करने की जरूरत महसूस की गई। ये शर्तें अधिक समय लेने वाली थीं, जिसे पूरा होने में लगने वाला समय कष्‍टदायक था। सेक्रेटरी ऑफ स्‍टेट फॉर इंडिया का मानना था कि रिज़र्व बैंक की स्‍थापना में ज्‍यादा तत्‍परता तब तक उचित नहीं है, जब तक नये वित्‍त सदस्‍य वास्‍तविक स्थिति को व्‍यक्तिगत तौर पर समझे बिना इस मसले पर अपनी राय देने की स्थिति में न आ जायें। उन्‍होंने भारत सरकार के उस सुझाव को निरस्‍त कर दिया, जिसमें बिना मुद्रा नियमन के बैंक की शुरूआत करने की बात कही गई थी। अंत में इस मसले पर ऐसी सहमति बनी, कि बैंक की शुरूआत न तो भारत सरकार की इच्‍छा के अनुरूप बहुत जल्‍दी हुई और न ही देर से, जैसा कि सेक्रेटरी ऑफ स्‍टेट फॉर इंडिया ने अंदाजा लगाया था।
    15 अगस्‍त, 1947 को भारत और ब्रिटेन के बीच एक महत्‍वपूर्ण समझौता  ‘’ब्रिटिश डेट (DEBT) पैक्‍ट विद इंडिया’’ पर समझौता हुआ। ब्रिटेन और भारत की सरकार ने उस वक्‍त भारत के स्‍टर्लिंग संतुलन के संबंध में 1947 तक की अवधि के लिए अंतरिम समझौते पर हस्‍ताक्षर किये। दोनों देशों के अधिकारियों की बैठक में दोनों देशों के बीच आर्थिक और वित्‍तीय समस्याओं की समीक्षा की गई और भारत की संभावित आवश्यकताओं पर विचार किया गया। बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि खर्च के लिए भारत की मौजूदा बचत में 35 मिलियन पॉउंड उपलब्‍ध होना चाहिए, जिसकी व्‍यवस्‍था 31 दिसम्‍बर, 1947 तक होनी चाहिए। इसके अलावा 30 मिलियन पॉउंड की कार्यकारी बचत रिज़र्व बैंक के अधिकार क्षेत्र में होगी। दोनों सरकारों ने खासतौर से इस बात पर भी सहमति जताई कि ब्रिटिश मूल के उन लोगों की बचत राशि पर कोई सरकार किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाएगी, जो स्‍थायी तौर पर ब्रिटन वापस जाने वाले हैं। ब्रिटेन में रह रहे लोगों की निवेश राशि पर भी किसी तरह के प्रतिबंध से मना किया गया।
   रिज़र्व बैंक आज एक ऐसे संस्‍थान के रूप में काम कर रहा है, जो मौद्रिक स्‍थायित्‍व, मौद्रिक प्रबंधन, विदेशी विनिमय, आरक्षित निधि प्रबंधन, सरकारी कर्ज प्रबंधन, वित्‍तीय नियमन एवं निगरानी सुनिश्चित करने के उद्देश्‍य के साथ काम करता है। इसके मुख्‍य दायित्‍वों में मुद्रा प्रबंधन और भारत के हक में इसकी साख व्‍यवस्‍था का संचालन भी शामिल है। इसके अलावा अपनी स्‍थापना की शुरूआत से ही रिज़र्व बैंक ने विकास की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाई है, खासकर कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों में। रिज़र्व बैंक के इतिहास के पन्‍नों से ये कुछ ऐसी झलकियां थी, जिसे हम बैंकों के इस बैंक की लंबी और महत्‍वपूर्ण यात्रा से निकाल कर पेश कर पाए हैं। 
08-फरवरी-2012 20:56 IST

*इस फीचर के लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार है और इसमें उद्धृत विचार उनके अपने हैं, तथा इसमें पीआईबी का विचार निहित नहीं है।