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शुक्रवार, जुलाई 29, 2022

विशेष सामग्री-हनुमानगढ़ जिले का धन्नासर

29th July 2022 at 01:38 PM

जो राजस्थान में एडवेंचर टूरिज्म के रूप में विकसित हो रहा है 


हनुमानगढ़
: 29 जुलाई 2022: (इर्द-गिर्द//राजस्थान स्क्रीन)::

हनुमानगढ़ जिले के रावतसर तहसील का धन्नासर क्षेत्र राजस्थान में एडवेंचर टूरिज्म के रूप में विकसित हो रहा है। धन्नासर के रेत के धोरे मोटर स्पोर्ट्स के दिग्गजों को सहर्ष ही आकर्षित करते हैं। जिले के 29 वें स्थापना दिवस के अवसर पर स्थानीय डेजर्ट रेडर्स क्लब की ओर से यहां ऑफरोडिंग का कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिला प्रशासन के सहयोग से आयोजित किए गए इस ऑफरोडिंग कार्यक्रम में देश के मोटर स्पोर्ट्स क्षेत्र के तीन दिग्गज खिलाड़ी सन्नी सिद्दू, सनम सेखो और गुरमीत विर्दी भी यहां पहुंचे और धन्नासर के धोरों पर एटीवी, पोलारिस समेत अन्य स्पोर्ट्स गाड़ियों के जरिए ऑफरोडिंग में जमकर धूम मचाई।

डेजर्ट स्ट्रोम के 7 बार और रेड हिमालया के एक बार चौंपियन रह चुके सन्नी सिद्धू बताते हैं कि हनुमानगढ़ की कनेक्टिविटी बहुत अच्छी है लिहाजा जिले का धन्नासर मोटर स्पोर्ट्स के क्षेत्र में बड़ा हब बन सकता है। एटीवी रैली, कार रैली व गो कार्टिंग के चौंपियन रह चुके सनम सेखो ने धन्नासर के धोरों पर एटीवी के जरिए खूब धूम मचाई। उनकी एटीवी की स्पीड और उस पर जोरदार पकड़ ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। सेखो बताते हैं कि धन्नासर एडवेंचर स्पोर्ट्स के लिए बहुत अच्छा प्लेटफॉर्म है। यहां स्थानीय डेजर्ट रेडर्स क्लब ने मेहनत कर बहुत अच्छा ट्रेक बनाया है।वहीं देश में आरएफसी( रैन फोरेस्ट चौलेंज) के तीन बार चौंपियन रहे और मलेशियन आरएफसी के एकमात्र भारतीय चौंपियन रहे श्री गुरमीत विर्दी बताते हैं कि धन्नासर का ऑफरोडिंग ट्रेक बहुत ही चौलेंजिंग है। हमें यहां ऑफरोडिंग करके बहुत मजा आता है। नए ऑफरोडर भी यहां आकर स्टार्ट करें तो उन्हें अच्छा एक्सपीरियंस मिलेगा। 

जिले के मोटर स्पोर्ट्स से जुड़े "जर्ट रेडर्स क्लब" में हनुमानगढ़ के अलावा पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, चंडीगढ़ और राजस्थान के अन्य जिलों के ऑफरोडर भी शामिल हैं। क्लब प्रेसिडेंट गुरपिंदर सिंह (केपी) के नेतृत्व में यह क्लब पूरे अनुशासन के साथ मोटर स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने के लिए जुटा हुआ है। इसके सदस्य धन्नासर के धोरों पर वर्ष 2012-13 से ऑफरोडिंग की प्रैक्टिस करते आ रहे हैं। क्लब के द्वारा वर्ष 2017 से तीन दिवसीय नेचर ड्राइव का आयोजन भी धन्नासर में प्रतिवर्ष दिसंबर के तीसरे वीकेंड पर किया जा रहा है। ताकि हनुमानगढ़ को पर्यटन मानचित्र पर एडवेंचर टूरिज्म के रूप में नई पहचान मिले।डेजर्स रेडर्स क्लब के प्रेसिडेंट गुरपिंदर सिंह (केपी )बताते हैं कि ये बड़े गर्व की बात है कि हनुमानगढ़ जिला स्थापना दिवस के अवसर पर धन्नासर में आयोजित ऑफरोडिंग में मोटर स्पोर्ट्स क्षेत्र में देश के तीन दिग्गज यहां आए। हम धन्नासर को मोटर स्पोर्ट्स के हब के रूप में विकसित करने को लेकर प्रयासरत हैं। जिला प्रशासन भी हमें पूरा सपोर्ट कर रहा है। 

दरअसल ,धन्नासर में एक तरफ रेत के धोरे हैं तो दूसरी तरफ आपणी योजना के बड़े बड़े वाटर रिजर्वायर। तत्कालीन जिला कलेक्टर श्री प्रकाश राजपुरोहित ने धन्नासर की इस खूबसूरती को देखते हुए पहली बार सभी जिला स्तरीय अधिकारियों की डीएलओ मीट का आयोजन भी यहां करवाया। उसके बाद तत्कालीन जिला कलेक्टर श्री जाकिर हुसैन ने जिला स्थापना दिवस पर यहां ऑफरोडिंग के अलावा विभिन्न खेलों का आयोजन करवाया। वर्तमान जिला कलेक्टर श्री नथमल डिडेल ने नेचर ड्राइव के आयोजन में पर्यटन विभाग का सपोर्ट दिलवाकर इसे मोटिवेट किया। साथ ही जैसलमेर के मरू महोत्सव, बीकानेर के केमल फेस्टिवल की तर्ज पर यहां धन्नासर में नेचर ड्राइव को जिले के एक बड़े आयोजन के रूप में स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं। 

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- सुरेश बिश्नोई

जनसंपर्क अधिकारी, हनुमानगढ़

रविवार, फ़रवरी 03, 2013

सफलता की कहानी-सुनते है उन्हीं की जुबानी....!


31-जनवरी-2013 12:44 IST
बागवानी फसल बनी वरदान// -मनोहर कुमार जोशी*
राजस्थान के प्रयोगधर्मी और प्रगतिशील किसान लियाकत अली पर विशेष लेख
राजस्थान में सवाईमाधोपुर जिले की करमोदा तहसील के दोंदरी गांव के प्रयोगधर्मी और प्रगतिशील किसान लियाकत अली अपनी हर सफलता का श्रेय उद्यानिकी को देते हैं । अपनी पांच हैक्टेयर कृषि भूमि में से तीन हैक्टेयर पर उन्होंने अमरूदों का बाग लगा रखा है। उनके बगीचे में इस वर्ष अमरूदों की बम्पर पैदावार हुई है। छोटे-बड़े सभी पेड़ फलों से लदे हुये हैं। कई पेड़ों की डालें तो फलों के वजन से जमीन पर गिरी हुयी हैं। लेखक को फलदार बाग दिखाते हुये उन्होंने बतायी अपनी सफलता की कहानी-सुनते है उन्हीं की जुबानी.......

           हमारा पुश्तैनी पेशा खेतीबाड़ी है । मेरे पिता समीर हाजी परम्परागत खेती किया करते थे। पिता के इंतकाल के बाद मैं भी गेहूं, जौ, चना सरसों आदि की फसलें लेने लगा, लेकिन उससे कुछ खास हासिल नहीं हुआ । कभी ज्यादा सर्दी की वजह से फसलों को नुकसान होता, तो कभी पानी की कमी के कारण पर्याप्त सिंचाई के अभाव में अच्छी पैदावार नहीं होती। इससे भविष्य की जिम्मेदारियां अधर झूल में दिखाई देने लगी।
           ऐसी स्थिति में एक दिन मैं यहां के कृषि एवं उद्यान विभाग तथा स्थानीय कृषि विज्ञान केन्द्र के अधिकारियों से मिला। उन्होंने मुझे अमरूद का बगीचा लगाने की सलाह दी। मेरे लिये इनसे मिलना बहुत ही लाभप्रद रहा। उनके सहयोग एवं सलाह पर मैंने अमरूदों की खेती शुरू कर दी । नर्सरी से एक रूपये प्रति पेड़ के हिसाब से 300 पेड़ खरीद कर एक हैक्टेयर जमीन पर लगाये । बड़े होने पर इन पेड़ों पर अमरूद लगने शुरू हो गये, तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । इससे हुयी आय ने उद्यानिकी फसल के प्रति मेरा उत्साह बढ़ाया और मैंने अपने बगीचे को एक हैक्टेयर से बढ़ाकर तीन हैक्टेयर में कर दिया । छह सौ पेड़ और लगाये । दूसरी बार लगाये पेड़ों के पौधे लखनऊ से लाया ।  यह पौधे इलाहाबादी, मलिहाबादी, बर्फ गोला एवं फरूखाबादी किस्म के थे तथा एल-49 से स्वाद में बढि़या व पेड़ से तुड़ाई के बाद ज्यादा समय तक तरोताजा रहने वाले थे।  नये पौधों से दो साल बाद फसल की पैदावार में वृद्धि हुयी। इससे ढाई लाख रूपये की आय हुई ।

           इस बार मैंने पैदावार बेचने का ठेका कोटा के एक फल व्यापारी को दिया है, लेकिन बम्पर पैदावार होने के बाद लगा कि यदि ठेकेदार के बजाय मैं खुद इसे बेचता तो कहीं ज्यादा लाभ में रहता। इस मर्तबा इस कदर पेड़ों पर फल लदे हैं कि फलदार पेड़ों की डालें झुक कर जमीन पर आ गयी है।

    फलों की तुड़ाई नवम्बर से चल रही है। यह सिलसिला मार्च तक चलेगा । अमरूदों की खेती मुझे एवं मेरे बेटों को रास आ गई है । एक हजार पौधे अपने बाग में और लगाये हैं। एक दो साल बाद इनसे भी आय शुरू हो जायेगी। वे बताते हैं ....महंगाई की मार उद्यानिकी फसल पर भी पड़ी है। शुरू में मुझे प्रति पौधा एक रूपये में मिला था, जबकि इसके बाद यही पौधा एक से बढ़कर चार रूपये का अर्थात चार गुना महंगा मिला। पिछले वर्ष लखनऊ से लाये गये पौधों की कीमत यहां पहुंचने तक लगभग 25 रूपये प्रति पौधा पड़ गई, लेकिन मुझे लगता है इस पौधों की किस्म अच्छी होने के कारण इसका लाभ मिलेगा।

           यहां की जलवायु हवा, पानी एवं मिट्टी अमरूद के पेड़ों को भी रास आ गई है तथा जो किसान बगीचे की अच्छी तरह सार-संभाल करता है, उसके लिये बगीचा सोना उगलता है । मैंने नये पौधों की रोपाई से पहले बकरी की मींगनी की खाद से बगीचे को भली-भांति संधारित किया था। समय-समय पर पेड़ों की देखभाल करता रहता हूं । पशुओं से पेड़ों एवं फसल की रक्षा के लिये बगीचे के चारों तरफ लोहे के मोटे तार वाली जाली की बाड़ लगा रखी है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में नील गायें हैं, जिस खेत में रात को वे घुस जाती हैं, उसकी फसल चोपट कर देती हैं।

           खेत एवं बगीचे में सिंचाई के लिये खेत पर कुआं एवं फार्म पौण्ड हैं, जिससे सिंचाई की कोई समस्या नहीं है। बूंद-बूंद और फव्वारा सिंचाई अपना रखी है, जो जरूरत के अनुसार हो जाती है। दूसरे किसान भाईयों को भी उनकी मांग पर फसल की सिंचाई के लिये पानी मुहैया करवाता हूं। मै किसान भाइयों को हमेशा कहता हूं कि आज हम लोग कोई एक प्रकार की खेती कर खुशहाल और समृद्ध नहीं बन सकते हैं । इसके लिये खेती किसानी के साथ-साथ कृषि के सहायक कार्य जैसे मुर्गीपालन, मछली पालन, पशुपालन, जो एक दूसरे पर निर्भर हैं, इन्हें अपना कर अतिरिक्त लाभ कमा सकते हैं।

           मैंने अपने खेत पर एक सौ फुट लम्बा, 70 फुट चैड़ा और 12 फुट गहरा फार्म पौण्ड बना रखा है। इसके निर्माण के लिये सरकार से अनुदान भी मिला था। सिंचाई के साथ-साथ पौण्ड में मत्स्य बीज डाल कर मछलीपालन कर लेता हूं। इसके लिये कोलकाता से शुरू में दस हजार मत्स्य बीज लाया था । एक किलो की मछली 80 से 100 रूपये में बिक जाती है । मैंने मत्स्य प्रशिक्षण विद्यालय उदयपुर से 2004 में ट्रेनिंग ली थी, जो मेरे काम आई । फार्म पौण्ड के किनारे प्रकाश पाश्‍र्व लगा रखा है, इससे फायदा यह है कि खेत में फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीट पतंगे रात को पानी मे गिर जाते हैं। इससे दोहरा लाभ होता है, फसल भी खराब नहीं होती और मछलियों का भोजन भी हो जाता है।

           अतिरिक्त आय के लिये खेत पर पांच-सात भैंसे बांध रखी हैं । एक भैंस हाल ही 46 हजार रूपये में बेची है। भैंसों से दूध, दही, घी मिल जाता है । उनका गोबर बायोगैस संयंत्र में काम आ जाता है । यह संयंत्र वर्ष 2007-08 में बनाया था। अपने खेत पर मुर्गीपालन भी करता हूं। ये पक्षी खेत में दीमक तथा हानिकारक कीड़ों को खाकर उन्हें नष्ट कर देते हैं । उनकी विष्टा खाद के रूप में काम आती है । कृषि के जानकार लोगों के मुताबिक इनकी बींट की खाद से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है । देसी मुर्गा पांच सौ से सात सौ रूपये में बिक जाता है। लियाकत अली के पुत्र इंसाफ कहते हैं । हमारे खेत पर मुर्गे-मुर्गियों और इनके चूजों की संख्या काफी हो गयी थी, लेकिन हाल ही में थोड़ी सी लापरवाही के चलते ये पक्षी वन्य जीवों के शिकार हो गये। अब कुछ मुर्गे-मुर्गीयां ही बची हैं। इनकी सुरक्षा के लिये जल्दी ही फार्म पौण्ड पर लोहे का जाल डालकर एक बड़ा पिंजड़ा बना रहे हैं।

           लियाकत भाई अपनी सफलता की सारी कहानी बयां करते हुये कहते हैं कि मुझे मान- सम्मान, धन-दौलत अमरूदों की उद्यानिकी फसल से ही मिला है। मेरे यहां कोई आये और बिना अमरूद खाये कैसे चला जाये । इसके लिये मैंने 20-25 अमरूदों के पेड़ अलग से छोड़ रखे हैं, ताकि अमरूदों का स्वाद आने वाला अतिथि चख सके। वे कहते हैं मुझे अनेक इनाम मिले हैं, लेकिन सबसे बड़ा सम्मान जयपुर में कृषक सम्मान समारोह में मिला । इससे मेरा और उत्साहवर्धन हुआ है ।(पसूका) (PIB) बागवानी फसल बनी वरदान// -मनोहर कुमार जोशी*
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*लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं

मीणा/बि‍ष्‍ट/शदीद -32पूरी सूची 31.01.2013