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गुरुवार, नवंबर 05, 2026

दिविक की मौत नहीं, हत्या है

Reetu Kalsi Jalandhar on Wednesday 4th November 2026 at 18:18 Irad Girad Blog 

क्या गरीब की साँसों की कीमत नहीं होती?

रीतू कलसी ने की है  पर्त दर पर्त  चर्चा-

क्या यह पूरे सिस्टम की भी हत्या है? 


दिविक की मौत ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि इस देश में गरीब के लिए अस्पताल नहीं, सिर्फ मौत के दरवाज़े खुले हैं। सवाल अस्पतालों के काम पर नहीं, उनकी इंसानियत पर खड़ा है। कानून साफ़ है, फिर भी कौन मानता है? रीतू कलसी एक बार फिर उठा रही हैं मानवता से जुड़े सवाल। रीतू कलसी जिसकी कलम खबरों के आरपार देख कर पूरी तह तक जाती है। उनकी कलम आपको वह दिखती है जो हम हर रोज़ देख कर भी नज़रअंदाज़ कर जाते हैं! 

लेखिका रीतू कलसी 

बात 1989 की है जब सुप्रीम कोर्ट ने साफ़-साफ़ शब्दों में कहा था — पश्चिम बंगाल बनाम... नहीं, पैरामानंद कटारा बनाम भारत संघ केस में — कि किसी भी एक्सीडेंट के घायल को इलाज देना हर सरकारी और निजी अस्पताल का कानूनी कर्तव्य है। पुलिस की औपचारिकता, FIR, मेडिको-लीगल केस — सब बाद में। पहले इलाज। इलाज से मना करना अपराध है। इस हकीकत के बावजूद अगर आंकड़ों को खंगाला जाए तो स्थिति हिला कर रख देती है। अस्पतालों में जा कर जो देखने को मिलता है वहां बरबस ही आंसू निकल आते हैं। बेबसी में जकड़ा जाता है पीड़ित इंसान। कुछ मामले अच्छे भी हैं लेकिन ज़्यादातर हालात खराब ही हैं। 

इसी तरह संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है — जीवन का अधिकार। ये अधिकार अमीर-गरीब नहीं देखता।

और सरकार ने तो कैशलेस इलाज का नियम भी बना रखा है — सड़क हादसे में घायल को शुरुआती गोल्डन ऑवर में बिना पैसे के इलाज मिलना चाहिए। केंद्र से लेकर राज्य तक फाइलों में नियम अपडेट होते रहते हैं, पर ज़मीन पर वो नियम कहाँ हैं? किसी को नहीं पता। राजीव गांधी की सरकार ने इस पर फैसला लिया, वी.पी. सिंह ने उसे आगे बढ़ाया, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया — पर आज अस्पतालों के लिए ये सब कागज़ का टुकड़ा है। फिर दिविक के साथ क्या हुआ? आरव और दिविक के एक्सीडेंट के बाद, गायक रमेश के बयान के मुताबिक, जब उन्हें ई-रिक्शा में उठाकर ले जाया गया तो उनकी साँसें चल रही थीं।

दो प्राइवेट अस्पतालों के दरवाज़े खटखटाए गए। दोनों ने हाथ खड़े कर दिए।

"सिविल ले जाओ" कहकर पल्ला झाड़ लिया। क्यों? क्योंकि केस पुलिस का था? क्योंकि पैसे की गारंटी नहीं थी? क्योंकि ई-रिक्शा में लाया गया बच्चा उन्हें "पार्टी" नहीं लगा? और सिविल अस्पताल में क्या हुआ? 

वहाँ भी डॉक्टर को आने में देर लगी। क्या इसलिए कि ई-रिक्शा पर आया था तो गरीब होगा? क्या गरीब की साँसों की कीमत नहीं होती? यही तो सबसे बड़ा सवाल है — क्या इस देश में इलाज अब इंसानियत पर नहीं, पैसे और स्टेटस पर मिलता है?

डॉक्टर बनते समय जो शपथ ली जाती है — "मैं जाति, धर्म, अमीर-गरीब देखे बिना इलाज करूँगा" — वो शपथ अस्पताल के गेट पर ही उतार दी जाती है। पैसे से ऊपर उनके लिए कुछ नहीं रहा।और अब दिनेश वीर जी को कौन हौसला दे? 

जवान बच्चे का जाना... इससे बड़ी सज़ा दुनिया में कोई नहीं। ये दुख ऐसा है कि दुश्मन को भी रब न दे। एक बाप के लिए अपने बेटे का जनाज़ा उठाना, उससे बड़ी हार क्या होगी? इसलिए आज फिर कहूँगी — और चाहे लोग मेरे खिलाफ हो जाएँ — 25 साल से पहले बच्चों को गाड़ी नहीं चलाने देनी चाहिए। 

गंभीरता 25 में ही आती है। 18 में लाइसेंस मिल जाता है, पर ज़िम्मेदारी नहीं मिलती। दिविक चला गया। 

पर सवाल ज़िंदा है — अगला दिविक कौन होगा? और कब तक हम अपने बच्चों को ऐसे ही अस्पतालों की बेरुखी और सिस्टम की लापरवाही के हवाले करते रहेंगे?