Reetu Kalsi Jalandhar on Wednesday 4th November 2026 at 18:18 Irad Girad Blog
क्या गरीब की साँसों की कीमत नहीं होती?
रीतू कलसी ने की है पर्त दर पर्त चर्चा-
क्या यह पूरे सिस्टम की भी हत्या है?
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| लेखिका रीतू कलसी |
इसी तरह संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है — जीवन का अधिकार। ये अधिकार अमीर-गरीब नहीं देखता।
और सरकार ने तो कैशलेस इलाज का नियम भी बना रखा है — सड़क हादसे में घायल को शुरुआती गोल्डन ऑवर में बिना पैसे के इलाज मिलना चाहिए। केंद्र से लेकर राज्य तक फाइलों में नियम अपडेट होते रहते हैं, पर ज़मीन पर वो नियम कहाँ हैं? किसी को नहीं पता। राजीव गांधी की सरकार ने इस पर फैसला लिया, वी.पी. सिंह ने उसे आगे बढ़ाया, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया — पर आज अस्पतालों के लिए ये सब कागज़ का टुकड़ा है। फिर दिविक के साथ क्या हुआ? आरव और दिविक के एक्सीडेंट के बाद, गायक रमेश के बयान के मुताबिक, जब उन्हें ई-रिक्शा में उठाकर ले जाया गया तो उनकी साँसें चल रही थीं।
दो प्राइवेट अस्पतालों के दरवाज़े खटखटाए गए। दोनों ने हाथ खड़े कर दिए।
"सिविल ले जाओ" कहकर पल्ला झाड़ लिया। क्यों? क्योंकि केस पुलिस का था? क्योंकि पैसे की गारंटी नहीं थी? क्योंकि ई-रिक्शा में लाया गया बच्चा उन्हें "पार्टी" नहीं लगा? और सिविल अस्पताल में क्या हुआ?
वहाँ भी डॉक्टर को आने में देर लगी। क्या इसलिए कि ई-रिक्शा पर आया था तो गरीब होगा? क्या गरीब की साँसों की कीमत नहीं होती? यही तो सबसे बड़ा सवाल है — क्या इस देश में इलाज अब इंसानियत पर नहीं, पैसे और स्टेटस पर मिलता है?
डॉक्टर बनते समय जो शपथ ली जाती है — "मैं जाति, धर्म, अमीर-गरीब देखे बिना इलाज करूँगा" — वो शपथ अस्पताल के गेट पर ही उतार दी जाती है। पैसे से ऊपर उनके लिए कुछ नहीं रहा।और अब दिनेश वीर जी को कौन हौसला दे?
जवान बच्चे का जाना... इससे बड़ी सज़ा दुनिया में कोई नहीं। ये दुख ऐसा है कि दुश्मन को भी रब न दे। एक बाप के लिए अपने बेटे का जनाज़ा उठाना, उससे बड़ी हार क्या होगी? इसलिए आज फिर कहूँगी — और चाहे लोग मेरे खिलाफ हो जाएँ — 25 साल से पहले बच्चों को गाड़ी नहीं चलाने देनी चाहिए।
गंभीरता 25 में ही आती है। 18 में लाइसेंस मिल जाता है, पर ज़िम्मेदारी नहीं मिलती। दिविक चला गया।
पर सवाल ज़िंदा है — अगला दिविक कौन होगा? और कब तक हम अपने बच्चों को ऐसे ही अस्पतालों की बेरुखी और सिस्टम की लापरवाही के हवाले करते रहेंगे?

